यमन में शांति झलक

एक रोचक धटनाक्रम में इस सप्ताह आशा की किरण नज़र आई है। क्योंकि यमन के अलगाववादी आंदोलन के नेता ने अदन सत्ता पलट के बाद सऊदी की मध्यस्थता वाली शांति वार्ता में शामिल होने की इच्छा व्यक्त की है। सऊदी अरब अमिरात के समर्थन वाले यमन के दक्षिणी अलगाववादी बलों ने भीषण लड़ाई के बाद अदन में राष्ट्रपति भवन का अधिहरण कर लिया था। इस लड़ाई में 40 लोगों की मृत्यु हो गई थी और 260 से अधिक लोग घायल हो गए थे। अलबगदादी नेता एहारस अल जबैदी ने कहा कि अब्दराबू मंसूर हादी की सेनाओं द्वारा हूथी आंदोलन के नेताओं की हत्या करने और आंदोलन दबाने की कोशिश की वजह से हिंसा भड़की थी। अदन में दक्षिणी माध्यामिक परिषद पर सऊदी हवाई हमले की पृष्ठभूमि में ये घोषणा की गई है। संयुक्त अरब अमिरात और सऊदी अरब ने सरकार समर्थक यमनी दलों के अगले सप्ताह वार्ता के लिए बुलाया है ताकि अदन में व्याप्त हालिया तनाव को कम किया जा सके।

इस टकराव की जड़े उस समय से जुड़ी है जब अरब क्रांति के समय राजनीतिक हस्तांतरण नहीं हो पाया था जिस वजह से अली अब्दुल्लाह सालेह को 2011 में अपने उप हादी को सत्ता सौपनी पड़ी। अपने शासन के दौरान हादी सरकार जिहादी हमलों, दक्षिणी अलगावादी आदोंलन, सुरक्षा कर्मियों की सालेह के प्रति वफ़ादारी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और खाध्य असुरक्षा जैसे आंतरिक मुद्दे सुलझाने में ही व्यस्त रही। इसका हूथी(शिया) विद्रोहियों को फ़ायदा मिला। परिवर्तन प्रक्रिया से निराश हुए सुन्नी समेत यमन के नागरिकों की मदद से हूथियो ने सदा, सना पर नियंत्रण कर लिया और पूरे देश पर नियंत्रण करने की धमकी देने लगे।

क्षेत्रीय दुश्मन ईरान के समर्थन वाले एक समूह के उठ खड़े होने से चिंतित सऊदी अरब ने 2015 में हादी सरकार की मदद करने के लिए विद्रोहियों के खिलाफ़ एक गठबंधन तैयार किया। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमिरात, कुवैत, बहरीन, कतर, सुडान, मिस्र, जार्डन और मोरक्को सहित सुन्नी अरब देश इस गंठबंधन में शामिल हो गए जबकि अमरीका और ब्रिटेन ने बाहर से मदद की।

सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने दक्षिणी यमन से हूथीस को खदेड़ दिया। हालांकि सना पर उनका नियंत्रण बना रहा। 2017 में रियाद की ओर बैलिस्टिक मिसाईल दाग़ने से यमन की नाकेबंदी हो गई और सऊदी अरब ने हुदैदा पत्तन शहर पर नियंत्रण किए हुए विद्रोहियों पर आक्रमक कार्रवाई की।

लंबे समय से चले आ रहे संकट की वजह से यमन पर बहुत बुरा असर पड़ा। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों से पता चलता है कि यमन दुनिया में इंसान द्वारा पैदा की सबसे बुरी मानवीय आपदा झेल रहा है। मानवीय मामलों के संयोजक कार्यालय ने यमन के लिए मानवीय आवश्यकता समीक्षा 2019 रिपोर्ट में कहा है कि 5 वर्ष से क्म उम्र के 20 लाख बच्चों और दस लाख से अधिक गर्भवती और स्तनपान करवाने वाली महिलाओं समेत एक करोड़ 43 लाख लोग भुखमरी के शिकार हैं। दिसम्बर 2018 में संयुक्त राष्ट्र ने शांति समझौते की मध्यस्थता की थी। हूथीस ने दो चरणों में शहर से बाहर पुनर्नियोजन का वादा किया था लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है।

लाल सागर और अदन की खाड़ी से जुड़े जलडमरूमध्य में स्थित होने की वजह से यमन इस क्षेत्र तथा दुनिया के लिए अहम है। क्षेत्र के अन्य हिस्सों से बच निकले अल क़ायदा और आईएसआईए आतंकियो के लिए भी ये सुरक्षित ठिकाना है। इस संकट ने क्षेत्र में सुन्नी सऊदू अरब और शिया ईरान के संघर्ष को भी हवा दी। ये टकराव के भीतर एक और टकराव बन गया क्योंकि सऊदी समर्थन वाली सरकारी सेनाओं और एसटीसी के सऊदी अरब अभिरात प्रशिक्षण वाले सुरक्षा बेल्ट बलों के शिया हूथी विद्रोहियों के खिलाफ़ लड़ने से संकट गहरा गया। विश्व को भेजा जाने वाला 20 प्रतिशत तेल बाबा अल मंदेब समुद्र संधि से होकर गुज़रता है और यमन संकट की वजह से इस पर खतरा बना हुआ है।

यमन में शांति व्यापत होना भारत के लिए भी जरूरी है क्योंकि इसका असर भारत-यमन संबंधों पर पड़ता है। भारत ने 2015 में अपना दूतावास सना से जिबूती में स्थानांतरित कर लिया था। भारत सरकार ने एक परामर्श भी जारी किया था। जिसमें भारतीयों के यमन जाने पर रोक थी। 2015 में भारत ने सफलतापूर्वक राहत अभियान चलाया था और वायु तथा समुद्र मार्ग से लगभग 4640 भारतीयों और 41 देशों के 960 विदेशी नागरिकों को यमन से निकाला गया था। भारत यमन में मदद और बहाली गतिविधियों में सक्रिय है और भारतीय भी वहॉ मानवीय राहत कार्यों में लगे हैं। भारत आशा करता है कि यमन में शातिं रहे। नई दिल्ली ने यमन के पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस क्षेत्रों में अपनी विशेष रूचि व्यक्त की है।

आलेख – डॉ लक्ष्मी प्रिया, शोध विश्लेषक, आईडीएएसए

अनुवाद – नीलम मलकानिया

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