अमरीका-तालिबान वार्ता और भारत के पास विकल्प

दोहा में अमरीका-तालिबान वार्ता का आठवाँ चरण एक संभावित शांति समझौते के साथ संपन्न हुआ जिसके अंतर्गत एक निर्धारित समय सीमा के भीतर अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी एवं नाटो सेनाओं की वापसी सुनिश्चित हो सकेगी। इसके बदले में तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में अल कायदा और आईएसआईएस जैसे अंतर्राष्ट्रीय आतंकी संगठनों को पनाह नहीं देगा। वह अफ़ग़ानिस्तान की सरकार के साथ सत्ता में भागीदारी के सूत्र पर आधारित वार्ताओं में भी भाग लेगा जिससे कि युद्ध से त्रस्त देश मे शांति और स्थायित्व लाया जा सके।
अमरीका के साथ वार्ता के लिए तालिबान ने वर्ष 2013 में दोहा में अपना कार्यालय स्थापित किया था। कुछ आरंभिक चरणों की वार्ताओं का कोई परिणाम नहीं निकल पाया क्योंकि सभी पक्ष अपनी अपनी अतिवादी माँगों पर अड़े रहे थे। 2014 में जब अफ़ग़ानिस्तान के भीतर अमरीकी तथा नाटो सेनाओं ने अपना सैन्य अभियान संपन्न किया और युद्ध की ज़िम्मेदारी नई नवेली अफ़ग़ानी सेना को सौंपी तब वार्ताओं की संभावनाएं उत्पन्न हुईं क्योंकि धरातल पर सच्चाई कुछ और थी। आधे से भी अधिक भूभाग पर तालिबान के आधिपत्य था और अफ़ग़ानी सेना उसके समक्ष कहीं नहीं टिकती थी। ऐसा अनुभव किया गया कि तालिबान से वार्ता तथा उसे सत्ता में साझेदारी के बिना शांति स्थापित नहीं की जा सकती और ऐसी स्थिति में अमरीकी सेनाओं को एक अंतहीन युद्ध में लिप्त रहना पड़ता। अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापसी का वचन देने वाले अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ज़लमे ख़लीज़ाद को अफ़ग़ानिस्तान में विशेष अमरीकी दूत के रूप में नियुक्त किया जिससे कि तालिबान तथा अफ़ग़ान सरकार के बीच वार्ता संभव हो और अफ़ग़ानिस्तान से अमरीका वापस जा सके।
अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया में कई बाधाएं हैं। अमरीका-तालिबान की सीधी वार्ता के अतिरिक्त इस क्षेत्र के कई देशों के भी महत्वपूर्ण हित जुड़े हैं जिनका संबंध तालिबान के साथ है। अमरीका की तालिबान के साथ सीधी बातचीत से पहले चीन ने तालिबान के साथ कई चरणों में वार्ता की जिनमें पाकिस्तान ने भी भाग लिया था। मॉस्को फॉर्मेट नामक एक अन्य राजनयिक प्रणाली भी मौजूद है जिसमें तालिबान प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था। इन प्रयासों के अतिरिक्त, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और अमरीका की त्रिपक्षीय व्यवस्था भी है। चीन-पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान, अमरीका-रूस और चीन की राजनयिक त्रिपक्षीय वार्ता व्यवस्था में इस वर्ष पहली बार पाकिस्तान को आमंत्रित किया गया था। साथ ही रूस-चीन-भारत के त्रिपक्षीय मंच द्वारा भी अफ़ग़ानिस्तान की समस्या का समाधान करने का प्रयास किया गया है। इन क्षेत्रीय प्रयासों तथा दोहा वार्ता के अतिरिक्त 'एशिया का हृदय' नामक एक अन्य व्यवस्था भी अस्तित्व में है जिसे इस्तांबुल प्रक्रिया के नाम से भी जाना जाता है। ये सभी बैठकें इस बात का प्रमाण हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य के साथ अनेक देशों के हित भी जुड़े हैं जिन्हें राजनीतिक प्रक्रिया में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता जिसके द्वारा विदेशी सैनिकों की वापसी और तालिबान का पुनर्वास संभव हो सकेगा।
जैसे-जैसे अमरीका-तालिबान संभावित संधि की ओर अग्रसर हो रही है वैसे-वैसे अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य और भावी सरकार को लेकर अनेक चिंताएं भी उभर रही हैं। जर्मनी और क़तर द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित अन्तः अफ़ग़ान वार्ता में तालिबान ने दोहा में अफ़ग़ानी राजनेताओं, जनप्रतिनिधियों और निजी तौर पर भाग लेने वाली महिलाओं के साथ बैठक में हिस्सा लिया था। तालिबान ने आश्वासन दिया है कि वह फिर से दमनकारी नीति नहीं अपनाएगा, आतंकवादियों को शरण नहीं देगा और जनहानि न हो इसका ध्यान रखेगा एमजीआर तालिबान के प्रमुख वार्ताकार शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकज़ाई ने कहा है कि 'संघर्ष जारी रहेगा'।
भारत अफ़ग़ानिस्तान के लिए पाँचवां सबसे बड़ा दानदाता है और उसने वहाँ विकास परियोजनाओं में 3 बिलियन अमरीकी डॉलर का निवेश कर रखा है। सभी घटनाक्रमों पर भारत की दृष्टि है। चूँकि अमरीका ख़लीज़ाद के माध्यम से भारत के साथ भी बातचीत कर रहा है मगर, भारत अफ़ग़ानिस्तान में संभावित बिगड़ती सुरक्षा स्थिति को लेकर भी चिंतित है कि कहीं फिर से 1991 जैसे गृहयुद्ध का माहौल न बन जाये जो सोवियत सेना की वापसी के बाद हुआ था। आरंभ से ही भारत ने अफ़ग़ानिस्तान का भविष्य सुनिश्चित करने के लिए 'अफ़ग़ानी नियंत्रण और अफ़ग़ानी नेतृत्व वाली' शांति प्रक्रिया पर बल दिया है।
अमरीकी सैनिकों की सशर्त वापसी के बाद शांति प्रक्रिया का महत्वपूर्ण द्वितीय चरण आरंभ होगा जिसमें अफ़ग़ानिस्तान की आंतरिक वार्ताएं भी सम्मिलित रहेंगी। यद्यपि अफ़ग़ानिस्तान में शांति की राह, अफ़ग़ानी सरकार और तालिबान के बीच बातचीत की अनिश्चितता की सहगामी है।
इस सबसे अफ़ग़ानिस्तान की राजनीति और उस स्थिति की रूपरेखा तय होगी जो कि विदेशी शक्तियों को क्षेत्रीय भूराजनीति में सामरिक लाभ का परिवेश उपलब्ध कराएगा।

आलेख - डॉ स्मृति एस पटनायक
अनुवादक - हर्ष वर्धन

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