भारत द्वारा तुर्की के हस्तक्षेप की निंदा

हाल ही में, पाकिस्तान की यात्रा के दौरान, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन ने कश्मीर में मौजूदा स्थिति पर यह कहते हुए चिंता व्यक्त की कि तुर्की इस बात को लेकर गंभीर रूप से चिंतित है कि “हाल ही में उठाये गये सभी कदमों के बावजूद इस क्षेत्र में स्थिति कठिन हालात में बदल गई है”। तुर्की, संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के प्रासंगिक आधार और कश्मीरी लोगों की उम्मीदों के अनुरूप पाकिस्तान और भारत के बीच बातचीत के माध्यम से कश्मीर मुद्दे के निपटारे का पक्षधर है। उन्होंने कश्मीर के साथ तुर्की की "एकजुटता" व्यक्त की और कश्मीरी लोगों के "संघर्ष" की तुलना प्रथम विश्व युद्ध के दौरान विदेशी वर्चस्व के खिलाफ तुर्की की लड़ाई से की। कम से कम यह कहने के लिए आवश्यक है।

भारत ने तुर्की के राष्ट्रपति की टिप्पणी पर कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए श्री एर्दोगन के विचारों के लिए उनके राजदूत को एक आपत्‍तिपत्र जारी किया है। विदेश मंत्रालय ने एक बयान के अनुसार, तुर्की के राष्ट्रपति की टिप्पणी में न तो इतिहास की समझ दिखाई देती है और न ही ये कूटनीति के कार्यशैली को दर्शाती है और उनका तुर्की के साथ भारत के संबंधों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। बयान ने यह भी संदेश दिया गया है कि हालिया प्रकरण अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने वाले तुर्की के रवैये का एक और उदाहरण है। भारत के लिए ये पूरी तरह से अस्वीकार्य है। पाकिस्तान द्वारा धडल्ले से सीमा पार से चलाये जा रहे आतंकवाद को न्यायोचित ठहराने के लिए तुर्की द्वारा बार-बार किए जा रहे प्रयासों को भारत खारिज करता रहा है। भारत ने जोर दे कर कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग है; इसलिए कोई बाहरी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

पिछले साल, जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के भारत के कदम की राष्ट्रपति एर्दोगन द्वारा आलोचना करने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुर्की यात्रा रद्द कर दी गई थी। भारत और तुर्की के बीच द्विपक्षीय सम्बंधो में हाल ही में उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहे हैं विशेषकर, कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को तुर्की की ओर से दिए जाने वाले समर्थन के कारण। यह पहला मौका नहीं है जब श्री एर्दोगन ने कश्मीर मुद्दे पर टिप्पणी की है। 2019 में उनका भाषण, संयुक्त राष्ट्र महासभा के भाषण में भी उन्होने भारत की निंदा की थी। उन्होंने कहा था कि कश्मीर मुद्दे पर पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय ध्यान नहीं दिया गया है और इसे न्याय और समानता के आधार पर बातचीत के माध्यम से हल किया जाना चाहिए, न कि टकराव के माध्यम से। वे जब से वह सत्ता में आए हैं, भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मुद्दे को हल करने के लिए मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहे हैं। भारत ने उनके प्रस्तावों को ठुकरा दिया है। श्री एर्दोगन को अपना खुद का रिकॉर्ड याद रखना चाहिए, उनके देश की बात करें तो तुर्की के लोगों के मूल अधिकार उनसे छीने जा रहे हैं। कश्मीर मुद्दे पर, भारत अपनी बात पर अडिग है कि कश्मीर एक द्विपक्षीय मुद्दा है और भारत इसमें किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की आवश्यकता को नहीं मानता। अनुच्छेद 370 निरस्त होने के बाद, पाकिस्तान या किसी अन्य तीसरे देश का कश्मीर मामलें में हस्तक्षेप किया जाना भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप होगा जो संयुक्त राष्ट्र के कानून के तहत अवैध माना जाएगा।

पाकिस्तान को तुर्की के समर्थन के दो कारण देखें जा सकते हैं- एक तो धार्मिक और दूसरी वजह है साइप्रस। तुर्की और पाकिस्तान धार्मिक रूप से मज़बूती से जुड़े हैं। हाल ही में, मलेशिया के साथ दोनों देशों के बीच इस्लामोफोबिया से लोगो को उबारने और इस्लाम धर्म के बारे में लोगों के बीच गलत धारणाओं को दूर करने के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एक टेलीविजन चैनल शुरू करने पर सहमति बनी थी। साइप्रस मुद्दे की बात करे तो, उत्तरी-साइप्रस को भारत एक अलग और स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता प्रदान नहीं करता। भारत और तुर्की के बीच यह एक मुद्दा बना हुआ है। भारत ने हमेशा ग्रीक-साइप्रस की स्वतंत्रता, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और साइप्रस की एकता का समर्थन किया है। भारत द्वीप की वैध सरकार के रूप में ग्रीक-साइप्रस को मान्यता देता है। पाकिस्तान का रूख इस मुद्दे पर भारत के विपरीत है। इसके अलावा, भारत के अर्मेनिया और ग्रीस के साथ अच्छे संबंध हैं और इनके साथ ऐतिहासिक समस्याओं के कारण तुर्की के द्विपक्षीय सम्बंधों में तनाव बना हुआ हैं।

इन समस्याओं के बावजूद, भारत द्विपक्षीय संबंधों को फिर से जीवंत करने की कोशिश कर रहा है। वास्तव में, जून 2019 में, प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया था कि भारत तुर्की को एक महत्वपूर्ण मित्र मानता है और उसके साथ हमारे सम्बंध समय की कसौटी पर परखे गये हैं। हालाँकि, कश्मीर मुद्दे को तुर्की द्वारा लगातार उठाने से द्विपक्षीय सम्बंधों में बाधा पैदा हो रही है। आतंकवाद पर भारत का रुख स्पष्ट है और दोहरे मानकों से दूर । इसलिए, भारत दूसरों से यह भी उम्मीद करता है कि वो मजबूती से धार्मिक तौर पर समान होने के बावजूद भी राजनयिक शिष्टाचार का पालन करें। क्योंकि यह मानवता है जो महत्वपूर्ण है, धर्म नहीं।

आलेख:- डॉ. इंदरानी तालुकदार, सीआईएस और तुर्की की रणनीतिक विश्लेषक

अनुवाद एवं स्वर- वीरेन्द्र कौशिक

Comments

Popular posts from this blog

भारत ने फिजी को पहुंचाई मानवीय सहायता

आत्मनिर्भर भारत में प्रवासियों की भूमिका

अरब-भारत सहयोग फोरम की बैठक