राष्ट्रपति बोलसोनारो के 71वें गणतंत्र दिवस में मुख्य अतिथि के रूप में आगमन से संबंध और गहरे हुए

वैश्विक समुद्र में भारत और ब्राज़ील दो बड़ी मछलियॉ हैं। चीन के अतिरिक्त केवल भारत और ब्राज़ील ही ऐसे दो देश हैं जिन में बड़ी शक्तियों से महाशक्ति बनने की क्षमता है। लेकिन कुछ समय पहले तक भारत को इसकी हिन्दु विकास दर और पुरानी ग़रीबी के लिए जाना गया तो ब्राज़ील को बढ़ते क़र्ज और अति-मुद्रस्फिति के लिए। अगर भारत को लोकतंत्र के बावजूद पश्चिम ने सपेरों और रहस्यवादी साधुओं की जमीन कहा तो ब्राज़ील को फ्रॉस के Charles de Gawell ने अगंभीर देश कहा। उन्होंने कहा ब्राज़ील आने वाले कल का देश है और हमेशा रहेगा।

आज भारत और ब्राज़ील दोनों ही संतुलन करने वाली शक्तियों से आगे बढ़कर अग्रणी वैश्विक खिलाड़ी बन चुके हैं। पिछले लगभग एक दशक से दोनों देशों की विदेश नीति ने विविध बहुपक्षीय और द्वीपक्षीय मंचों के साथ सक्रियता के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संबंधों की बदलती प्रकृति के साथ तालमेल बनाया है।

ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर मेसियान बोलसोनारो का भारत के 71वें गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में चार दिन के लिए भारत आना इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि भारत और ब्राज़ील की साझेदारी गहराती जा रही है और भारत के सामरिक समुदाय ने इस पर ध्यान देना आरम्भ कर दिया है। भारत और ब्राज़ील केवल स्थिर लोकतंत्र ही नहीं हैं बल्कि अब ये खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्थाएँ हैं। भारत की तरह ही ब्राज़ील भी वैश्विक राजनय और अंतरराष्ट्रीय मामलों में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। लंबे समय तक ब्राज़ील विदेश नीति में अंर्तमुखी रवैया अपनाता रहा है। लेकिन अब वैश्विक स्तर पर भूमिका निभाते हुए ये कुशलतापूर्वक बहुपक्षीय संस्थानों का इस्तेमाल कर रहा है। राष्ट्रपति बोलसोनारो गणतंत्र दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में भारत आने वाले तीसरे राष्ट्रपति हैं। राष्ट्रपति फ़रनांदो हेनरिक कारदोसो ब्राज़ीलियाई और राष्ट्रपति लुइजल ज़िलानासियो दा सितवा लुला सन् 1996 और 2004 में भारत आ चुके हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में Fortaleza और 2019 में Brasilia में दो बार ब्रिक्स सम्मेलनों में शिरक्त की है। शासनाध्यक्षों और राष्ट्राध्यक्षों को गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना सामरिक चुनाव है।

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति बोलसोनारो ने अंतरराष्ट्रीय और द्वीपक्षीय महत्व के बहुत से मुद्दों पर वार्ता की। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ब्राज़ील के राष्ट्रपति के सम्मान में एक भोज का आयोजन भी किया। दोनों देशों ने द्वीपक्षीय निवेश सहयोग और सरलीकरण समझौते सहित दर्जनों समझौतो पर हस्ताक्षर किए इसमें अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का सामना से जुड़ा समझौता भी शामिल है। राष्ट्रपति बोलसोनारो ने भारत-ब्राज़ील कारोबार मंच को संबोधित किया और उनके सात मंत्रियों ने भी अपने समकक्षों से विस्तृत वार्ता की। दोनों पक्षों के बीच बहुपक्षीय वार्ता का उद्देश्य द्वीपक्षीय संबंधों को अगले स्तर तक ले जाना है।

जब श्री बोलसोनारो राष्ट्रपति चुने गए थे तब बहुत से विश्लेषकों का विचार था कि ब्राज़ील युरोप और उत्तर अमरीका के मुख्य देशों के साथ अपने संबंधों को दी जाने वाली प्राथमिकताओं की वजह से अंर्तमुखी हो जाएगा। कुछ को ये भी लगा था कि चुनाव प्रचारों के दौरान व्यक्त की गई राय की वजह से ब्राज़ील अब ब्रिक्स में रूचि नहीं लेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुछ माह पहले ही राष्ट्रपति बोलसोनारो ने ब्रिक्स सम्मेलन का सफल आयोजन किया। उन्होंने चीन की सफल यात्रा भी की। सामरिक साझेदार होने के नाते भारत और ब्राज़ील ने वैश्विक सत्ता बदलाव का लाभ उठाते हुए अपनी विदेश नीतियों को प्राथमिकता दी। मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को ग़ैर-ध्रुवीय दुनिया या बहुक्षेत्रीय वैश्विक व्यवस्था या बहु-बहु-ध्रुवीय कहा गया। उन्होंने राष्ट्रीय हित में नया गठजोड़ तैयार करने के लिए वैश्विक संचालक संस्थानों की मौजूदगी का लाभ उठाया।

दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश संबंधों को काफ़ी बढ़ावा मिला है। भारत और ब्राज़ील के बीच व्यापार बढ़कर 8.2 अरब ड़ॉलर हो गया है जिस में भारत 3.8 अरब ड़ॉलर का निर्यात कर रहा है। ब्राज़ील में भारत का बढ़ता निवेश भी प्रोत्साहित करता है। ये विशेष तौर से सूचना प्रौद्योगिकी, औषधि ऊर्जा, कृषि उद्योग, खनन और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में है। दोनों पक्ष सामरिक साझेदारी को लेकर प्रसन्न हैं। क्योंकि दोनों ही देशों के पास रक्षा, तकनीक साझी करना और संभारतंत्र समझौते के बारे में सहयोग बढ़ाने की विस्तृत संभावना और समझौता है।

ब्रिक्स, जी बीस और आईबीएसए मंचों के माध्यम से उच्चतम राजनीतिक स्तर पर लगातार सम्पर्क बनाए रखने से भारत और ब्राज़ील के संबंध गहरे हुए है। बहु-ध्रुवीय, पश्चिमी विश्व व्यवस्था के बाद की व्यवस्था मे अन्य देशों के लिए आदर्श स्थापित करने के लिए द्वीपक्षीय संबंधों में दोनों देशों को खूब मेहनत से आगे बढ़ना होगा।



आलेख – डॉ0 एश नारायण रॉय, सामाजिक विज्ञान संस्थान, दिल्ली के निदेशक

अनुवाद – नीलम मलकानिया

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