भारत का स्थान एफडीआई के क्षेत्र में शीर्ष दस में बरकरार

भारत ने 2019 में, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के प्रवाह में 42 अरब डॉलर से लेकर 49 अरब डॉलर फायदे मे रहते हुए शीर्ष 10 एफडीआई प्रवाह की प्राप्त करने वालें देशों के बीच अपने स्थान को बनाए रखा है। व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन UNCTAD की "निवेश की प्रवृत्ति मॉनिटर" शीर्षक वाली हालिया रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में यह वृद्धि तब देखने को मिली है जब 2019 में वैश्विक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश 1.41 ट्रिलियन डॉलर में 1% की गिरावट के साथ 1.39 ट्रिलियन डॉलर पर सपाट रहा। एफडीआई के क्षेत्र में भारत सबसे ऊपर है जबकि पूंजी प्रवाह में शून्य-वृद्धि के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन जैसे दोनों देशो में एक जैसा एफडीआई का नजारा देखने को मिला।

दक्षिण एशियाई क्षेत्र ने 10% की वृद्धि दर्ज करते हुए 60 अरब डॉलर एफडीआई हासिल की जिसमें 80% से अधिक हिस्सा भारत का था। सूचना प्रौद्योगिकी सहित सेवा क्षेत्र के उद्योगों में सबसे अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हुआ। हमारे पड़ोसी देशो में बांग्लादेश को छह प्रतिशत की गिरावट के साथ 3.4 अरब डॉलर और पाकिस्तान को 20 प्रतिशत की गिरावट के साथ 1.9 अरब डॉलर की गिरावट का सामना प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में करना पड़ा।

दुनिया भर में राजनीतिक उथल-पुथल का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रवाह पर स्पष्ट प्रभाव पड़ा, ब्रेक्सिट के बाद यूनाइटेड किंगडम को 6% की गिरावट का सामना करना पड़ा और यूरोपीय संघ को 15% की कमी का सामना करना पड़ा जो 305 अरब डॉलर की रकम है। निजीकरण कार्यक्रम की शुरुआत से ब्राजील 26% लाभ हासिल कर रहा है। राजनीतिक अर्थव्यवस्था एफडीआई प्रवाह के लिए एक महत्वपूर्ण निर्धारक की भुमिका निभाती है और राजनीतिक घटनाएं निश्चित रूप से विदेशी निवेश के लिए एक बाधा के रूप में सामने आ सकती हैं।

पोर्टफोलियो निवेश से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में पूंजी प्रवाह का आना बेहतर है क्योंकि एफडीआई अधिक स्थिर है। पोर्टफोलियो निवेश में धन जो (होट मनी होता है) वो ब्याज दर के हिसाब से प्रतिक्रियाशील होता और अस्थिर हो सकता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि भारत के विदेशी एक्सचेंज रिज़र्व ने भी मुद्रा भंडार में सर्वकालिक विस्तार कर दिया है, 65.1294 अरब डॉलर की वृद्धि के साथ जिसकी शुरुआत 4 जनवरी, 2019 से हुई है। मोटे तौर पर यह संयुक्त रूप से ऑस्ट्रेलिया, फ़िनलैंड और आइसलैंड के विदेशी मुद्रा भंडार के बराबर है। विदेशी मुद्रा में 4 घटक शामिल हैं - एफसीए (विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां), सोना, एसडीआर (विशेष आहरण अधिकार), और आरटीपी (आईएमएफ में आरक्षित स्थिति)। विकासशील अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक एफडीआई प्रवाह का आधे से अधिक और शीर्ष सबसे ज्यादा प्राप्ति करने वाले देश यानि- चीन, सिंगापुर, ब्राजील, हांगकांग और भारत में अनुमानित 695 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जारी रखती हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका 251 अरब डॉलर में 1% की गिरावट के साथ शीर्ष स्थान पर बना हुआ है।

क्षेत्रीय भिन्नता को ध्यान में रखते हुए, 3 और 16 प्रतिशत की वृद्धि के साथ अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई अर्थव्यवस्थाएं शुद्ध लाभ प्राप्त करने वालो में थी। उत्तरी अमेरिका में शून्य वृद्धि के साथ एफडीआई प्रवाह सपाट था। एशिया और यूरोप क्रमशः 6 और 4 प्रतिशत की गिरावट के साथ साफ तौर पर नुकसान में रहे। विकास के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, बदलाव वाली अर्थव्यवस्थाओं ने सबसे अधिक 65% प्राप्त किया, जबकि विकासशील अर्थव्यवस्थाएं सपाट थीं, और विकसित अर्थव्यवस्थाओं को 6% की गिरावट का सामना करना पड़ा।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में यह भी जोर दिया गया है कि 2019 में सीमा पार विलय और अधिग्रहण 40% घटकर 490 अरब डॉलर हो गया है जो 2014 के बाद से सबसे कम स्तर है। वैश्विक सीमा पार विलय और अधिग्रहण की बिक्री में गिरावट सेवा क्षेत्र में सबसे अधिक थी। 56% की गिरावट जो 207 अरब डॉलर तक है इसके बाद निर्माण उद्योग में 19% की कमी के साथ 249 अरब डॉलर और प्रार्थमिक क्षेत्र में 14% की गिरावट के साथ यह 34 अरब डॉलर हो गया

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में एक सकारात्मक पर्यवेक्षण पर भी जोर दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि अभी भी 2020 में एफडीआई प्रवाह में मामूली वृद्धि की उम्मीद है जैसा कि वर्तमान अनुमान वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार को दिखाते हैं।

भारत में एफडीआई को लेकर यह सकारात्मक खबर ऐसे समय में आई जब अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने भारत की आर्थिक मंदी पर चिंता व्यक्त की है। आर्थिक विकास पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में वृद्धि का प्रभाव एक प्रयोगाश्रित प्रश्न है और दीर्ध अवधि में इसको विश्लेषित करने की आवश्यकता है। राजकोषीय और वित्तीय क्षेत्र में भारत सरकार के संरचनात्मक सुधारों की आर्थिक और वृहद आर्थिक स्थिरता के लिए अहम भूमिका है।
आलेख:- डॉ. लेखा. एस. चक्रवर्ती, प्रोफेसर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी

अनुवाद एवं स्वर- वीरेन्द्र कौशिक

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