पाकिस्तान ने फिर खेला अपना खेल

पाकिस्तान की एक आतंकरोधी अदालत ने 2008 के मुंबई हमलों की साज़िश रचने वाले लश्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा जैसे पाकिस्तान आधारित आतंकी गुटों के सरगना हाफ़िज सईद को 11 बर्षों के लिए जेल भेज दिया है। आतंक वित्त पोषण के दो आरोपों की वजह से उसे जेल भेजा गया। पाकिस्तान के आतंकरोधी विभाग ने सईद के खिलाफ़ 23 एफआईआर दर्ज की हैं और साथ ही पंजाब प्रांत के विभिन्न शहरों में आतंक वित्त पोषण में शामिल होने का आरोपी भी है। 

पाकिस्तान सरकार के अभियोजक अल्दुल राउफ़ वाही ने कहा कि हाफ़िज सईद और उसके नज़दीकी साथी जफ़र इक़बाल को आतंक वित पोषण के दो मामलों में जेल भेजा गया है। दोनों मामलों में कुल 11 वर्षों की सजा थी लेकिन सईद जेल में साढ़े 5 साल बिताएगा क्योंकि दोनो मामले साथ-साथ चलेंगे। इसी बीच सईद के वकील इमरान गिल ने कहा कि हम इस फ़ैसले के खिलाफ़ अपील करेंगे। 

भारत का कहना है कि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घोषित आतंकी हाफिज सईद को आतंक वित्त पोषण के मामले में जेल भेजे ये पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रति लंबित ज़िम्मेदारी थी ताकि आतंकवाद को मिलने वाले सहयोग का अंत किया जा सके। 

भारत के विदेश मंत्रालय का कहना है कि ये फ़ैसला FATF के पूर्ण सत्र से पहले किया गया है। इसलिए इस फ़ैसले का असर अभी देखा जाना बाकी है। ये भी देखा जाना चाहिए कि पाकिस्तान अपने नियंत्रण वाले राज्यक्षेत्र से संचालित सभी आतंकी गुटों और आतंकियों के खिलाफ़ कार्रवाई करता है या नहीं और मुंबई तथा पठानकोट हमलों समेत अन्य सीमा पार आतंकी हमलों के अपराधियों को न्याय के सामने लाता है या नहीं 

सईद को गिरफ़्तार करने वाले इस फ़ैसले से पाकिस्तान के इस तर्क को थोड़ी मज़बूती मिल सकती है कि इस्लामाबाद ने आतंकी गुटों के खिलाफ गंभीर प्रयास किए हैं। पैरिस आधारित वैश्विक वित्तीय निगरानी समूह एफ़एटीएफ़ की अगले माह अहम बैठक होने जा रही है। एफ़एटीएफ़ की बैठक इस पर विचार-विमर्श कर सकती है कि आतंक वित्त पोषण को समाप्त करने की नाकामी की वजह से पाकिस्तान को काली सूची में डाल दिया जाए। 

पाकिस्तान पहले से ही एफ़एटीएफ़ की ग्रे सूची में शामिल है। इस्लामाबाद पर लगातार आतंकी गुटों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का दबाव बढ़ता जा रहा है। काली सूची में जाने से इसकी बैंक और वित्त व्यवस्था के लिए परेशानी हो जाएगी जिसका पाकिस्तान की पहले से ही चरमराई अर्थव्यवस्था पर और भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। 

अपनी अगली बैठक में एफ़एटीएफ़ सईद की गिरफ़्तारी पर विचार कर सकता है और इस बात पर भी कि क्या पाकिस्तान को इसकी ग्रे सूची से बाहर करने के लिए इतना काफ़ी है और क्या एफ़एटीएफ़ की श्वेत सूची में इसे अन्य देशों के साथ रखा जा सकता है या नहीं। 

विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान को चीन, मलेशिया और तुर्की के सहयोग की वजह से काली सूची में नहीं रखा गया। लेकिन ग्रे सूची से बाहर आने के लिए इस्लामाबाद को एफ़एटीएफ़ के 39 में से कम से कम 12 देशों की जरूरत है। 

इसी माह राष्ट्रपति ट्रम्प भारत की यात्रा करने वाले हैं। सईद की गिरफ़्तारी की घोषणा उन की यात्रा से तुंरत पहले की गई है। आतंकरोध के प्रयासों को लेकर अमरीका के राष्ट्रपति पाकिस्तान की निंदा करते आए हैं। हालांकि अफ़्ग़ानिस्तान में तालिबान के साथ समझौता करने के लिए अमरीका को उस अहम स्थान में पाकिस्तान का सहयोग चाहिए। ये सभी जानते हैं कि तालिबान और पाकिस्तान सैन्य स्थायित्व का आपस में घनिष्ठ संबंध है। 

पेइचिंग में एफ़एटीएफ़ की हालिया बैठक में पाकिस्तान ने आतंकवाद के ख़िलाफ उठाए गए कदमों का उल्लेख किया था। इस वजह से चीन, मलेशिया और तुर्की का सहयोग मिला। वाशिंगटन ने सभी पाकिस्तान की प्रगति रिपोर्ट पर कोई सवाल नहीं उठाया। पिछले अक्तूबर में पेरिस में एफ़एटीएफ़ की एक अन्य बैठक में पाकिस्तान 27 में से उन 22 शर्तों को पूरी करने में नाकाम रहा था जो इसे पूरी करनी चाहिए थी। उस बैठक में इस्लामाबाद की निंदा की गई थी और वैश्विक आतंक-रोधी वित्तीय निगरानी समूह ने कहा था कि अगर पाकिस्तान आतंकी गुटों तक वित्तीय मदद पहुँचान को रोकने में नाकाम रहा तो फ़रवरी में इसे काली सूची में डाल दिया जाएगा। 

पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय को लंबे समय तक अंधेरे में रखता आया है। एफ़एटीएफ़ की ग्रे सूची में शामिल होते हुए भी ये आतंकी गुटों की मदद करता आया है। ये याद रखा जाना चाहिए कि सिर्फ़ एक साल पहले ही भारती की पश्चिमी सीमा पर सक्रिय आतंकी गुटों द्वारा किए गए हमले की वजह से जम्मू और कश्मीर के पुलवामा में चालीस भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। इससे हालात और बिगड़ गए थे। 


वैश्विक समुदाय को आतंक को अपनी नीति के रूप में इस्तेमाल करने के रवैये के प्रति पाकिस्तान को अनुशासित करने में सकारात्मक भूमिक निभाना के जरूरत है। इसलिए आने वाली एफ़एटीएफ़ बैठक में अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस और आस्ट्रेलिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होगी। 



आलेख – कौशिक राय, समाचार विश्लेषक, ऑल इंडिया रेडियो

अनुवाद – नीलम मलकानिया

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