भारत का खाड़ी में शांति का आह्वान
पिछले शुक्रवार को अमेरिका द्वारा ईरानी अल-कुद्स फोर्स कमांडर मेजर जनरल कासिम सोलीमणि की हत्या के बाद फारस की खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच; विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अपने ईरानी समकक्ष मोहम्मद जावीद ज़रीफ़ को फोन किया और कहा कि " यह घटनाक्रम बहुत गम्भीर स्थिति में पहुँच गया है।" डॉ. जयशंकर ने "तनाव के स्तर" पर भारत की गंभीर चिंताओं को व्यक्त किया और दोनों पक्षों ने " एक दूसरे के संपर्क में रहने के लिए सहमति व्यक्त की।" भारतीय विदेश मंत्री 19 वें संयुक्त आयोग की बैठक के लिए कुछ सप्ताह पहले तेहरान में थे और उन्होंने ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी और श्री ज़रीफ़ सहित वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों के साथ मुलाकात की। श्री ज़रीफ़ के 'रायसीना डायलॉग' के लिए भारत में आने की उम्मीद है, जो इस माह की 14 तारीख से आरंभ होगा।
फोन पर यह वार्ता, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी नेताओं के बीच ज़ुबानी जंग की पृष्ठभूमि के चलते की गई थी, जो कि इस क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति सोलेमानी की हत्या के बाद आरंभ हुई।सोलेमानी ने इराक, सीरिया, लेबनान और यमन के साथ ईरान की लड़ाई को संभाला था। वास्तव में, जनरल सोलेमानी को सर्वोच्च ईरानी नेता, अली खमेनी के बाद सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में देखा जाता था।
ईरानी नेताओं को यह जल्दी थी कि अमेरिका से "एक कठोर प्रतिशोध लिया जाए"। क्रोध की सर्वव्यापी भावनाओं को देखते हुए, एक वरिष्ठ रेवोल्यूशनरी गार्ड कमांडर को यह कहते हुए सुना गया था कि "क्षेत्र में महत्वपूर्ण अमेरिकी लक्ष्यों की पहचान लंबे समय से ईरान ने कर ली है। सबसे पहले लगभग 35 अमेरिकी ठिकाने, साथ ही तेल अवीव भी हमारी पहुंच के भीतर हैं। ''
इसने राष्ट्रपति ट्रम्प को यह घोषणा करने के लिए उकसा दिया कि अमेरिका ने 52 ईरानी स्थलों (1979 में ईरानी छात्रों द्वारा बंधक बनाए गए अमेरिकी राजनयिकों की संख्या) की पहचान की है, जिनमें "ईरान और ईरानी संस्कृति के लिए उच्च स्तरीय और महत्वपूर्ण" स्थल भी सम्मिलित हैं और यह चेतावनी भी दी गई कि अगर तेहरान किसी भी अमेरिकी लक्ष्य या हितों पर हमला करता है तो पहले से भी अधिक ज़ोरदार प्रहार किया जाएगा।उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ईरान पर अब तक का सबसे घातक हमला किया जा सकता है। ईरान भी दुनिया को यह याद दिलाने में पीछे नहीं रहा कि ईरानियों ने कि उनकी सभ्यता पर कई आक्रमणों, हमलों और घुसपैठ का सामना किया है।
यदि सोलेमानी ट्रम्प प्रशासन के लिए बेशकीमती था, तो 1989 में पदभार संभालने के बाद से उनकी हत्या भी ईरानी सुप्रीम लीडर के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी। अमेरिका की अवहेलना और इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को आश्वस्त करने के लिए तेहरान को जवाब देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। मंगलवार को तेहरान से करीब एक हजार किलोमीटर दक्षिण में अपने गृहनगर करमन में सोलेमानी को दफनाये जाने के बाद इस तरह की प्रतिक्रिया होने की सबसे अधिक संभावना है।
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की तरह, भारत भी स्थिति की गंभीरता को जानता है, और हत्या के तुरंत बाद जारी एक बयान में, नई दिल्ली ने फारस की खाड़ी में 'शांति, स्थिरता और सुरक्षा' के महत्व को याद दिलाया और आशा व्यक्त की कि 'स्थिति और भयानक नहीं होगी'और उसने सभी पक्षों से संयम बनाने का आग्रह किया। डॉ.ज़रीफ़ से बात करने के बाद, भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और संयुक्त अरब अमीरात तथा ओमान के विदेश मंत्रियों को भी फोन किया।
लाख टके का सवाल यह है कि ईरान की प्रतिक्रिया कहां तक और क्या होगी? यह बात रणनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर रही है। क्षेत्र में अमेरिकी हितों अथवा अमेरिकी धरती पर सीधा हमला ईरान के लिए महंगा सिद्ध होगा क्योंकि इससे बड़े स्तर पर अमेरिकी प्रतिक्रिया की जाएगी। इसलिए, ईरान मध्य पूर्व में अमेरिकी सहयोगियों, जैसे कि इजरायल, इराक, या सऊदी अरब पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।
इन सभी देशों के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध हैं। यदि ईरानी निष्क्रियता की कल्पना करना असंभव है, तो किसी भी ईरानी प्रतिक्रिया से फारस की खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी, जो भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली के लिए ईरान-ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया के लिए पारगमन मार्ग के महत्वपूर्ण हित हैं। इसी समय भारत, ईरानी नेतृत्व को एक छोटा सा संदेश यह दे रहा है कि इस नाज़ुक वक़्त में, तेहरान अकेला नहीं है और भारत भी स्थिति पर पैनी नज़र रख रहा है। भारत जैसे देशों द्वारा इस दुविधा की स्थिति में ईरान की सराहना की जानी चाहिए ताकि ईरान को सोलेमानी की हत्या के बाद अपनी प्रतिक्रियाओं और उनकी क़ीमत का अधिक यथार्थवादी मूल्यांकन करने में सहायता मिले। ईरान को अंतरराष्ट्रीय समर्थन का व्यापक विश्लेषण किया जाए तो भारत का मेलजोल ईरान को अपने कार्यों की प्राथमिकता सुनिश्चित करने में सक्षम बना सकता है।
आलेख - प्रो. पी. आर. कुमारस्वामी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
अनुवादक एवं वाचक - हर्ष वर्धन
फोन पर यह वार्ता, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी नेताओं के बीच ज़ुबानी जंग की पृष्ठभूमि के चलते की गई थी, जो कि इस क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति सोलेमानी की हत्या के बाद आरंभ हुई।सोलेमानी ने इराक, सीरिया, लेबनान और यमन के साथ ईरान की लड़ाई को संभाला था। वास्तव में, जनरल सोलेमानी को सर्वोच्च ईरानी नेता, अली खमेनी के बाद सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में देखा जाता था।
ईरानी नेताओं को यह जल्दी थी कि अमेरिका से "एक कठोर प्रतिशोध लिया जाए"। क्रोध की सर्वव्यापी भावनाओं को देखते हुए, एक वरिष्ठ रेवोल्यूशनरी गार्ड कमांडर को यह कहते हुए सुना गया था कि "क्षेत्र में महत्वपूर्ण अमेरिकी लक्ष्यों की पहचान लंबे समय से ईरान ने कर ली है। सबसे पहले लगभग 35 अमेरिकी ठिकाने, साथ ही तेल अवीव भी हमारी पहुंच के भीतर हैं। ''
इसने राष्ट्रपति ट्रम्प को यह घोषणा करने के लिए उकसा दिया कि अमेरिका ने 52 ईरानी स्थलों (1979 में ईरानी छात्रों द्वारा बंधक बनाए गए अमेरिकी राजनयिकों की संख्या) की पहचान की है, जिनमें "ईरान और ईरानी संस्कृति के लिए उच्च स्तरीय और महत्वपूर्ण" स्थल भी सम्मिलित हैं और यह चेतावनी भी दी गई कि अगर तेहरान किसी भी अमेरिकी लक्ष्य या हितों पर हमला करता है तो पहले से भी अधिक ज़ोरदार प्रहार किया जाएगा।उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ईरान पर अब तक का सबसे घातक हमला किया जा सकता है। ईरान भी दुनिया को यह याद दिलाने में पीछे नहीं रहा कि ईरानियों ने कि उनकी सभ्यता पर कई आक्रमणों, हमलों और घुसपैठ का सामना किया है।
यदि सोलेमानी ट्रम्प प्रशासन के लिए बेशकीमती था, तो 1989 में पदभार संभालने के बाद से उनकी हत्या भी ईरानी सुप्रीम लीडर के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी। अमेरिका की अवहेलना और इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को आश्वस्त करने के लिए तेहरान को जवाब देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। मंगलवार को तेहरान से करीब एक हजार किलोमीटर दक्षिण में अपने गृहनगर करमन में सोलेमानी को दफनाये जाने के बाद इस तरह की प्रतिक्रिया होने की सबसे अधिक संभावना है।
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की तरह, भारत भी स्थिति की गंभीरता को जानता है, और हत्या के तुरंत बाद जारी एक बयान में, नई दिल्ली ने फारस की खाड़ी में 'शांति, स्थिरता और सुरक्षा' के महत्व को याद दिलाया और आशा व्यक्त की कि 'स्थिति और भयानक नहीं होगी'और उसने सभी पक्षों से संयम बनाने का आग्रह किया। डॉ.ज़रीफ़ से बात करने के बाद, भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और संयुक्त अरब अमीरात तथा ओमान के विदेश मंत्रियों को भी फोन किया।
लाख टके का सवाल यह है कि ईरान की प्रतिक्रिया कहां तक और क्या होगी? यह बात रणनीतिक विश्लेषकों को हैरान कर रही है। क्षेत्र में अमेरिकी हितों अथवा अमेरिकी धरती पर सीधा हमला ईरान के लिए महंगा सिद्ध होगा क्योंकि इससे बड़े स्तर पर अमेरिकी प्रतिक्रिया की जाएगी। इसलिए, ईरान मध्य पूर्व में अमेरिकी सहयोगियों, जैसे कि इजरायल, इराक, या सऊदी अरब पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।
इन सभी देशों के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध हैं। यदि ईरानी निष्क्रियता की कल्पना करना असंभव है, तो किसी भी ईरानी प्रतिक्रिया से फारस की खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी, जो भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली के लिए ईरान-ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया के लिए पारगमन मार्ग के महत्वपूर्ण हित हैं। इसी समय भारत, ईरानी नेतृत्व को एक छोटा सा संदेश यह दे रहा है कि इस नाज़ुक वक़्त में, तेहरान अकेला नहीं है और भारत भी स्थिति पर पैनी नज़र रख रहा है। भारत जैसे देशों द्वारा इस दुविधा की स्थिति में ईरान की सराहना की जानी चाहिए ताकि ईरान को सोलेमानी की हत्या के बाद अपनी प्रतिक्रियाओं और उनकी क़ीमत का अधिक यथार्थवादी मूल्यांकन करने में सहायता मिले। ईरान को अंतरराष्ट्रीय समर्थन का व्यापक विश्लेषण किया जाए तो भारत का मेलजोल ईरान को अपने कार्यों की प्राथमिकता सुनिश्चित करने में सक्षम बना सकता है।
आलेख - प्रो. पी. आर. कुमारस्वामी, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
अनुवादक एवं वाचक - हर्ष वर्धन
Comments
Post a Comment