भारत-प्रशांत ट्रैक 1.5 डायलॉग

ऐसे समय में जबकि एक मुक्त और खुले भारत-प्रशांत क्षेत्र को लेकर भू-राजनैतिक विचार-विमर्श ज़ोर पकड़ रहा है, भारत ने नई दिल्ली में दो वार्ताओं का आयोजन किया। पहली है ट्रैक 1.5 डायलॉग और दूसरी डैल्ही डायलॉग-11। पहली वार्ता में, छठी भारत महासागर वार्ता भी शामिल रही। उद्देश्य था जून-2019 में भारत-प्रशांत क्षेत्र को लेकर आसियान दृष्टिकोण की घोषणा के बाद एक खुले, मुक्त, समावेशी और नियम आधारित भारत-प्रशांत क्षेत्र के संबंध में रणनीतिक अवधारणा पर चर्चा करना। इससे पहले जून-2018 में शैंगरी-ला वार्ता में भी भारत, भारत-प्रशांत क्षेत्र को लेकर अपना दृष्टिकोण व्यक्त कर चुका था। यह पहला अवसर रहा जब एक के बाद एक दो ट्रैक 1.5 वार्ताओं का आयोजन हुआ। 

भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने कहा कि इस क्षेत्र के संबंध में भारत के नज़रिए से पश्चिमी प्रशांत महासागर, खाड़ी और अफ्रीकी देश भी पूर्वी हिंद महासागर के साथ शमिल हैं। भारत-प्रशांत को लेकर विभिन्न पक्षों की व्याख्या में तालमेल बैठाते हुए आपसी सहमति के तत्व चिन्हित करने पर चर्चा हुई। भारत ने नवंबर-2019 में भारत-प्रशांत क्षेत्र की पहल की। उद्देश्य है एक ऐसा सहयोगी मंच तैयार करना जहाँ समुद्री सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं पर मिलकर काम किया जा सके। समुद्री पर्यावरण का प्रबंधन प्राकृतिक आपदाओं का सामना और समुद्री संसाधनो का समुचित इस्तेमाल कुछ ऐसे ही पहलू हैं। 

इसके अतिरिक्त उच्च गुणवत्ता सहित वित्तीय सहायता के बल पर क्षेत्रीय सम्पर्क और बुनियादी ढाँचे का निर्माण सभी पक्षों के लिए नए अवसर खोलेगा और यह आसियान कनेक्टिविटी के मास्टर प्लॉन के अनुरुप होगा। इसके अतिरिक्त कम क़ीमत वाले ऊर्जा कुशल तरीक़ों से पानी से नमक अलग करने की सुविधाओं को बढ़ावा देना इस वार्ता से अलग सहयोग का अन्य पहलू है। इसके तहत भारत-प्रशांत वृत्त परिसंघ आईओआरए के लिए एक बड़ी योजना भी शामिल है और पोस्ट डॉक्टरल अनुसंधान के माध्यम से भी इसे बढ़ावा दिया जा सकता है। दिल्ली डायलॉग में औद्यौगिक क्रांति 4.0 के तहत भारत-प्रशांत क्षेत्र में दूरियों को कम करने का भी लक्ष्य है।

भारत-प्रशांत वृत्त परिसंघ के महासचिव डॉ. नोमव्यो नोकवे ने विभिन्न क्षेत्रीय व्यवस्थाओं जैसे आईओआरए, आसियान और बिम्सटेक के बीच तालमेल बैठाने के पक्ष में बात की ताकि सदस्यों के आपसी लाभ के लिए भारत-प्रशांत व्यवस्था आईओआरए के तीन सिद्धांतो से निर्देशित हो। यह सिद्धांत हैं- पारस्परिक सहमति, सम्प्रभुता पर आधारित समानता और नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय प्रणाली।

इंडोनेशिया की विदेश मंत्री सुश्री रत्नो एलपी मर्सुदी ने आसियान दृष्टिकोण के सकारात्मक पहलुओं की चर्चा एक ऐसे समय में की जबकि महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, संरक्षणवाद का फैलाव हो रहा है और पारस्परिक विश्वास में कमी आ रही है। भारत-प्रशांत क्षेत्र में मौजूद समुद्र मार्गों के रणनीतिक महत्व को देखते हुए उन्होंने इस क्षेत्र को सर्वसमावेशी, पारदर्शी और खुला बनाते हुए अंतरराष्ट्रीय क़ानून की अनुपालना पर बल दिया। दुनिया के कुल व्यापार का 40 प्रतिशत से अधिक आज भी समुद्र मार्गों से होता है, इसलिए यह सभी के भविष्य से जुड़ा है। दुनिया के कुल कच्चे तेल का 61 प्रतिशत समुद्र मार्ग से ही वितरित होता है और विश्व की कुल समुद्र संपदा को 24 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर के बराबर आंका गया है। इस प्रकार समुद्र तो परस्पर सहयोग और एकता का माध्यम बनना चाहिए न कि आपसी झगड़े का। 

आपसी बातचीत में यह बात उभरकर आई कि भारत-प्रशांत समुद्र क्षेत्र में भारत-आसियान सहयोग पारम्परिक और नई सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, भारत-आसियान आर्थिक सहयोग समुद्री क्षेत्र में बुनियादी ढाँचे और सम्पर्क परियोजनाओं को लेकर सहयोग के नए अवसर भी पैदा कर सकता है। भारत-प्रशांत क्षेत्र में चल रही कई सम्पर्क परियोजनाओं को देखत हुए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि इनके बीच सामंजस्य बैठाया जाए। 

एक भारत-प्रशांत समुदाय की स्थापना में निहित चुनौती का सामना केवल सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रिश्तों के आधार पर नहीं बल्कि रणनीतिक अनिवार्यता के आधार पर होना चाहिए। इन वार्ताओं में सभी साझेदारों ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में खुला, मुक्त, समावेशी, नियमों पर आधारित ऐसा ढाँचा बनाने पर बल दिया जहाँ सभी देशों को समान दर्जा हासिल हो।

आलेख- डॉ तितली बसु, रणनीतिक सामरिक विश्लेषक, पूर्वी-दक्षिण पूर्व एशिया

अनुवाद- मुनीश शर्मा

Comments

Popular posts from this blog

भारत ने फिजी को पहुंचाई मानवीय सहायता

आत्मनिर्भर भारत में प्रवासियों की भूमिका

अरब-भारत सहयोग फोरम की बैठक