तालिबान के साथ ट्रम्प द्वारा वार्ता रद्द किए जाने के बाद अफ़गानिस्तान अधर में
इस वर्ष की शुरुआत में तालिबान ने एक 14 सदस्यीय शांति शिष्टमंडल का गठन किया था | अमरीका के साथ कठिन शांति वार्ता करने का काम इस शिष्टमंडल का था । अफ़गानिस्तान सरकार तथा तालिबान के बीच चल रही जंग के बावजूद यह वार्ता आगे बढ़ानी थी । तालिबान के हमलों की प्रकृति सदा अविवेकी रही है और इन हमलों में नागरिकों को निशाना बनाया गया है, इन बातों को ध्यान में रखते हुए शुरुआत से ही वार्ता को पटरी पर रखना एक कठिन काम था।
इस वार्ता का उद्देश्य बड़े स्तर पर राजनीतिक ढांचे को निर्मित करना था, जो काबुल में मुख्यधारा की राजनीतिक व्यवस्था जैसी तालिबान तथा अन्य वर्गों की आकांक्षाओं को सुविधा प्रदान कर सके। बहरहाल, इस वार्ता का मुख्य मुद्दा आतंकवाद से मुक़ाबले को सुनिश्चित करना था । यह आश्वासन तालिबानी नेताओं को अमरीका को देना था कि अफ़गानिस्तान 1990 के दशक के उत्तरार्द्ध की स्थिति में नहीं लौटेगा, जब यह अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क के पोषक के रूप में उभरकर सामने आया था। आतंक से मुक़ाबले के आश्वासन के लिए क्रमागत अनुपालन को सुनिश्चित करने के एक तंत्र के रूप में, अमरीकी सरकार ने अफ़गान अंचल से अपने सैनिकों की वापसी के बाद अपने खुफ़िया नेटवर्क समेत पूरी राजनयिक उपस्थिति को क़ायम रखने देने की मांग तालिबान से की। बहरहाल, अफ़गान तालिबान ने कहा कि यह अमरीका के संपूर्ण बलों की वापसी की मांग करता है, जिसमें स्पष्ट रूप से खुफ़िया नेटवर्क भी शामिल है । ऐसे नाजुक समय में बंदूक और बम के हमलों ने काबुल के एक सैन्य प्रशिक्षण केंद्र को दहला दिया, जिसमें एक अमरीकी सैनिक के अलावा अन्य 12 लोग मारे गए।
इस हमले की ज़िम्मेदारी तालिबान ने ली है । अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने तालिबान के इस विवेकहीन हमले की निंदा की और वार्ता टूट गई । संघर्ष के लगभग दो दशक बाद इस राजनीतिक वार्ता ने शांति की आशा जगाई थी, लेकिन घटनाक्रमों ने यह भी दिखाया कि एक ऐसे समूह के साथ बातचीत कितनी मुश्किल है, जो अफ़गानिस्तान सरकार के साथ स्वयं सक्रियता से टकराव की स्थिति में है।
बहरहाल, तालिबान ने कहा कि गतिरोध के बावजूद यह वार्ता के लिए तैयार है। जबकि, अनुभवी राजनयिकों का मानना है कि तालिबान के पीछे पाकिस्तान की भूमिका को नियंत्रित करने की आवश्यकता है, क्योंकि अफ़गानिस्तान की धरती से अमरीकी खुफ़िया तंत्र की वापसी पाकिस्तान आधारित आतंकी गुटों को दक्षिण एशिया के अन्य क्षेत्रीय ठिकानों में संचालन संबंधी प्रशिक्षण तथा तैयारी करने का एक अवसर प्रदान करेगी। बहरहाल, इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए कि हाल के सप्ताह में तालिबान ने अन्य क्षेत्रीय हितधारकों को मिलाने संबंधी अपने रवैये में बढ़ती स्वायत्तता का प्रदर्शन किया है।
जबकि, इस समूह ने चीन, रूस, ईरान तथा सऊदी अरब और क़तर जैसे खाड़ी के राज्यों को इसमें शामिल किया था, लेकिन, भारत के साथ वार्ता करने में सफल नहीं हो सका है। बहरहाल, अगस्त महीने में अनाम तालिबान सूत्रों ने इस वार्ता में भारत को भी शामिल करने की अपनी इच्छा के संकेत दिए थे। अगर मुख्य राजनीतिक वार्ता पटरी से उतरी हुई रहती है, तो तालिबान के साथ बहु-हितधारी वार्ता के अवसर बहुत कम दिखते हैं । भारत भी अब तक कहता रहा है कि यह कहीं भी किसी वार्ता में किसी आतंकी समूह को शामिल नहीं करेगा।
हाल की रिपोर्ट कहती है कि नॉर्वे, जर्मनी तथा क़तर अमरीका और तालिबान के बीच फिर से संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा अमरीका के विशेष प्रतिनिधि ज़लमय खलीलज़ाद तथा तालिबान समूह के बीच की वार्ता रद्द किए जाने के बाद, दोनों ही पक्षों ने अफ़गानिस्तान में चल रही हिंसा को समाप्त करने के लिए एक शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में सहमति दिखाई थी। इस निराकरण की वास्तविक लाभकर्ता अफ़गानिस्तान की चुनावी प्रक्रिया रही है । इस महीने के अंत तक इसके संपन्न होने की आशा की जा रही है।
इसमें हिंसा की अधिक संभावना दिखती है, क्योंकि इस प्रक्रिया को अवैध करार देते हुए तालिबान ने चुनावों का विरोध करने की घोषणा की है। इन हालात में, चार दशक से अधिक समय से गृह युद्ध तथा बाहरी हमलों का सामना कर रहे अफ़गानिस्तान का भविष्य अनिश्चित दिखता है। ऐसा लगता है, अगर राजनीतिक वार्ता असफल रहती है, तो तालिबान अमरीकी बलों तथा अफ़गानिस्तान सरकार से संघर्ष जारी रखेगा।
अमरीकी बलों में बढ़ती थकान तथा आने वाले चुनावों के परिदृश्य में, इस संकटपूर्ण क्षेत्र में राष्ट्रपति ट्रंप के पास अधिक नीति विकल्प भी नहीं है। अफ़गान शांति कार्यकर्ता कहते हैं कि अफ़गान चुनाव के बाद शायद वार्ता शुरू होगी। अफ़गानिस्तान के रूप में "एशिया का हृदय" अधर में है । वार्ता को दोबारा शुरू करने के लिए, तालिबान को आतंकवाद से मुक़ाबले के आश्वासन की अमरीकी मांगों के प्रति सहमत होना होगा।
आलेख - कल्लोल भट्टाचार्जी
अनुवादक/ वाचक- मनोज कुमार चौधरी
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