रणनीतिक साझेदारी के क्षेत्र में भारत-ईरान तलाश रहे नई संभावनाएं

भारत और ईरान के बीच तेहरान में इस सप्ताह विदेश विभागों के बीच 16 वें दौर की बातचीत हुई। यह बातचीत ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिमी एशिया क्षेत्र में राजनीतिक स्थिति चिंताजनक हालत में है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व विदेश सचिव विजय गोखले ने किया जबकि ईरान की तरफ से वार्ताकार दल के प्रतिनिधि रहे उप विदेश मंत्री डॉ सैयद अब्बास आरागची। भारत के विदेश सचिव श्री गोखले ने ईरान के विदेश मंत्री डॉ जावेद जरीफ और ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खोमेनी के वरिष्ठ सलाहकार अली अकबर वेलायती से भी मुलाकात की।

दोनों देशो ने द्विपक्षीय सहयोग की चित्र में चाबहार बंदरगाह जैसी बुनियादी संपर्क विकास परियोजनाओं की स्थिति की समीक्षा की। साथ ही भारत-ईरान-अफगानिस्तान के त्रिपक्षीय ट्रांज़िट समझौते को भी पूरी तरह से क्रियान्वित करने पर बात हुई। दोनों देश इस बात पर सहमत हुए कि पारस्परिक लाभ के द्विपक्षीय सहयोग को इसी तरह से गति दी जाएगी और दोनों देशों के बीच विनिमय इसी तरह जारी रहेगा। इस बैठक में यह भी तय किया गया कि दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की संयुक्त बैठक जल्द ही ईरान में आयोजित की जाएगी।

विदेश विभाग कि इस वार्ता का विश्लेषण उस परिपेक्ष में किए जाने की आवश्यकता है जब अमेरिका द्वारा ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भारत ने ईरान से मई 2019 से तेल का आयात बंद कर दिया है। भारत में ईरान के राजदूत अली चेगेनी ने यह गौर किया कि जहां तुर्की, रूस और चीन के द्वारा जहां तेल का आयात जारी है वहीं भारत ने तेल आयात रोकने का फैसला किया। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भारत में भले ही ईरान से तेल के आयात को रोक दिया हो लेकिन ईरान के साथ उसकी अन्य क्षेत्रों में संपर्क और संबंध बरकरार हैं। भारत के ईरान के साथ संपर्क तेल आयात से बढ़कर हैं।

दोनों देश अफगानिस्तान को लेकर भी बातचीत कर रहे हैं। भारत ईरान के साथ आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को और आगे बढ़ाने की संभावनाओं का पता लगा रहा है। हाल ही में भारत रूस सम्मेलन के दौरान दोनों देश ईरान के साथ व्यापारिक और आर्थिक सहयोग जारी रहने पर सहमत हुए थे और इसे अपने हित में बताया था। अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण संपर्क गलियारा (आई एन टी सी) सहयोग परिषद कि मार्च 2019 में हुई 7वीं बैठक के दौरान हुए फैसलों पर कायम रहने के लिए भी भारत प्रतिबद्ध है।

इस साल मई में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव के बाद निश्चित रूप से भारत और ईरान के सामने एक चुनौती पेश की है। भारत इस बात की संभावनाओं का पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि ईरान के साथ अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरी करने के मामले में किस तरह से संबंध को बरकरार रखा जा सकता है। ईरान वर्ष 2006 तक भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश था। लेकिन 2013-14 तक यह खिसककर 7वें नंबर पर आ गया। हालांकि मई में तेल आयात रोके जाने से पहले तक भारत, चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा ईरानियन तेल का आयातक रहा। ऊर्जा के एक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में ईरान के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है।

पश्चिमी एशिया में भारत की बढ़ती दखल और यूरेशिया के लिए गेट वे होने के कारण ईरान भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है। अफगानिस्तान भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है जब ईरान के साथ संबंध बनाए जाने की बात आती है। ईरान से भारत के बेहतर संबंध ना सिर्फ आईएनएसटीसी और चाबहार जैसी संपर्क परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि अफगानिस्तान में सहयोग बढ़ाने, चीन, रूस, मध्य एशिया और अन्य क्षेत्रीय देशों में भारत के संतुलित सम्बन्धों के लिए भी मायने रखते हैं। ईरान-चीन-रूस, ईरान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-चीन और रूस के अलग गुट बनें इसलिए भी भारत को ईरान के साथ बेहतर रिश्ते रखना आवश्यक है।

भारत और ईरान के बीच बेहतर संबंधों की एक नई शुरुआत उस समय हुई जब मई 2016 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान की यात्रा की। उस दौरान दोनों देश सभी क्षेत्रों में रिश्ते बेहतर करने पर सहमत हुए। समग्र रणनीतिक आर्थिक सहयोग के अंतर्गत बुनियादी विकास परियोजनाओं, व्यापार, आर्थिक एवं ऊर्जा सहयोग और भारत-ईरान के पारस्परिक राजनीतिक एवं रणनीतिक रिश्तों को नया विस्तार देने पर सहमति बनी। इस दिशा में दोनों देश और आगे बढ़े जब 2018 फरवरी में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी तीन दिवसीय भारत दौरे पर आए और इस साल जनवरी में ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ ने भारत यात्रा की।

हालांकि विदेश विभागों की हालिया वार्ता और भारत के विदेश मंत्री की संभावित ईरान यात्रा इस बात की प्रतीक है कि ट्रम्प प्रशासन द्वारा ईरान को अलग-थलग करने की तमाम कोशिशों के बावजूद मोदी सरकार ईरान के साथ सभी संभावित क्षेत्रों में सम्बन्धों को विस्तार देने और बेहतर करने के लिए प्रतिबद्ध है। क्षेत्रीय स्तर पर द्वेष कम करने की इन कोशिशों से ना सिर्फ अमरीका और ईरान के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए बेहतर परिणाम की उम्मीद की जा सकती है।

आलेख-डॉ मीना सिंह रॉय, पश्चिमी एशिया व रूस मामलों के रणनीतिक विश्लेषक

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