मोदी-शी की मुलाक़ात विकास के लिए साझेदारी की प्रतिबद्धता का प्रतीक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मामल्लपुरम में शी जिनपिंग से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच इस अनौपचारिक शिखर वार्ता में परस्परिक चिंता के मुद्दों पर खुलकर और सहज वातावरण में बातचीत हुई। यह उम्मीद की जा रही है कि वैश्विक और क्षेत्रीय अस्थिरता के वर्तमान परिदृश्य में आने वाले समय में द्विपक्षीय रिश्तों में और स्थिरता आएगी तथा इसे विस्तार दिया जाएगा।
दूसरी अनौपचारिक शिखर वार्ता में एशिया की दो उभरती शक्तियों के दो ताकतवर नेताओं की चेन्नई के पास हुई इस बातचीत से दोनों देशों के बीच नज़दीकियाँ बढ़ेंगी। पहले दिन दोनों नेताओं के बीच बातचीत के मुद्दों में शामिल थे बड़े रणनीतिक मुद्दे, लोगों से लोगों के संपर्क, राष्ट्रीय विकास, व्यापार और आतंकवाद से सुरक्षा। दूसरे दिन काफी अहम विषय चर्चा के केंद्र में रहे, जब सीमा पर स्थिरता, आतंकवाद, व्यापार, निवेश और लोगों से लोगों के संपर्क आदि विषयों पर बातचीत हुई।
प्रधानमंत्री मोदी ने मामल्लपुरम मंदिर परिसर में पल्लव राजवंश के बारे में चीनी नेता को अवगत कराया। चीन ने हाल ही में एशियाई सभ्यता संवाद का आयोजन किया था। हालांकि भारत ने 2017 और 2019 में बेल्ट एंड रोड इनिशियटिव की तरह ही इस संवाद में भी भाग नहीं लिया। माना जा रहा है कि मामल्लपुरम में इस शिखर वार्ता से कुछ सकारात्मक बदलाव आएगा।
दोनों पक्षों की परस्परिक चिंताओं से जुड़े कई मुद्दों के बारे में स्पष्ट चर्चा हुई। भारतीय विदेश सचिव विजय गोखले ने स्पष्ट रूप से कहा कि बैठक में कश्मीर मुद्दा नहीं उठाया गया और न ही इसका उल्लेख न्यूयॉर्क में विदेश मंत्री की बैठक में चतुर्भुज सुरक्षा संवाद के हाल के उन्नयन पर चीनी पक्ष द्वारा किया गया था। व्यापार मूल्य श्रृंखला में वैश्विक अनिश्चितताओं के परिप्रेक्ष्य, कजमोर आर्थिक विकास दर और निवेश प्रवाह पर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी आपसी हित में इन मुद्दों पर एक साथ काम करने के लिए सहमत हुए। परंपरागत रूप से, भारत और चीन बहुध्रुवीय मुद्दों और वैश्वीकरण को बढ़ावा देने पर आगे आए हैं।
विदेश सचिव विजय गोखले ने बताया कि इस उच्च स्तरीय वार्ता में दोनों नेताओं ने सत्रह व्यापक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। वुहान शिखर सम्मेलन में पांच ऐसे मुद्दे थे जो चर्चा के लिए महत्वपूर्ण माने गए थे। इसमें रणनीतिक संचार, नए विश्वास निर्माण के उपायों के तहत सीमा पर स्थिरता कायम करना, व्यापार घाटे को कम करना, अफगानिस्तान में संयुक्त परियोजनाओं को शुरू करना और लोगों से लोगों के संपर्क का विस्तार करना शामिल था।
मामल्लपुरम वार्ता में उन पाँच बिंदुओं में से अफगानिस्तान के मुद्दे को छोड़कर बाकी चार पर चर्चा हुई। तालिबान और अमरीका के बीच चल रही बातचीत के असफल रहने और दोनों के किसी समझौते पर ना पहुँच पाने से क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति के लिए चिंता पैदा हो गई है।
व्यापार और निवेश से जुड़े मुद्दों को हल करने के लिए भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और चीन के उप-प्रधानमंत्री हू चुनहुआ के नेतृत्व में गठित उच्च-स्तरीय समिति ने अच्छी प्रगति की है। दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा 65 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चीन की व्यापार नीति भेदभावपूर्ण रही है। भारत में चीन की तरफ से शायद ही कोई निवेश होता है।
दोनों नेताओं ने लोगों से लोगों के संपर्क को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया। पिछले दिसंबर में चीनी विदेश मंत्री वांग यी की नई दिल्ली यात्रा के दौरान पर्यटन, युवा आदान-प्रदान, मीडिया और थिंक-टैंक मंचों, संग्रहालय प्रबंधन, तथा चीनी भाषा शिक्षकों से जुड़े समझौते हुए। इस साल अगस्त में विदेश मंत्री एस जयशंकर के बीजिंग दौरे में भी इन मुद्दों को बढ़ावा दिया गया। अभी हाल ही में भारत ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए चीनी नागरिकों को दिए जाने वाले ई-वीजा को और उदार बनाया।
इस अनौपचारिक मुलाकात ने भारत के तमिलनाडु और चीन के फ़ुज़ियान प्रांत के बीच समुद्री संपर्कों के विस्तार के साथ सिस्टर-स्टेट का तार जोड़ा। भारत और चीन के बीच समुद्री संपर्क में संभावनाओं का पता लगाने के उद्देश्य से एक अकादमी का भी गठन किया जाना है।
आमतौर पर अनौपचारिक शिखर बैठकें शायद ही कोई ठोस परिणाम देती हों क्योंकि इनका मुख्य उद्देश्य शीर्ष नेताओं के बीच एक अनुकूल वातावरण का सृजन करना होता है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी ने इस अनौपचारिक शिखर सम्मेलन को भी पारस्परिक समझ को बढ़ावा देने के एक अवसर के रूप में लिया, ताकि वुहान शिखर सम्मेलन और चेन्नई अनौपचारिक वार्ता का उद्देश्य पूरा हो और शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद की संभावना बढ़े। दोनों नेता भविष्य में इस अभ्यास को जारी रखने के लिए भी सहमत हुए। राष्ट्रपति शी ने प्रधानमंत्री मोदी को तीसरे अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के लिए चीन आने का न्यौता दिया जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने स्वीकार कर लिया है।
आलेख- प्रो॰ श्रीकांत कोंडापल्ली, चेयरमैन पूर्व एशिया अध्ययन केंद्र, जेएनयू
Comments
Post a Comment