अशरफ़ ग़नी ने जीता अफ़्ग़ानिस्तान का राष्ट्रपति चुनाव
अफ़्ग़ानिस्तान में 28 सितंबर 2019 को ख़राब हालात में लड़े गए राष्ट्रपति चुनावों का परिणाम पाँच महीनों की देर के बाद 18 फ़रवरी को आया। पदासीन राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी को विजेता घोषित किया गया। हालांकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी डॉ. अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह ने चुनाव परिणाम मानने से इंकार कर दिया है। उन्होंने निर्वाचन आयोग पर धोखेधड़ी का आरोप लगाया है और घोषणा की है कि वे नई सरकार का गठन करेंगे। मतदान कम हुआ था और जब आरम्भिक गणना में श्री ग़नी को बढ़त मिल रही थी तब विरोधियों ने मतदान के प्रतिशत पर विवाद किया और इसके परिणाम स्वरूप 15 प्रतिशत मतों की जाँच की गई। राष्ट्रपति ग़नी ने 50.64प्रतिशत मतों के साथ बहुत ही कम मतों के अंतर से चुनाव जीता।
भारत ने अंतिम परिणामों की घोषणा किए जाने के बाद फिर से निर्वाचित होने के लिए राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी को बधाई दी है। भारत ने अफ़्ग़ानिस्तान के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के प्रति, नई सरकार के साथ मिलकर काम करते रहने के प्रति और बाहरी आतंकवाद से लड़ने में द्विपक्षीय सामरिक साझेदारी को मज़बूत करने में लोकतांत्रिक नीतियों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है ताकि अफ़्ग़ानिस्तान के नेतृत्व में, अफ़्ग़ानिस्तान की अपनी और इसी के द्वारा नियंत्रित पुनर्मिलाप वाली और समेकित राष्ट्रीय शांति स्थापित की जा सके।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि अफ़्ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति चुनाव परिणाम पर बहस छिड़ी हो। कुछ हद तक ये 2014 के राष्ट्रपति चुनाव का ही दोहराव है जिस में श्री ग़नी और डॉ. अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह उम्मीदवार थे। उस समय ना सिर्फ़ मतों की फिर से गणना की गई थी बल्कि दोनों पक्षों के बीच चुनाव परिणाम को लेकर भी विवाद छिड़ गया था और कोई भी पक्ष इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
हालांकि चुनाव के बाद सत्ता साझेदारी करने के लिए डॉ. अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह को मुख्य कार्यकारी का पद सौंपा गया। ये एक ऐसा पद था जो संवैधानिक रूप से निर्धारित नहीं था। लेकिन इसके लिए संसद ने प्रतिबंध लगाया था। संसदीय चुनाव चार वर्षों के अंतराल के बाद सितंबर 2018 के बाद ही हो सकते थे। सरकार अंदर के निष्क्रिय रही और दो धड़ों में बंटी रही इसलिए निर्वाचन सुधार और राष्ट्रीय एकता सरकार एजेंडे के हिस्से के तौर पर विशेष निर्वाचन सुधार आयोग की स्थापना नहीं हो पाई थी।
पिछले पाँच वर्षों में अफ़्ग़ानिस्तान एकता सरकार दो विरोधी नेताओं की वजह से पूरी तरह विभाजित रही। इस वजह से दोनों नेताओं ने अपने-अपने जातीय समूहों से आने वाले अपने वफ़ादारों को लेकर नौकरशाही में बहुत बदलाव किए और अन्य छोटे जातीय समूहों को भूल गए। कड़ी स्पर्धा की वजह से सरकार घाटे में रही। जो हिस्से छूट गए थे उन पर तालिबान के प्रति सहानुभूति रखने वालों ने क़ब्ज़ा कर लिया और अन्य गुटों के साथ इन्होंने सरकार को चुनौती दे डाली।
पिछले राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम ऐसे समय में आया है जब अफ़्ग़ानिस्तान तालिबान और ट्रम्प प्रशासन के बीच शांति समझौता करवाने की तैयारियाँ कर रहा है। समझौते को अंतिम रूप प्रदान करने के लिए सात दिनों की कड़ी परीक्षा से गुज़रना होगा जब दोनों पक्ष हिंसा कम करने की कोशिश करेंगे। शांति समझौते में अमरीकी सेनाओं का चरणों में वापिस जाना भी शामिल है।
हालांकि शांति के लिए असली परीक्षा तब शुरू होगी जब तालिबान अफ़्ग़ान सरकार के साथ वार्ता शुरू करेगा जिसमें शामिल होने से इसने अभी तक इंकार किया है। हालांकि तालिबान और अफ़्ग़ान सरकार के प्रतिनिधियों के बीच अनौपचारिक वार्ता के कई चक्र हो चुके हैं लेकिन तालिबान ने ये स्पष्ट कर दिया है कि इन वार्ताओ में शामिल होने वाले नेता निजी क्षमता में शामिल हो रहे हैं। राष्ट्रपति ग़नी ने तालिबान की शांति समझौता करने की नीति को ट्रोजन घोड़ा नीति या दिखावे की नीति कहा है हालांकि उन्होंने शांति की ज़रूरत पर भी बल दिया है।
अभी तक तालिबान ने अफ़्ग़ान सरकार को वैध क़रार नहीं दिया है। अब चुनाव से जुड़ा विवाद ग़नी सरकार की वैधता पर भी सवालिया निशान लगाएगा। इससे पूरी चुनाव प्रकिया और अफ़्ग़ानिस्तान में पश्चिम द्वारा स्थापित लोकतंत्र भी सवालों के घेरे में होगा। ग़ौरतलब है कि अफ़्ग़ानिस्तान शुरू से ही इसका विरोध करता रहा है। ऐसे समय में जब शांति समझौते पर फ़ैसला किया जाना है, चुनाव परिणामों को लेकर विवाद खड़ा होने से शांति प्रक्रिया ही ख़तरे में आ सकती है। या फिर राष्ट्रपति ग़नी के विरोधी द्वारा जिस परिणाम पर सवाल उठाए जा रहे हैं उसका असर बहुत लंबे समय तक रहेगा और इसकी वजह से ऐसे समय में राजनीतिक अस्थिरता तथा हिंसा और बढ़ सकती है जब तालिबान अमरीका द्वारा सूत्रबद्ध शांति समझौते के लिए तैयार हो रहा है।
आलेख- डॉ. स्मृति एस पटनायक, दक्षिण एशियाई सामरिक मामलों की विश्लेषक
अनुवाद- नीलम मलकानिया
भारत ने अंतिम परिणामों की घोषणा किए जाने के बाद फिर से निर्वाचित होने के लिए राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी को बधाई दी है। भारत ने अफ़्ग़ानिस्तान के लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के प्रति, नई सरकार के साथ मिलकर काम करते रहने के प्रति और बाहरी आतंकवाद से लड़ने में द्विपक्षीय सामरिक साझेदारी को मज़बूत करने में लोकतांत्रिक नीतियों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है ताकि अफ़्ग़ानिस्तान के नेतृत्व में, अफ़्ग़ानिस्तान की अपनी और इसी के द्वारा नियंत्रित पुनर्मिलाप वाली और समेकित राष्ट्रीय शांति स्थापित की जा सके।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि अफ़्ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति चुनाव परिणाम पर बहस छिड़ी हो। कुछ हद तक ये 2014 के राष्ट्रपति चुनाव का ही दोहराव है जिस में श्री ग़नी और डॉ. अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह उम्मीदवार थे। उस समय ना सिर्फ़ मतों की फिर से गणना की गई थी बल्कि दोनों पक्षों के बीच चुनाव परिणाम को लेकर भी विवाद छिड़ गया था और कोई भी पक्ष इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
हालांकि चुनाव के बाद सत्ता साझेदारी करने के लिए डॉ. अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह को मुख्य कार्यकारी का पद सौंपा गया। ये एक ऐसा पद था जो संवैधानिक रूप से निर्धारित नहीं था। लेकिन इसके लिए संसद ने प्रतिबंध लगाया था। संसदीय चुनाव चार वर्षों के अंतराल के बाद सितंबर 2018 के बाद ही हो सकते थे। सरकार अंदर के निष्क्रिय रही और दो धड़ों में बंटी रही इसलिए निर्वाचन सुधार और राष्ट्रीय एकता सरकार एजेंडे के हिस्से के तौर पर विशेष निर्वाचन सुधार आयोग की स्थापना नहीं हो पाई थी।
पिछले पाँच वर्षों में अफ़्ग़ानिस्तान एकता सरकार दो विरोधी नेताओं की वजह से पूरी तरह विभाजित रही। इस वजह से दोनों नेताओं ने अपने-अपने जातीय समूहों से आने वाले अपने वफ़ादारों को लेकर नौकरशाही में बहुत बदलाव किए और अन्य छोटे जातीय समूहों को भूल गए। कड़ी स्पर्धा की वजह से सरकार घाटे में रही। जो हिस्से छूट गए थे उन पर तालिबान के प्रति सहानुभूति रखने वालों ने क़ब्ज़ा कर लिया और अन्य गुटों के साथ इन्होंने सरकार को चुनौती दे डाली।
पिछले राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम ऐसे समय में आया है जब अफ़्ग़ानिस्तान तालिबान और ट्रम्प प्रशासन के बीच शांति समझौता करवाने की तैयारियाँ कर रहा है। समझौते को अंतिम रूप प्रदान करने के लिए सात दिनों की कड़ी परीक्षा से गुज़रना होगा जब दोनों पक्ष हिंसा कम करने की कोशिश करेंगे। शांति समझौते में अमरीकी सेनाओं का चरणों में वापिस जाना भी शामिल है।
हालांकि शांति के लिए असली परीक्षा तब शुरू होगी जब तालिबान अफ़्ग़ान सरकार के साथ वार्ता शुरू करेगा जिसमें शामिल होने से इसने अभी तक इंकार किया है। हालांकि तालिबान और अफ़्ग़ान सरकार के प्रतिनिधियों के बीच अनौपचारिक वार्ता के कई चक्र हो चुके हैं लेकिन तालिबान ने ये स्पष्ट कर दिया है कि इन वार्ताओ में शामिल होने वाले नेता निजी क्षमता में शामिल हो रहे हैं। राष्ट्रपति ग़नी ने तालिबान की शांति समझौता करने की नीति को ट्रोजन घोड़ा नीति या दिखावे की नीति कहा है हालांकि उन्होंने शांति की ज़रूरत पर भी बल दिया है।
अभी तक तालिबान ने अफ़्ग़ान सरकार को वैध क़रार नहीं दिया है। अब चुनाव से जुड़ा विवाद ग़नी सरकार की वैधता पर भी सवालिया निशान लगाएगा। इससे पूरी चुनाव प्रकिया और अफ़्ग़ानिस्तान में पश्चिम द्वारा स्थापित लोकतंत्र भी सवालों के घेरे में होगा। ग़ौरतलब है कि अफ़्ग़ानिस्तान शुरू से ही इसका विरोध करता रहा है। ऐसे समय में जब शांति समझौते पर फ़ैसला किया जाना है, चुनाव परिणामों को लेकर विवाद खड़ा होने से शांति प्रक्रिया ही ख़तरे में आ सकती है। या फिर राष्ट्रपति ग़नी के विरोधी द्वारा जिस परिणाम पर सवाल उठाए जा रहे हैं उसका असर बहुत लंबे समय तक रहेगा और इसकी वजह से ऐसे समय में राजनीतिक अस्थिरता तथा हिंसा और बढ़ सकती है जब तालिबान अमरीका द्वारा सूत्रबद्ध शांति समझौते के लिए तैयार हो रहा है।
आलेख- डॉ. स्मृति एस पटनायक, दक्षिण एशियाई सामरिक मामलों की विश्लेषक
अनुवाद- नीलम मलकानिया
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