पेरिस समझौते से अमरीका का वापस लौटना चिंता का विषय
वर्ष 2015 में हुए ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते से अमरीका का अलग होना समूची दुनिया के लिए और खुद अमरीका के लिए भी बड़ी चिंता का विषय है। वापसी की प्रक्रिया ट्रम्प प्रशासन द्वारा औपचारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र को पिछले सोमवार को सूचित करने के साथ शुरू हुई। अधिसूचना के वितरण के एक साल बाद यह प्रभावी होगा।
यह घोषणा स्पेन के मैड्रिड में आगामी 2 से 13 दिसंबर के बीच होने वाली संयुक्त राष्ट्र की जलवायु (COP25) वार्ता से लगभग एक महीने पहले की गई है। सैंटियागो में इस बैठक की मेजबानी चिली को करनी थी, लेकिन चिली में जारी नागरिक टकराव के कारण उसने इससे माना कर दिया है।
वर्ष 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते पर लगभग 200 देशों ने हस्ताक्षर किए गए थे। इसका उद्देश्य तापमान को खतरनाक स्तर तक बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम करना है। इसका लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है। अमरीका का यह फैसला दुनिया के इस लक्ष्य को गंभीर रूप से खतरे में डाल सकता है।
पेरिस संधि से हटने वाला अमरीका एकमात्र देश है। यह दुनिया की ग्रीनहाउस गैसों का दूसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। पहले नंबर पर चीन है। अमरीका ने 2025 तक अपने देश में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 26 से 28 प्रतिशत तक कम करने का वादा किया है। अमरीका के बाहर निकलने बाद अब यह समझौता वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के केवल 80 प्रतिशत को कवर करेगा जबकि पहले 97 प्रतिशत को कवर कर रहा था।
सबसे बड़ा प्रभाव जलवायु परिवर्तन पर क़दम उठाने के लिए वित्तीय प्रवाह पर पड़ सकता है। अमरीका वैश्विक स्तर पर वित्तीय संसाधन जुटाने में प्रमुख भूमिका निभाता है। ट्रम्प प्रशासन ने ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) के लिए अपनी सभी मदद को भी रोक दिया है, जो जलवायु से जुड़ी कार्रवाई के लिए विकासशील देशों को वित्त प्रदान करने का मुख्य श्रोत हुआ करता था।
नतीजतन, अब दुनिया भर का ध्यान चीन और भारत जैसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों पर है। इन देशों से उत्सर्जन कम करने के लिए और अधिक करने की उम्मीद की जाएगी। उन्हें विकासशील देशों के लिए वित्त और प्रौद्योगिकी के मामले में अंतर को कम करना होगा, इसके अलावा उत्सर्जन को कम करने के लिए घरेलू कार्रवाई करनी होगी।
भारत अपनी पेरिस प्रतिबद्धताओं की दिशा में मजबूती से प्रगति कर रहा है। भारत ने घोषणा की है कि वह कोन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (COP) में 2030 के लिए निर्धारित जलवायु परिवर्तन के अधिकांश लक्ष्यों को अगले डेढ़ वर्षों में प्राप्त कर लेगा। पेरिस में COP21 में, भारत ने चार वादे किए थे।
भारत उन देशों में से है जो कार्बन उत्सर्जन में कमी करने के रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इसके लिए गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा उत्पादन संयंत्रों का विस्तार कर 40 प्रतिशत तक करना 2005 के मुक़ाबले 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 33 से 35 प्रतिशत तक की कमी लाना है। इन लक्ष्यों को जल्द ही हासिल कर लिए जाने की संभावना है। 2030 तक इसके भी आगे जाना है। भारत तेज गति से नवीकरणीय ऊर्जा श्रोतों को अपना रहा है। मुख्यतः सौर ऊर्जा को अपनी ऊर्जा जरूरतों का श्रोत बनाने के लिए तेज़ी से काम कर रहा है। सौर ऊर्जा क्षेत्र में विदेशी निवेश की काफी संभावनाएं हैं। यह मेक इन इंडिया पहल को भी बढ़ावा देगा।
जबकि बहुत कुछ करने की आवश्यकता है, भारत की प्रतिबद्धता कुछ ऐसे है जो 2 डिग्री सेल्सियस उत्सर्जन प्रक्षेपवक्र परिदृश्य के साथ संगत हैं।
हालांकि अमेरिका की वापसी का भारत पर सीधा असर नहीं पड़ सकता है, लेकिन यह भविष्य की जलवायु नीतियों को प्रभावित करेगा। भारत जलवायु परिवर्तन के लिए एक संवेदनशील देश होने के नाते, यह आगे एक कठिन काम है। इसमें देश की विकास परियोजनाओं पर कुछ नतीजे भी हो सकते हैं।
भारत नवीकरणीय ऊर्जा में एक वैश्विक अगुआ के रूप में उभर रहा है। यह जीवाश्म ईंधन की तुलना में उनमें अधिक निवेश कर रहा है। भारत ने यह भी कहा है कि यह अपनी दीर्घकालिक योजनाओं और रणनीतियों को अंतिम रूप देगा, जिसके परिणामस्वरूप 2020 तक कार्बन डाइऑक्साइड सहित अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कमी आएगी। इसी क्रम में स्थायी वन प्रबंधन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों को कम किया जाना है। राष्ट्रीय वन नीति 2018 के मसौदे के अंतर्गत वैज्ञानिक विधि और सख्त नियमों के माध्यम से भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का न्यूनतम एक तिहाई भाग वन क्षेत्र के अंतर्गत लाना है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत को कुछ और अंतर्राष्ट्रीय पहल करनी होंगी, जैसा फ्रांस के साथ मिलकर इसने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के संदर्भ में किया। भारत के पास अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है। लेकिन भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा के उद्देश्य को हासिल करें के लिए लगातार आगे बढ़ रहा है।
आलेख- के.वी. वेंकटसुब्रमन्यन
अनुवाद/वचन- देवेंद्र त्रिपाठी
यह घोषणा स्पेन के मैड्रिड में आगामी 2 से 13 दिसंबर के बीच होने वाली संयुक्त राष्ट्र की जलवायु (COP25) वार्ता से लगभग एक महीने पहले की गई है। सैंटियागो में इस बैठक की मेजबानी चिली को करनी थी, लेकिन चिली में जारी नागरिक टकराव के कारण उसने इससे माना कर दिया है।
वर्ष 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते पर लगभग 200 देशों ने हस्ताक्षर किए गए थे। इसका उद्देश्य तापमान को खतरनाक स्तर तक बढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम करना है। इसका लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है। अमरीका का यह फैसला दुनिया के इस लक्ष्य को गंभीर रूप से खतरे में डाल सकता है।
पेरिस संधि से हटने वाला अमरीका एकमात्र देश है। यह दुनिया की ग्रीनहाउस गैसों का दूसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। पहले नंबर पर चीन है। अमरीका ने 2025 तक अपने देश में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 26 से 28 प्रतिशत तक कम करने का वादा किया है। अमरीका के बाहर निकलने बाद अब यह समझौता वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के केवल 80 प्रतिशत को कवर करेगा जबकि पहले 97 प्रतिशत को कवर कर रहा था।
सबसे बड़ा प्रभाव जलवायु परिवर्तन पर क़दम उठाने के लिए वित्तीय प्रवाह पर पड़ सकता है। अमरीका वैश्विक स्तर पर वित्तीय संसाधन जुटाने में प्रमुख भूमिका निभाता है। ट्रम्प प्रशासन ने ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) के लिए अपनी सभी मदद को भी रोक दिया है, जो जलवायु से जुड़ी कार्रवाई के लिए विकासशील देशों को वित्त प्रदान करने का मुख्य श्रोत हुआ करता था।
नतीजतन, अब दुनिया भर का ध्यान चीन और भारत जैसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों पर है। इन देशों से उत्सर्जन कम करने के लिए और अधिक करने की उम्मीद की जाएगी। उन्हें विकासशील देशों के लिए वित्त और प्रौद्योगिकी के मामले में अंतर को कम करना होगा, इसके अलावा उत्सर्जन को कम करने के लिए घरेलू कार्रवाई करनी होगी।
भारत अपनी पेरिस प्रतिबद्धताओं की दिशा में मजबूती से प्रगति कर रहा है। भारत ने घोषणा की है कि वह कोन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (COP) में 2030 के लिए निर्धारित जलवायु परिवर्तन के अधिकांश लक्ष्यों को अगले डेढ़ वर्षों में प्राप्त कर लेगा। पेरिस में COP21 में, भारत ने चार वादे किए थे।
भारत उन देशों में से है जो कार्बन उत्सर्जन में कमी करने के रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इसके लिए गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा उत्पादन संयंत्रों का विस्तार कर 40 प्रतिशत तक करना 2005 के मुक़ाबले 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 33 से 35 प्रतिशत तक की कमी लाना है। इन लक्ष्यों को जल्द ही हासिल कर लिए जाने की संभावना है। 2030 तक इसके भी आगे जाना है। भारत तेज गति से नवीकरणीय ऊर्जा श्रोतों को अपना रहा है। मुख्यतः सौर ऊर्जा को अपनी ऊर्जा जरूरतों का श्रोत बनाने के लिए तेज़ी से काम कर रहा है। सौर ऊर्जा क्षेत्र में विदेशी निवेश की काफी संभावनाएं हैं। यह मेक इन इंडिया पहल को भी बढ़ावा देगा।
जबकि बहुत कुछ करने की आवश्यकता है, भारत की प्रतिबद्धता कुछ ऐसे है जो 2 डिग्री सेल्सियस उत्सर्जन प्रक्षेपवक्र परिदृश्य के साथ संगत हैं।
हालांकि अमेरिका की वापसी का भारत पर सीधा असर नहीं पड़ सकता है, लेकिन यह भविष्य की जलवायु नीतियों को प्रभावित करेगा। भारत जलवायु परिवर्तन के लिए एक संवेदनशील देश होने के नाते, यह आगे एक कठिन काम है। इसमें देश की विकास परियोजनाओं पर कुछ नतीजे भी हो सकते हैं।
भारत नवीकरणीय ऊर्जा में एक वैश्विक अगुआ के रूप में उभर रहा है। यह जीवाश्म ईंधन की तुलना में उनमें अधिक निवेश कर रहा है। भारत ने यह भी कहा है कि यह अपनी दीर्घकालिक योजनाओं और रणनीतियों को अंतिम रूप देगा, जिसके परिणामस्वरूप 2020 तक कार्बन डाइऑक्साइड सहित अन्य ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कमी आएगी। इसी क्रम में स्थायी वन प्रबंधन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों को कम किया जाना है। राष्ट्रीय वन नीति 2018 के मसौदे के अंतर्गत वैज्ञानिक विधि और सख्त नियमों के माध्यम से भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का न्यूनतम एक तिहाई भाग वन क्षेत्र के अंतर्गत लाना है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत को कुछ और अंतर्राष्ट्रीय पहल करनी होंगी, जैसा फ्रांस के साथ मिलकर इसने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के संदर्भ में किया। भारत के पास अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना है। लेकिन भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा के उद्देश्य को हासिल करें के लिए लगातार आगे बढ़ रहा है।
आलेख- के.वी. वेंकटसुब्रमन्यन
अनुवाद/वचन- देवेंद्र त्रिपाठी
Comments
Post a Comment