भारत-सऊदी अरब के रिश्ते लेन देन से बढ़कर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सऊदी अरब की दो दिवसीय यात्रा रियाद के प्रति भारत की नीतियों में हो रहे बदलाव और उसके संभावित लाभों को रेखांकित करती है। हज तीर्थयात्रा और सऊदी अरब से भारत में ऊर्जा आयात परंपरागत रूप से, संबंधों का आधार रहे हैं; लेकिन हाल के वर्षों में दोनों देश लेन-देन से आगे बढ़कर संबंधों को मजबूत करने के लिए काम कर रहे हैं।

तीसरे क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान द्वारा आयोजित तीसरे फ्यूचर इन्वेस्टमेंट इनिशिएटिव (एफ़आईआई) में प्रधानमंत्री मोदी का मुख्य भाषण, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। एफ़आईआई को दावोस इन द डेजर्ट के नाम में भी जाना जाता है। एफआईआई का उद्देश्य गैर-पारंपरिक ऊर्जा, ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था, पर्यटन, मनोरंजन के क्षेत्र जैसे गैर-तेल क्षेत्रों निवेश के अवसरों का पता लगाना है ताकि सऊदी अरब की तेल पर निर्भरता को कम किया जा सके। क्राउन प्रिंस की यह पहल प्रधानमंत्री मोदी की भारत को 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने की महत्वाकांक्षा से मेल खाती है।

यह यात्रा सऊदी अरब के साथ भारत की बढ़ती मित्रता का हिस्सा है। वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के पद संभालने के बाद से दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच यह आठवीं बैठक थी; क्राउन प्रिंस के साथ छठी और इस साल तीसरा जबकि जम्मू और कश्मीर से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के हटाये जाने के बाद पहली बैठक थी। उल्लेखनीय है कि अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद मध्य पूर्व और अरब तथा इस्लामी देशों के साथ पाकिस्तान की राजनयिक व्यस्तता काफी बढ़ी है।

हालाँकि, 2006 में किंग अब्दुल्ला की भारत यात्रा के दौरान जारी दिल्ली घोषणा पत्र में द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने की पहल को हरी झंडी दिखाई गई थी। इसके बावजूद हाल के दिनों तक प्रगति धीमी थी। अब बदलाव हो रहा है। इसका प्रमाण है महाराष्ट्र में पेट्रोकेमिकल रिफाइनरी में सऊदी अरब की निवेश करने की इच्छा और दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको की रिलायंस में 15 बिलियन अमरीकी डॉलर की हिस्सेदारी खरीदने की इच्छा।

यात्रा के दौरान, प्रधानमंत्री मोदी ने किंग सलमान सहित सऊदी अन्य बड़े नेताओं से मुलाक़ात की। इससे पहले किंग सलमान से श्री मोदी पहली बार नवंबर 2014 में ब्रिस्बेन जी -20 शिखर सम्मेलन के दौरान मिले थे जब किंग सलमान सऊदी के क्राउन प्रिंस थे। उसके बाद भारतीय प्रधानमंत्री की अप्रैल 2016 की किंगडम ऑफ सऊदी की यात्रा के दौरान मिले थे। इस तरह किंग सलमान से उनकी यह तीसरी मुलाक़ात है।

प्रधानमंत्री की यात्रा के आखिर में संयुक्त वक्तव्य जारी किया गया, जिसमें दोनों देशों ने संयुक्त रूप से किसी भी देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को स्पष्ट तौर पर नकारा और देशों की संप्रभुता पर बाहरी अतिक्रमण को रोकने के दायित्व की अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को याद दिलाई। इसके कूटनीतिक निहितार्थ स्पष्ट हैं। एक तरफ भारत सीमा पार आतंकवाद का सामना कर रहा है तो दूसरी ओर सऊदी के तेल सयंत्रों पर ड्रोन हमले हो रहे हैं। इस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पर्याप्त रूप से सक्रिय होने आवश्यकता।

यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य भारतीय प्रधानमंत्री और सऊदी क्राउन प्रिंस की अध्यक्षता में रणनीतिक भागीदारी परिषद की स्थापना था। इसका मतलब है कि शीर्ष नेता नियमित रूप से द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए बैठकें करेंगे।

भारत के प्रधानमंत्री की इस यात्रा के दौरान ऊर्जा, नागरिक उड्डयन, सुरक्षा सहयोग, रक्षा तथा चिकित्सा उत्पादों के विनियमन सहित एक दर्जन समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। भारतीय प्रधानमंत्री ने सऊदी अरब में रु-पे कार्ड भी लॉन्च किया। संयुक्त बयान ने फिलिस्तीनी के समर्थन जैसे पारंपरिक मुद्दों को भी महत्व दिया गया। विदेश नीति के अंतर्गत दोनों नेताओं ने यमन पर चर्चा की, जो कि सऊदी अरब के लिए गंभीर चिंता का विषय है। सीरियाई मुद्दे पर भी विचार-विमर्श किया गया था।

प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के ऊर्जा तंत्र को सऊदी निवेश का संभावित लक्ष्य बताया और अगले कुछ वर्षों में 100 बिलियन अमरीकी डॉलर के आंकड़े का उल्लेख भी किया। इस तरह भारत के प्रधानमंत्री की इस सऊदी यात्रा ने दोनों देशों के बीच भारत के सामरिक तेल भंडार, सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के पेट्रोकेमिकल संयंत्रों सहित विभिन्न क्षेत्रों के संदर्भ में एक मजबूत आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी के लिए मंच तैयार किया है। हालांकि प्रधानमंत्री की रियाद यात्रा के निर्णायक परिणाम कम समय सीमा में दोनों देशों द्वारा तय लक्ष्यों को हासिल करने से मापे जाएंगे।

आलेख- प्रो पीआर कुमारस्वामी, अध्यक्ष सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़, जेएनयू

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