आरसीईपी समझौतों को लेकर भारत मुखर

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बातचीत का क्रम 2 से 4 नवंबर के बीच होने वाली आगामी पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन, आसियान शिखर सम्मेलन और अन्य संबंधित बैठकों से पहले पूरा होने की उम्मीद है। इससे जून 2020 में भागीदारी की औपचारिक शुरुआत के लिए मार्ग प्रशस्त होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन और अन्य बैठकों में भाग लेने के लिए अगले महीने की शुरुआत में बैंकॉक जाएंगे। बैठक के एजेंडे में आरसीईपी भी प्राथमिक मुद्दों में होगा।

आरसीईपी वार्ता में दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों का संगठन (आसियान) के दस सदस्य देश और इसके 6 संवाद सहयोगी भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और चीन शामिल हैं। आरसीईपी की शुरुआत नवंबर 2012 में हुई थी। इसके अंतर्गत पिछले सात वर्षों में प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को लेकर आसियान की बहुपक्षीय बातचीत हुई हैं।

इस मेगा-क्षेत्रीय व्यापार ब्लॉक की हालिया बैठक इस सप्ताह बैंकॉक में संपन्न हुई। 80 प्रतिशत से अधिक समझौते पूर्ण हो चुके हैं। बातचीत करने वाले देशों की 225 बिन्दुओं में से 185 पर सहमति लगभग बन चुकी है। इसमें प्रत्येक तीन में से एक बिन्दु वस्तु, सेवाओं और निवेशों से जुड़ा है।

आरसीईपी भारत सहित आसियान देशों और उनके सहयोगी देशों के लिए क्षेत्रीय आर्थिक संवाद की आधार के रूप में उभरा है। आरसीईपी वार्ता में भाग लेना भारत की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ का अहम हिस्सा है। जब आरसीईपी अपना वास्तविक स्वरूप ले लेगा तब सहभागी देशों के व्यापारिक रिश्तों में प्रगाढ़ता आएगी और पारस्परिक व्यापार बेहद आसान हो जाएगा।

हालाँकि, आरसीईपी वार्ताओं के संतोषजनक निष्कर्ष तक पहुँचने के रास्ते में अभी भी कई नाजुक मोड़ों से गुज़रना बाकी है। साझेदार देशों के बीच असहमति के प्रमुख मुद्दे हैं बाजार तक पहुंच और संरक्षित वस्तुएं। जिन आठ मुद्दों पर विशेष रूप से चिंता है, आरसीईपी वार्ता को अंतिम रूप देने से पहले मंत्री स्तर के संवादों की आवश्यकता थी। विवाद निपटान प्रक्रियाएं, ई-कॉमर्स और उत्पत्ति के नियम भारत के लिए महत्वपूर्ण चिंता के रूप में उभरे हैं।

बैंकॉक में मंत्री स्तरीय बैठक में, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। हालाँकि, बैठक का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका क्योंकि अधिकांश बकाया मुद्दे अनसुलझे रहे। आरसीईपी सहमति के लिए बैठक के संबंध में एक संयुक्त घोषणा में शामिल किए गए बिन्दुओं पर भी कोई सहमति नहीं बन सकी।

भारत सभी पक्षकारों से बातचीत करता रहा है जो यह दर्शाता है कि नई दिल्ली निष्पक्ष और न्यायपूर्ण क्षेत्रीय व्यापार व्यवस्था में अपने दृढ़ विश्वास के लिए प्रतिबद्ध है। हालाँकि, भारत की चिंताओं का सीधा संबंध अनधिकृत पहुँच से है जो चीन जैसे देशों को भारतीय बाजार में मिलेगा। चीन आरसीईपी वार्ता को तेजी से अंतिम रूप देने के लिए उत्सुक है क्योंकि यह बीजिंग को अमरीका के साथ चल रहे व्यापारिक टकराव में भारत जैसे बाजारों तक अधिक पहुंच पाने का रास्ता बनेगा।

भारत में कुछ क्षेत्रों में लागू किए गए आयात प्रतिबंधों ने भारत के चिंताग्रस्त क्षेत्रों को चीनी उत्पादों के अतिक्रमण से संरक्षण दिया है। लेकिन आरसीईपी लागू होने के बाद ऐसा नहीं हो सकेगा। इसके अलावा, चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के स्तर पर पहुँच गया है। बीजिंग ने भारत की चिंताओं को दूर करने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति के गठन का प्रस्ताव किया है। भारतीय अर्थव्यवस्था के उप-क्षेत्र सीधे ग्रामीण आबादी से जुड़े हैं। यही क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे अत्यधिक प्रतिस्पर्धी डेयरी उद्योगों की तुलना में सबसे पहले असुरक्षित होंगे। ऐसी संभावित चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए भारत किसी विशेष देश द्वारा डंपिंग से बचने के लिए डेटा स्थानीयकरण, उत्पत्ति के नियमों और आयात पर कैप लगाने जैसे मुद्दों पर सक्रिय रूप से बातचीत कर रहा है।

भारत आरसीईपी में शामिल होने के लिए तैयार है बशर्ते सभी नई दिल्ली के प्रस्तावित सुरक्षा तंत्र समझौतों में शामिल हों। इस तरह के सुरक्षा उपाय यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि भारतीय समाज के कमजोर वर्गों और अर्थव्यवस्था के कमजोर क्षेत्रों, विशेष रूप से सीमांत किसानों और मध्यम तथा लघु-उद्यम को नुकसान ना पहुंचे। सरकार के दृष्टिकोण को दोहराते हुए, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि किसी भी मुक्त-व्यापार समझौते को लागू करने से पहले घरेलू उद्योग और हर भारतीय के हित को संरक्षित किया जाना चाहिए। भारत यह सुनिश्चित करेगा कि सेवाओं पर, निवेश पर, हर हाल में हमारे राष्ट्रीय हितों की रक्षा हो।

भारत क्षेत्रीय और बहुपक्षीय व्यापार तथा आर्थिक सहयोग व्यवस्था के साथ अपने देश के लोगों के हितों की रक्षा करने के बीच संतुलन का पक्षधर है।

आलेख- डॉ. राहुल मिश्रा, पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के रणनीतिक विश्लेषक

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