तुर्की का "ऑपरेशन पीस स्प्रिंग" दिखावटी है
तुर्की सशस्त्र बलों ने बुधवार को "ऑपरेशन पीस स्प्रिंग" लॉन्च किया, तीन उद्देश्यों के साथ: सीरिया से लगती तुर्की की सीमाओं पर सुरक्षा सुनिश्चित करना, क्षेत्र में आतंकी सक्रियता बेअसर करना और यहां रहने वाले सीरियाई लोगों की आतंकवाद से रक्षा।
एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि उत्तर-पूर्वी सीरिया में तुर्की के एकतरफा सैन्य हमले को लेकर भारत गंभीर रूप से चिंतित था। भारत की आशंका है कि तुर्की की कार्रवाईयां क्षेत्र में स्थिरता और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर सकती हैं। मानवीय और नागरिक संकट पैदा करने का कारण भी बन सकता है। भारत ने तुर्की से संयम बरतने और सीरिया की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का आग्रह किया।
पिछले महीने, संयुक्त राष्ट्र महासभा में तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने उत्तर-पूर्वी सीरिया की स्थिति को लेकर अपने लम्बें सम्बोधन में विस्तार से बताया था। उन्होंने इस क्षेत्र में एक "सुरक्षित जगह" बनाने का प्रस्ताव सामने रखा जहां तुर्की अभी अपने यहां रह रहे सीरिया के 20 लाख शरणार्थियों को फिर से बसाने में सक्षम होगा। तुर्की राष्ट्रपति के प्रस्ताव में इस बात पर जोर दिया गया है कि इस तरह की सुरक्षित जगह बनाये जाने से सीरिया की क्षेत्रीय अखंडता का किसी प्रकार से उल्लंघन नहीं होगा।
हालांकि, तुर्की की एकतरफा कार्रवाई से सीरिया की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का अतिक्रमण निसंदेह होता है जो संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्यों में से एक है। सैन्यबलों के एकतरफा हमलों और संयुक्त राष्ट्र महासभा में सामंजस्य और संवाद पर केंद्रित तुर्की के राष्ट्रपति के संबोधन में विरोधाभास है।
यह पहली बार नहीं है कि तुर्की के सशस्त्र बलों ने संयुक्त राष्ट्र के सदस्य, एक संप्रभु देश के क्षेत्र में एकतरफा कार्रवाई की है। जुलाई 1974 में, तुर्की सशस्त्र बलों ने साइप्रस पर हमला किया। नवंबर 1974 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सर्वसम्मति से साइप्रस की क्षेत्रीय अखंडता को बरकरार रखते हुए 3212 प्रस्ताव पास किया और सभी विदेशी सशस्त्र बलों को साइप्रस हटाने का आग्रह किया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सर्वसम्मति से 13 दिसंबर 1974 के दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य-देशों के सर्वसम्मत विचार का समर्थन करते हुए 365 प्रस्ताव पास किया। लेकिन अब तक, तुर्की ने अपने सशस्त्र बलों की साइप्रस से वापसी के लिए लाये गये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 365 पर अमल नहीं किया है।
इस बार, उत्तर-पूर्वी सीरिया में तुर्की की एकतरफा सैन्य कार्रवाई निश्तित तौर पर उन आतंकी गतिविधि करने वालें उन लोगों के ख़िलाफ हो जिन्हें किसी देश का संरक्षण प्रत्यक्ष रूप सें प्राप्त नहीं हैं। सीरिया में 2011 में शुरू हुए हिंसक संघर्ष ने व्यापक क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है और इसमें इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक और दाएश के रूप में भी जाने जाने वालें लेवेंट (आईएसआईएल) जैसे आतंकवादी संगठनों की एक प्रमुख और विनाशकारी भूमिका रही है।
उत्तर-पूर्वी सीरिया में तुर्की ने कार्रवाई के जो उद्देश्य बताये है उनके अनुसार एक तो राजनीतिक डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी यानि PYD और इसकी पीपल्स प्रोटेक्शन यूनिट यानि वाईपीजी मिलिशिया को खत्म करना है क्योंकि तुर्की, इन्हें अपने देश में सक्रिय कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी यानि पीकेके की सीरियाई शाखा मानता है। 1984 से, कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी के लड़ाके कुर्दों को समान अधिकार दिलाने के लिए तुर्की के साथ सशस्त्र संघर्ष में लगे हुए हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ और तुर्की ने पीकेके को आतंकवादी समूह करार दिया है।
सीरियाई संघर्ष के दौरान, वाईपीजी मिलिशिया ने सीरिया की कुर्द आबादी को निशाना बना कर कियें गयें अल-कायदा से सम्बद्ध अल-नुसरा फ्रंट के हमलों का सफलतापूर्वक मुकाबला किया। आईएसआईएल का मुकाबला करने के लिए 2015 से संयुक्त राज्य अमेरिका से समर्थन प्राप्त सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेस या एसडीएफ पर वाईपीजी मिलिशिया भारी पड़ती रही है।
"ऑपरेशन पीस स्प्रिंग" शुरू करने पीछे औचित्य दिया गया है कि तुर्की ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रावधानों को लागू कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के अनुसार आत्मरक्षा के अधिकार को बनाये रखते हुए सदस्य देशों को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी कार्रवाई की "तुरंत रिपोर्ट" करनी चाहिए।।
तुर्की ने इस बात की पुष्टि की है कि उसने 10 अक्टूबर 2019 की बैठक में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अध्यक्ष को अपनी कार्रवाई की सूचना दी थी।, हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, फ्रांस और जर्मनी की सैन्य कार्रवाई के बजाय बातचीत करने के आहवान के बावजूद, तुर्की को उत्तर-पूर्वी सीरिया में एकतरफा सैन्य कार्रवाई रोकने के लिए राजी करने में सुरक्षा परिषद असमर्थ रही। ये कदम, अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए सुरक्षा परिषद (जिसमें सुधारों किये जाने की आवश्यकता है) उसकी निरंतर प्रभावहीनता का फिर से चित्रण ही करता दिख रहा है।
आलेख:- अम्ब. मुकेरजी, संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि
अनुवाद एवं स्वर- वीरेन्द्र कौशिक
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