भारत-चीन की 22वीं विशेष प्रतिनिधिस्तर वार्ता प्रगति पर
सीमा मसले पर वार्ता के लिए चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भारत दौरा किया। यहाँ उन्होंने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ बातचीत की। श्री वांग ने उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू से भी मुलाकात की। विशेष प्रतिनिधिस्तर की यह 22वीं यात्रा थी। यह वार्ता कुछ कारणों से महत्वपूर्ण थी। अक्टूबर 2019 में चेन्नई के पास मामल्लपुरम में भारतीय प्रधानमंत्री और चीनी राष्ट्रपति ने दूसरे अनौपचारिक शिखर सम्मेलन में भाग लिया था। शिखर सम्मेलन के आखिर में, दोनों नेता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आपसी विश्वास निर्माण के उपायों (सीबीएम) पर काम किए जाने की आवश्यकता है ताकि सीमाओं पर शांति रहे।
भारत का पक्ष रखते हुए, एनएसए अजीत डोभाल ने कहा कि दोनों पक्षों के नेतृत्व ने "द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर करने और सीमा से जुड़े मुद्दों के निपटारे के लिए एक नया दृष्टिकोण और रणनीतिक दिशा अपनाए जाने की आवश्यकता है। चीनी पक्ष ने कहा कि वार्ता के बाद भारत और चीन "प्रबंधन नियम बनाने" पर सहमत हुए हैं, और "सीमा पर खड़ी एक दूसरे की सेनाओं के बीच संचार और आदान-प्रदान को बेहतर करने पर भी राज़ी हुए हैं। बार्डर मीटिंग पॉइंट भी जोड़े जाने पर सहमति बनी है। इस सीमा वार्ता से दोनों पक्ष इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सुरक्षा का वातावरण सुनिश्चित किए जाने की ज़रूरत है, सैन्य आधुनिकीकरण में तेज़ी लाने की आवश्यकता है, सीमा प्रबंधन को बेहतर किए जाने की ज़रूरत है ताकि में किसी तरह की गड़बड़ी ना हो।
भारत द्वारा लद्दाख क्षेत्र को जम्मू कश्मीर राज्य से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद यह 22वीं सीमा वार्ता हुई है। जम्मू और कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने पर चीन मुखरता से विरोध कर रहा था कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लाकर पाकिस्तान का समर्थन कर रहा था। हालाँकि उसके इन प्रयासों को भारत ने बेहतर कूटनीति के दम पर विफल कर दिया था।
सीमा वार्ता से ठीक पहले चीन ने एक बार फिर कश्मीर मुद्दे पर चर्चा के लिए एक बैठक का प्रस्ताव रखा। हालाँकि, बैठक को स्थगित कर दिया गया क्योंकि संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन सदस्यों को स्थिति के बारे में जानकारी देने में सक्षम नहीं था। इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत ने कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन की रिपोर्ट तैयार होने के बाद एक फिर बैठक के लिए अनुरोध करेंगे। भारत ने यह विशेष तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि दोनों पक्षों को एक दूसरे का सम्मान करना होगा। खासतौर पर संवेदनशील मसलों पर ध्यानपूर्वक कोई भी रुख अपनाना होगा। भारत का रुख साफ है कि चीन को भारत के किसी भी क़दम पर संवेदनशील होना होगा क्योंकि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के साथ कोई समझौता नहीं करने वाला है।
चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है कि चीन ने सीमा मुद्दों के हल के लिए बातचीत के लिए एक "व्यावहारिक ढांचा" सामने रखा है जिस पर भारत ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। यह हाल के वर्षों में सीमा वार्ता के बारे में आए सकारात्मक बयानों में से एक है। हालांकि रूपरेखा का विवरण अभी सामने नहीं आया है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि भारतीय पक्ष इसकी सार्थकता पर विचार कर रहा है या नहीं। सीमा वार्ता शुरू होने से पहले, चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने उल्लेख किया था कि दोनों पक्ष सीमा के परिसीमन पर अपने विचार एक दूसरे से साझा करेंगे। हालांकि बातचीत के लिए अंतिम रूपरेखा के संबंध में किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर अभी नहीं हुए हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि इस पक्ष का ढांचा जो भी हो दोनों पक्षों को समान रूप से स्वीकार्य होना चाहिए।
सीमा वार्ता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देश अगले साल अपने राजनयिक संबंधों की 70 वीं वर्षगांठ मनाएंगे। ऐसे में दोनों देशों की इच्छा है कि इस अवसर से पहले द्विपक्षीय संबंधों में सुधार के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रगति होनी चाहिए। इस क्रम में अगले वर्ष की योजना केंद्र में है दोनों देशों के लोगों का एक दूसरे के देशों में आवागमन में वृद्धि और सहयोग बढ़ाना। चीन इसे 'दोस्ती की सामाजिक और सार्वजनिक नींव' कहता है और एक-दूसरे के सांस्कृतिक तौर-तरीकों के बारे में समझ विकसित करना एक प्राथमिकता है। यह दोनों देशों की सांस्कृतिक विरासत का उपयोग कर द्विपक्षीय सहयोग को प्रोत्साहित करने के लिए भू-राजनीतिक नज़रिये से हटकर सोचने की भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विचारधारा के भी अनुरूप है।
इस विशेष प्रतिनिधिस्तर की बातचीत के निष्कर्षों के आधार पर कह सकते हैं कि भारत-चीन संबंधों में कई उतार-चढ़ाव के बाद अब द्विपक्षीय सम्बन्धों में सुधार के ठोस और सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं।
आलेख- डॉ एमएस प्रतिभा, चीन मामलों की विश्लेषक
अनुवाद/वाचन- देवेंद्र त्रिपाठी
भारत का पक्ष रखते हुए, एनएसए अजीत डोभाल ने कहा कि दोनों पक्षों के नेतृत्व ने "द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर करने और सीमा से जुड़े मुद्दों के निपटारे के लिए एक नया दृष्टिकोण और रणनीतिक दिशा अपनाए जाने की आवश्यकता है। चीनी पक्ष ने कहा कि वार्ता के बाद भारत और चीन "प्रबंधन नियम बनाने" पर सहमत हुए हैं, और "सीमा पर खड़ी एक दूसरे की सेनाओं के बीच संचार और आदान-प्रदान को बेहतर करने पर भी राज़ी हुए हैं। बार्डर मीटिंग पॉइंट भी जोड़े जाने पर सहमति बनी है। इस सीमा वार्ता से दोनों पक्ष इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सुरक्षा का वातावरण सुनिश्चित किए जाने की ज़रूरत है, सैन्य आधुनिकीकरण में तेज़ी लाने की आवश्यकता है, सीमा प्रबंधन को बेहतर किए जाने की ज़रूरत है ताकि में किसी तरह की गड़बड़ी ना हो।
भारत द्वारा लद्दाख क्षेत्र को जम्मू कश्मीर राज्य से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद यह 22वीं सीमा वार्ता हुई है। जम्मू और कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने पर चीन मुखरता से विरोध कर रहा था कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लाकर पाकिस्तान का समर्थन कर रहा था। हालाँकि उसके इन प्रयासों को भारत ने बेहतर कूटनीति के दम पर विफल कर दिया था।
सीमा वार्ता से ठीक पहले चीन ने एक बार फिर कश्मीर मुद्दे पर चर्चा के लिए एक बैठक का प्रस्ताव रखा। हालाँकि, बैठक को स्थगित कर दिया गया क्योंकि संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन सदस्यों को स्थिति के बारे में जानकारी देने में सक्षम नहीं था। इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र में चीन के राजदूत ने कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन की रिपोर्ट तैयार होने के बाद एक फिर बैठक के लिए अनुरोध करेंगे। भारत ने यह विशेष तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि दोनों पक्षों को एक दूसरे का सम्मान करना होगा। खासतौर पर संवेदनशील मसलों पर ध्यानपूर्वक कोई भी रुख अपनाना होगा। भारत का रुख साफ है कि चीन को भारत के किसी भी क़दम पर संवेदनशील होना होगा क्योंकि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के साथ कोई समझौता नहीं करने वाला है।
चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है कि चीन ने सीमा मुद्दों के हल के लिए बातचीत के लिए एक "व्यावहारिक ढांचा" सामने रखा है जिस पर भारत ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। यह हाल के वर्षों में सीमा वार्ता के बारे में आए सकारात्मक बयानों में से एक है। हालांकि रूपरेखा का विवरण अभी सामने नहीं आया है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि भारतीय पक्ष इसकी सार्थकता पर विचार कर रहा है या नहीं। सीमा वार्ता शुरू होने से पहले, चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने उल्लेख किया था कि दोनों पक्ष सीमा के परिसीमन पर अपने विचार एक दूसरे से साझा करेंगे। हालांकि बातचीत के लिए अंतिम रूपरेखा के संबंध में किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर अभी नहीं हुए हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि इस पक्ष का ढांचा जो भी हो दोनों पक्षों को समान रूप से स्वीकार्य होना चाहिए।
सीमा वार्ता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देश अगले साल अपने राजनयिक संबंधों की 70 वीं वर्षगांठ मनाएंगे। ऐसे में दोनों देशों की इच्छा है कि इस अवसर से पहले द्विपक्षीय संबंधों में सुधार के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रगति होनी चाहिए। इस क्रम में अगले वर्ष की योजना केंद्र में है दोनों देशों के लोगों का एक दूसरे के देशों में आवागमन में वृद्धि और सहयोग बढ़ाना। चीन इसे 'दोस्ती की सामाजिक और सार्वजनिक नींव' कहता है और एक-दूसरे के सांस्कृतिक तौर-तरीकों के बारे में समझ विकसित करना एक प्राथमिकता है। यह दोनों देशों की सांस्कृतिक विरासत का उपयोग कर द्विपक्षीय सहयोग को प्रोत्साहित करने के लिए भू-राजनीतिक नज़रिये से हटकर सोचने की भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विचारधारा के भी अनुरूप है।
इस विशेष प्रतिनिधिस्तर की बातचीत के निष्कर्षों के आधार पर कह सकते हैं कि भारत-चीन संबंधों में कई उतार-चढ़ाव के बाद अब द्विपक्षीय सम्बन्धों में सुधार के ठोस और सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं।
आलेख- डॉ एमएस प्रतिभा, चीन मामलों की विश्लेषक
अनुवाद/वाचन- देवेंद्र त्रिपाठी
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