दावोस में इमरान खान असफल

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने विश्व आर्थिक मंच 2020 की बैठक के लिए दावोस में अपना बहुप्रचारित दौरा किया। स्विट्ज़रलैंड स्की-रिसॉर्ट में, उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ भेंट की। जैसा कि उनके वक्तव्यों से इंगित होता है, श्री खान ने एक बार फिर से कश्मीर के मुद्दे को उठाया और उनके द्वारा भारत विरोधी बयानबाजी की गई। उन्होंने यह कहने के लिए भी इसी मंच का उपयोग किया और कहा कि, "जब भी भारत के साथ हमारे बेहतर संबंध होंगे, दुनिया देखेगी कि हम सामरिक रूप से कितने मजबूत हैं"। उन्होंने दावा किया कि "पाकिस्तान में आतंकवाद नहीं है"।सत्य से बाहर कुछ भी नहीं हो सकता। वास्तव में, आतंकवादी समूह पाकिस्तानी सरकार के आधिकारिक संरक्षण का आनंद ले रहे हैं। उस देश में आतंकवादी संगठन पनप रहे हैं। वित्तीय कार्रवाई कार्यबल(एफएटीएफ) की अगली बैठके में, पेरिस स्थित वैश्विक आतंकवाद-निरोधी वित्तीय निगरानी संस्था द्वारा पाकिस्तान को काली सूची में डालने पर निर्णय लेना है; ऐसा लगता है कि पाकिस्तान सरकार ने अपनी धरती पर सक्रिय आतंकी संगठनों को फिलहाल कम झूठ बोलने को कहा है।भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, दावोस में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान द्वारा किए गए भारत और भारत-पाकिस्तान संबंधों पर टिप्पणी शायद ही आश्चर्य की बात हो। उनकी टिप्पणियाँ और स्वर न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत और विरोधाभासी हैं, बल्कि उनकी निराशा की बढ़ती भावना को भी प्रदर्शित करते हैं। पाकिस्तान को यह मानना होगा कि वैश्विक समुदाय ने एक तरफ आतंक के खिलाफ लड़ाई में पीड़ित कार्ड खेलने और दूसरी ओर भारत एवं अन्य देशों को निशाना बनाने वाले आतंकवादी समूहों का समर्थन कर देने के उसके दोहरे मापदंड को समझ लिया है। यदि पाकिस्तान वास्तव में भारत के साथ शांतिपूर्ण और सामान्य संबंधो के लिए गंभीर है, जैसा कि वह दावा करता है, तो एक अनुकूल माहौल बनाने का उत्तरदायित्व भी पाकिस्तान पर ही है। उन्हें अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान बंटाने के लिए भ्रामक और मिथ्या बयान देने के बजाय अपनी धरती से संचालित होने वाले आतंकी समूहों के खिलाफ विश्वसनीय, अपरिवर्तनीय और सत्यापन योग्य कार्रवाई करनी होगी।दावोस बैठक में एक सवाल के जवाब में, इमरान खान ने यह भी कहा कि "अगर थोड़ा आतंकवाद है भी तो यह अफगानिस्तान से पाकिस्तान में आ रहा है, पाकिस्तान के अंदर कोई आतंकवाद नहीं है"।पाकिस्तानी विश्लेषकों की राय में श्री खान यह सही कहते हैं कि अफ़गानिस्तान में युद्ध से अधिक उग्रवादी पैदा हुए हैं, जिसमें आतंकवादी उग्रवाद भी शामिल है; लेकिन, वह इस सवाल का जवाब देने में नाकाम रहे कि अमेरिकी सेना के चले जाने के बाद अफगानिस्तान का क्या होगा?, जो कि हर किसी के दिमाग में सबसे ज्यादा उठने वाला प्रश्न है।
विश्व आर्थिक मंच शिखर सम्मेलन में भाग लेने के कारण पाकिस्तान के प्रधानमंत्री दावोस गए थे, हालांकि, वह अपने देश की अर्थव्यवस्था के मामलों में पूरी तरह से अविश्वसनीय थे। पाकिस्तान को एक निवेश गंतव्य के रूप में प्रस्तुत करने में वह पूर्णतया विफल रहे जिससे विश्व समुदाय को यह समझाया जा सकता कि जुलाई 2019 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के बेलआउट पैकेज के बाद से उनकी सरकार ने क्या क्या सुधार अपनाये हैं। श्री खान अवसर का लाभ उठाने में भी असफल रहे क्योंकि वह दावोस में उपस्थित अरबपति व्यवसायियों के लिए एक व्यवहार्य आर्थिक दृष्टिकोण प्रस्तुत नहीं सके।इसके अतिरिक्त, श्री खान द्वारा गिनाए गए कुछ प्रमुख बिंदुओं ने पाकिस्तान की कमियों को ही उजागर किया और उन विशेषताओं को उजागर नहीं किया जा सका जो कि पाकिस्तान में निवेशकों के लिए उपलब्ध हैं।प्रधानमंत्री खान ने बार-बार कहा कि पिछले वर्ष की तुलना में विदेशी निवेश दोगुना हो गया है। हालाँकि, यह लगभग सभी तात्कालिक धन दोहरे अंकों की दर से प्राप्त रिटर्न या अल्पकालिक ट्रेजरी बिलों के कारण पैदा हुआ है। ये बिल पाकिस्तान की वृहद-आर्थिक अस्थिरता का एक लक्षण मात्र हैं और क्षमता-वृद्धि को आकर्षित करने के लिए इस्लामाबाद की अक्षमता को दर्शाते हैं।इमरान खान की दावोस यात्रा का एक और दिलचस्प पहलू, जिसे उन्होंने खुद स्वीकार किया, यह रहा कि यह यात्रा उनके दो उद्यमी दोस्तों, इकराम सहगल और इमरान चौधरी द्वारा प्रायोजित थी। इससे पाकिस्तान में राजनीतिक गर्मी बढ़ना तय है, क्योंकि यह देश क्रोनी कैपिटलिज्म अर्थात भाई-भतीजावाद की अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाता है। वास्तव में, यही एक कारण था कि इमरान खान के एक समय संरक्षक से दुश्मन बने, पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को वर्तमान शासन द्वारा जेल में डाल दिया गया था।
यदि उन्होंने अपने देश की आर्थिक संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया होता तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को कुछ मदद मिल सकती थी। हालाँकि, पाकिस्तानी विश्लेषकों के अनुसार, श्री खान का अपने पूर्वी "हमसाया"(पड़ोसी) के प्रति सद्भाव, उनकी सभी समस्याओं के हल के लिए रामबाण है।

आलेख - कौशिक रॉय, समाचार विश्लेषक, ऑल इंडिया रेडियो

अनुवादक एवं वाचक - हर्ष वर्धन

Comments

Popular posts from this blog

भारत ने फिजी को पहुंचाई मानवीय सहायता

आत्मनिर्भर भारत में प्रवासियों की भूमिका

अरब-भारत सहयोग फोरम की बैठक