पाकिस्तान ने हाफ़िज़ सईद को फिर ज़मानत दी 

लाहौर में पाकिस्तान की आतंकवाद-रोधी अदालत द्वारा प्रतिबंधित जमात-उद-दावा (जेयूडी) प्रमुख, हाफ़िज़ मुहम्मद सईद तथा तीन अन्य की गिरफ़्तारी से पहले ज़मानत की स्वीकृति देने की ख़बर सामने आई है | यह आश्चर्य की बात नहीं है ! जेयूडी अपने धर्मगोष्ठी तथा आतंक वित्तपोषण के लिए वहाँ की भूमि का अवैधानिक प्रयोग करने से सरोकार रखता है | बहरहाल, ऐसी ख़बर है कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने सईद को गिरफ़्तार करके न्यायिक हिरासत में भेज दिया है |

पूर्व में, सईद, उसके भाई, हाफ़िज़ मसूद और लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के दो सह-संस्थापक, आमीर हमज़ा तथा मलिक ज़फ़र में से प्रत्येक को 50,000 पीकेआर बॉन्ड के बदले 31 अगस्त तक अन्तरिम ज़मानत की स्वीकृति दी गई थी |

हमज़ा तथा ज़फ़र दोनों जेयूडी के लिए धन जुटाने के प्रति ज़िम्मेदार हैं | मार्च 2018 की अपुष्ट ख़बरें कहती हैं कि पूर्व में हमज़ा ने एलईटी से अलग होकर जैश-ए-मनक़फ़ा नाम से एक अलग आतंकी गुट बनाया था |

ध्यान देने वाली बात है कि फरवरी 2019 में राष्ट्रीय कार्यकारी योजना (एनएपी) के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (एनएससी) के दिशानिर्देश के अनुसार जुलाई महीने के पहले सप्ताह में पाकिस्तान के आतंकवाद रोधी विभाग (सीटीडी) ने लाहौर, गुजरांवाला, मुल्तान, फैसलाबाद तथा सरगोधा की सीटीडी पुलिस चौकियों में जेयूडी नेताओं के विरुद्ध 23 प्राथमिकी दर्ज की थी | इसने इस गुट के चार शीर्ष नेताओं समेत जेयूडी के 13 कार्यालय धारकों को आरोपी ठहराया था | मई महीने में, इस गुट के अन्य वरिष्ठ नेता मोहम्मद शाहबाज़ समेत सईद के ब्रदर इन लॉं, अब्दुल रहमान मक्की को हिरासत में लिया गया था |

पाकिस्तानी मीडिया की ख़बर है कि जेयूडी तथा इसके ख़ैरात खंड फ़लाह-ई-इंसानियत (एफ़आईएफ़) पर एनएससी के प्रतिबंध लगाने के उपरांत विस्तृत जांच के बाद सीटीडी ने पाया कि जेयूडी अल-अनफ़ाल ट्रस्ट, दावत-उल-इरशाद ट्रस्ट तथा मुयाज़ बिन जबल ट्रस्ट समेत एफ़आईएफ़ तथा कई ट्रस्टों जैसे ग़ैर-लाभकारी संगठनों के माध्यम से विशाल धन उगाही के ज़रिये आतंक वित्तपोषण के लिए ज़िम्मेदार था | ऐसा दावा किया गया था कि सरकार ने इन संगठनों को पहले ही अपने क़ब्ज़े में कर रखा था |

इस परिदृश्य के उलट, लाहौर एटीसी अदालत द्वारा तीन शीर्ष जेयूडी नेताओं की ज़मानत की स्वीकृति स्पष्ट रूप से न केवल आतंक वित्तपोषण से जुड़े जेयूडी के नेताओं पर मुक़दमा चलाने के प्रति क़ानून प्रवर्तन एजेंसियों की गंभीरता की कमी को दर्शाता है, बल्कि देश के भीतर आतंकी तत्वों से निपटने में सीटीडी तथा एटीसी अदालत के मामले में पाकिस्तान के विभिन्न संस्थानों के बीच के अलगाव को भी दर्शाता है | पाकिस्तान सरकार इस तरह की असावधान कार्रवाई पहली बार नहीं कर रही है | दस महीने की नज़रबंदी के बाद, हाफ़िज़ सईद को नवंबर 2017 में लाहौर अदालत ने पहले रिहा कर दिया था | सईद इसे अच्छी तरह जानता है कि राज्य की एजेंसियां उसका तथा उसके संगठन का कम से कम ही नुकसान करेगी, हालांकि इस प्रकार की सांकेतिक कार्रवाई यहाँ की ज़मीन से संचालित होने वाले आतंकी गुटों के विरुद्ध कार्रवाई करने की पाकिस्तान सरकार की वचनबद्धता के रूप में मीडिया के ज़रिये व्यापक रूप से प्रचारित की गई है |

वास्तव में, पाकिस्तान ने इस प्रकार के क़दम सिर्फ़ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के दबाव में उठाए हैं | गत महीने, अमरीका के ओरलैंडो की अपनी समीक्षा बैठक में वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफ़एटीएफ़) ने ग्रे-सूची वाले पाकिस्तान को लेकर चिंता व्यक्त की कि जनवरी की अंतिम समय सीमा में असफल रहने के बाद, यह मई 2019 में भी अपने कार्यकारी योजना वाले मदों को निपटाने में असफल रहा है |

इसने अक्तूबर 2019 तक पाकिस्तान को इसकी कार्यकारी योजना को तीव्रता से निपटाने के लिए प्रेरित किया है | ऐसा करने में असफल रहने से “एफ़एटीएफ़ अपर्याप्त प्रगति के कारण अगली कार्रवाई करने के लिए निर्णय लेगा |” अगर ऐसा हुआ तो फिर एक चिंता करने योग्य देश के रूप में पाकिस्तान को काली सूची में डाला जा सकता है |

इस प्रकार पाकिस्तान के लिए यह प्रदर्शित करना असंभव है कि "आतंकी वित्तपोषण के मुक़दमों का परिणाम प्रभावी, आनुपातिक और निराशाजनक प्रतिबंधों के रूप में होता है और यह अभियोजकों और न्यायपालिका के लिए क्षमता तथा समर्थन को बढ़ाता है"।

सईद तथा अन्य के विरुद्ध मुक़दमे को ख़राब तरीक़े से गढ़ा गया है | सईद के वकील द्वारा दायर की गई याचिका से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सीटीडी ने जनवरी 2002 में प्रतिबंधित एलईटी के सदस्यों के रूप में उसे तथा उसके साथियों को ग़लत तरीक़े से पेश किया है, जबकि 2003 में लाहौर उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार दिसंबर 2001 में सईद ने इसे छोड़ दिया था |

एफ़एटीएफ़ के दबाव के उलट इस सप्ताहांत के बाद इमरान ख़ान की अमरीका यात्रा के पहले सही समय पर उठाया गया यह क़दम भी हो सकता है, यह संकेत देने के लिए कि पाकिस्तान अपनी ज़मीन पर पनपने वाले आतंक को लेकर अमरीकी चिंताओं को संबोधित करने को तैयार है |

हाफ़िज़ सईद जैसे वैश्विक आतंकवादियों के विरुद्ध किसी प्रकार की समेकित कार्रवाई करने के प्रति एक राज्य के लिए पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों तथा एलईटी जैसे आतंकी समूहों के बीच संरचनात्मक संपर्क काफ़ी मज़बूत हैं |

आलेख – डॉ॰ अशोक बेहूरिया, दक्षिण एशिया केंद्र के समन्वयक, आई॰डी॰एस॰ए॰

अनुवादक/वाचक – मनोज कुमार चौधरी

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