भारत-चीन का उच्च स्तरीय आर्थिक और व्यापार संवाद तंत्र

मामल्लापुरम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिंपिंग की अनौपचारिक शीर्ष बैठक में एक उच्च स्तरीय आर्थिक और व्यापारिक संवाद तंत्र स्थापित किए जाने का उल्लेखनीय फ़ैसला लिया गया। ये निर्णय भारत और चीन के बीच सीमा विवाद सुलझाने के लिए विशेष प्रतिनिधियों की नियुक्ति के समान ही है। भारतीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और चीन के वाइस-प्रिमियर हू चुन हुआ इस संवाद तंत्र के अध्यक्ष होंगे।

इस अनौपचारिक शीर्ष बैठक का उद्देश्य सर्वोच्च नेतृत्व स्तर पर द्विपक्षीय संबंधों को और प्रगाढ़ करना था। इस तंत्र की स्थापना का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच महत्त्वपूर्ण और अतिआवश्यक मामलों पर तुरंत विचार-विमर्श करना है। इन मामलों में चीन के पक्ष में जाता हुआ पचास अरब डॉलर से भी ऊपर का व्यापार घाटा भी है। इस तंत्र के विषय में विस्तृत जानकारी साझा नहीं की गई है। ऐसे में ये प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय उद्योग को अपने विचार सामने रखने का अवसर मिलेगा।

इस तरह के द्विपक्षीय तंत्र की स्थापना का एक संभावित उद्देश्य हो सकता है कि विश्व व्यापार संगठन जैसे बहुपक्षीय मंच ऐसे मामलों को सुलझाने में सक्षम नहीं हैं। विश्व व्यापार संगठन की विवाद सुलझाने वाली समिति में अब तीन ही निर्णायक बचे हैं जो कि इसके क्रियाशील बने रहने के लिए न्यूनतम संख्या है। दिसम्बर 2019 में ये संभावित रूप से निष्क्रिय हो जाएगी क्योंकि दो और निर्णायक सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

विदेश मामलों के मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति ने भारत-चीन व्यापार मुद्दों के बारे में अपनी एक रिपोर्ट जमा करवाई है। इसके अनुसार व्यापार घाटा पूरी तरह भारत के ख़िलाफ़ है जो कि 56 अरब डॉलर से अधिक है और भारतीय वस्तुओं और सेवाओं को चीन से ग़ैर-शुल्क बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

इसके अतिरिक्त चीन की ओर से वस्तुओं की कम मूल्य में बिक्री और वास्तविक निवेश की कमी की वजह से व्यापार संबंध समस्याजनक बने हुए हैं। व्यापार संबंधों में एक नया आयाम सुरक्षा ज़रूरतों से जुड़ा है जिसकी वजह से भारत में हुवावे द्वारा पाँच जी सेवाएँ वापिस लेने की संभावना है। हाल ही में नई दिल्ली में चीनी अध्ययन संस्थान द्वारा आयोजित चीन के डिजीटल सिल्क रोड विषय पर आयोजित एक सम्मेलन में आँकड़ों के माध्यम से पता चला कि हुवावे और ZTE का भारत के दूरसंचार क्षेत्र में बाज़ार का 42प्रतिशत हिस्सा और स्मार्टफ़ोन बिक्री में चीनी कंपनियों का 66प्रतिशत हिस्सा है। इसके अतिरिक्त चीन द्वारा दस अरब डॉलर मूल्य का निवेश भी किया गया है।

जब तंत्र के अधिकार पत्र का विस्तार किया जाएगा तब ये देखना होगा कि इसका सांमजस्य किस प्रकार क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी के साथ बनता है जिसके बारे में मौजूदा समय में वार्ता की जा रही है। भारत यहाँ फिर से भारतीय बाज़ारों में चीनी सामान की भरमार, तकनीक हस्तांतरण के बिना निवेश और ई-कॉमर्स के लिए डाटा स्थानीकरण ज़रूरतों को लेकर चिंतित है। भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में चीन पहले से ही मज़बूत स्थिति में है।

इस तंत्र के गठन की प्रकृति पर सवाल बने हुए हैं क्योंकि हाल ही में जापान के साथ हुए इसी प्रकार के अनुभव से कुछ ख़ास लाभ नहीं हुआ है। 2014 में, औद्योगिक नीति और प्रमोशन विभाग, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार ने जापान प्लस नामक व्यवस्था तैयार की थी जो कि जापान से बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए निवेश मार्ग प्रस्ताव तेज़ करने हेतु एक विशेष प्रबंधन समिति थी। तब से इस में धीमी प्रगति रही है। प्रस्तावित चेन्नई-बेंग्लुरु औद्योगिक गलियारा अभी भी निर्माण चरण में है और भारत के 9 राज्यों में 12 जापान औद्योगिक उपनगर परियोजनाओं में कुछ प्रगति हासिल की गई है। प्रस्तावित तंत्र में भारत-जापान अनुभव से सामने आने वाली कमियों को दूर करने पर ध्यान दिया गया है।


द्विपक्षीय तंत्र में उन सभी कमियों पर विचार किया जाएगा जो चीन और अमरीका के बीच चिंता का विषय बनी हुई हैं। अमरीका और चीन अपने-अपने पक्ष पर अड़े हुए हैं और इस वजह से नुक्सान झेल रहे हैं। प्रस्तावित तंत्र में सेवा और औषधि क्षेत्र की भारतीय कंपनियों को शामिल किए जाने से भारत को पेइचिंग के साथ बेहतर सौदे करने में मदद मिलेगी। भारत की वास्तविक व्यापार चिंताओं को दूर करने की दिशा में कोई भी प्रगति एक अच्छा अनुपात रहेगी और आर्थिक तथा व्यापार संवाद तंत्र दोनों पक्षों को लाभ पहुँचा सकता है। ये भी देखना होगा कि प्रस्तावित तंत्र वर्तमान समस्याओं को सुलझाने पर ध्यान देगा या फिर नई आर्थिक सक्रियताओं के क्षेत्र तलाशेगा।


आलेख- डॉ. राजदीप, चीन के सामरिक मामलों के विश्लेषक

अनुवाद- नीलम मलकानिया

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