अमरीका-ईरान का बगदाद में छद्म युद्ध

बग़दाद के पूरी तरह आरक्षित ग्रीन ज़ोन या हरित क्षेत्र में अमरीकी दूतावास के आस-पास हाल ही में किए गए प्रदर्शन को ईरान समर्थन वाले प्रदर्शनकर्ता इस तरह से देख रहे हैं कि अमरीका को हमारा संदेश मिल गया है। ट्रम्प प्रशासन और इस्लामिक गणराज्य ईरान के बीच लंबे समय से चली आ रही टीका-टिप्पणी ईरानी मीलिशिया या लड़ाकों द्वारा किए गए एक हमले में एक अमरीकी ठेकेदार के मारे जाने और कुछ अमरीकी सैनिकों के घायल होने के बाद बुरी लड़ाई में बदल गई।

इसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने अर्धसैनिक बलों के पाँच ठिकानों पर हमले का आदेश दे दिया जिसमें 25 लोग मारे गए और लगभग पचास लोग घायल हो गए। इसके बाद इराक़ में ग़ुस्साए ईरानी पक्षों के समर्थकों ने बग़दाद में अमरीकी दूतावास पर हमला कर दिया और परिसर की दीवार पर चढ़ने की कोशिश की। इमारत के अंदर तैनात अमरीकी नौसैनिकों को व्यवस्था क़ायम करने के लिए गोलीबारी का सहारा लेना पड़ा।

इराक़ और सीरिया सीमा पर अमरीकी कर्मियों पर शुरुआती हमला कातिब हिज़बुल्लाह द्वारा किया गया था जो कि ईरान द्वारा समर्थित पोप्युलर मोबिलाइज़ेशन फ़ोर्सड के एक हिस्से शिया अर्थसैन्य बल, पाथ ऑफ़ गॉड या ख़ुदा की राह की सैन्य टोली है। कातिब हिज़बुल्लाह मार्च 2003 में अमरीका के नेतृत्व में इराक़ पर की गई चढ़ाई के बाद इराक़ के गृह युद्ध में सक्रिय हुआ था और घिरे हुए राष्ट्रपति बशर अल असद के समर्थन में सीरियाई गृह युद्ध में शामिल हुआ था।

29 दिसंबर को अर्धसैनिक समूहों के पाँच ठिकानों पर किए गए अमरीका के प्रतिशोधात्मक हमले के बारे में राष्ट्रपति ट्रम्प ने ट्वीट किया कि हमने कड़ी प्रतिक्रिया दी और हमेशा देंगे। अब ईरान इराक़ स्थित अमरीकी दूतावास पर हमला कर रहा है। बाद में उन्होंने अमरीकी कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इराक़ी सरकार द्वारा दी गई तीव्र प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद व्यक्त किया और फिर नव वर्ष की शुभकामना के साथ चेतावनी के रूप में कहा कि हमारे किसी भी प्रतिष्ठान को नुक्सान पहुँचने या किसी की मृत्यु के लिए ईरान पूरी तरह ज़िम्मेदार होगा। इसकी उन्हें भारी क़ीमत चुकानी होगी। ये चेतावनी नहीं है बल्कि धमकी है।

इसी बीच बग़दाद में हुए अमरीकी हमले में ईरानी क़ुदस बल कमांडर मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी और एक ईराक़ी लड़ाका नेता अबु महदी अल-मुहांदीस मारे गए। अमरीका के रक्षा मंत्री मार्च टी एस्पर ने कहा कि पेंटागन ने एक निर्णायक रक्षात्मक कार्रवाई की।

अमरीका और ईरान के बीच तनाव ट्रम्प प्रशासन द्वारा पिछले साल मई में परमाणु संधि से अलग होने और ईरान के ऊर्जा उद्योग पर नए प्रतिबंध लगाने की वजह से बढ़ गया था। हालिया सप्ताहों में ईरान में घरेलू स्तर पर ख़राब वित्तीय प्रबंधन और प्रतिबंधों की वजह से आम ईरानी नागरिकों ने आर्थिक परेशानियों की वजह से विस्तृत पैमाने पर प्रदर्शन किए हैं।

अभी तक दोनों पक्ष सीधे टकराव से बचते रहे थे लेकिन मिल रही ख़बरों से लगता है कि ईरान से जुड़े तत्व अमरीका के लाभकारी साथियों या पक्षों पर हमला कर सकते हैं ताकि अमरीकी फ़रमान के जवाब में तेहरान की प्रतिक्रिया स्पष्ट की जा सके।

प्रदर्शन वापिस लिए जाने के बाद भी राष्ट्रपति ट्रम्प ने चेतावनी दी की ईरान को इसकी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिए वर्तमान समय में तनाव बढ़ने को ट्रम्प की घरेलू हलचल से जोड़ा जा सकता है। पिछले माह अमरीकी कॉंग्रेस ने राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ महाभियोग की प्रक्रिया को मंज़ूरी दी थी।

क्रिसमस अवकाश समाप्त होते ही अमरीका के प्रतिनिधि सदन की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी सीनेट के सामने मुद्दा पेश करने से पहले अपनी रणनीति तैयार कर रही हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प को इस मुद्दे से ध्यान हटाने की ज़रूरत है और दूर किसी देश में इस तरह के उग्र घटनाक्रम से अच्छा और क्या हो सकता है। राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने मोनिका लेविंस्की विवाद में ख़ुद पर लगे महाभियोग के दौरान आलोचकों का ध्यान भटकाने के लिए अफ़्ग़ानिस्तान में अल क़ायदा पर हमला बोला था।

लेकिन दोनों ओर ऐसी सीमा रेखा है जिसे कोई भी पार नहीं करना चाहेगा। चुनावी वर्ष में अमरीका के राष्ट्रपति ऐसा बंधक संकट नहीं चाहेंगे जो 1980 में कार्टर राष्ट्रपतिकाल को ख़राब कर दे। 444 दिन चले प्रकरण ने वाशिंगटन और तेहरान के बीच चार दशक तक चलने वाली दुश्मनी के बीज बो दिए थे। ना तो राष्ट्रपति ट्रम्प और ना ही ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनी इसे दोहराना चाहेंगे।

अपनी ऊर्जा सुरक्षा, विशाल प्रवासी समुदाय और विदेशी मुद्रा की वजह से भारत इस क्षेत्र से जुड़े बड़े जोखिम महसूस करता है। असल में 2017-2018 से इराक़ सऊदी अरब को पीछे छोड़ते हुए भारत को सबसे अधिक कच्चा तेल भेजने वाला देश बन गया है। अमरीका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने भारत और ईरान के ऊर्जा व्यापार पर बुरा असर डाला है। इसलिए फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र में भारत के हितों के लिए बग़दाद में मौजूदा अमरीका-ईरान टकराव का शीघ्र समाप्त होना बहुत ज़रूरी है।


आलेख- प्रो. पी आर कुमारस्वामी, जेएनयू, पश्चिम एशिया अध्ययन केन्द्र

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