काली नहीं ग्रे: एफएटीएफ द्वारा पाकिस्तान को एक और मौक़ा
जब वित्तीय कार्रवाई टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की बैठक पिछले रविवार को पेरिस में शुरू हुई, तो दुनिया भर के 205 देशों के 800 से अधिक प्रतिनिधियों के बीच, पाकिस्तान के ग्रे सूची से बाहर आने की संभावना के बारे में अटकलें लगाई जा रही रही थीं।
अन्य मुद्दों के अलावा, एफएटीएफ ने पाकिस्तान और अन्य देशों द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फाइनेंसिंग का मुकाबला करने के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की दिशा में प्रगति पर चर्चा की। ग्रे सूची में रखे गए देशों को इस वैश्विक वित्तीय प्रणाली के समक्ष एक प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करनी पड़ती है। पाकिस्तान जून 2018 से निरंतर इसकी ग्रे लिस्ट में पड़ा हुआ है।
19 फरवरी, 2020 को बताया गया किया गया कि पाकिस्तान इस साल जून तक ग्रे सूची में बना रहेगा। यह निश्चित था क्योंकि 17 फरवरी को पाकिस्तान द्वारा प्रस्तुत अनुपालन रिपोर्ट का अंतर्राष्ट्रीय सहयोग समीक्षा समूह (आईसीआरजी) ने मूल्यांकन का कार्य कर, कथित तौर पर निष्कर्ष निकाला था कि पाकिस्तान ने आतंक के वित्तपोषण पर अंकुश लगाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं।
लश्कर-ए-तैयबा के प्रमुख हाफिज सईद, जिसने नवंबर 2008 में मुंबई पर हमला करने का दावा किया था, को दोषी ठहराने के कदम से विश्व समुदाय को खुश करने के पाकिस्तान के प्रयासों के बावजूद यह निर्णय लिया गया है। सभी देशों की रेटिंग का अद्यतन अवलोकन 13 फरवरी 2020 को करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि पाकिस्तान ने 40 सिफारिशों में से मात्र एक को ही पूरी तरह से माना है। ऐसी कई खामियां थीं जिन पर पाकिस्तान ने ध्यान ही नहीं दिया।
पाकिस्तान की लापरवाही का स्तर इतना निम्न और इतना षड्यंत्रपूर्ण रहा कि उसके सदाबहार मित्र चीन, जो कि एफएटीएफ का वर्तमान अध्यक्ष भी है, ने भी ग्रे सूची से हटाने के पाकिस्तान के अनुरोध का समर्थन नहीं किया। तुर्की के अलावा, अन्य सभी देशों ने जून तक ग्रे सूची में पाकिस्तान के बने रहने के निर्णय का समर्थन किया; तब अगली बैठक आयोजित की जाएगी।
पिछले साल अक्टूबर में, एफएटीएफ द्वारा जारी की गई पारस्परिक मूल्यांकन रिपोर्ट में कहा गया था कि पाकिस्तान ने आतंकी वित्तपोषण और धन शोधन को रोकने के उपाय करने के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं पर वांछित प्रगति नहीं की है। इसमें चिंता और हताशा के साथ उल्लेख किया गया था कि कार्ययोजना में सभी समय सीमाएं समाप्त हो जाने के बावजूद, पाकिस्तान ने अपने यहाँ आतंकवाद वित्तपोषण (टीएफ) के जोखिमों को कम करने के लिए गंभीरता नहीं दिखाई।
इसमें आतंकवाद वित्तपोषण जोखिमों की पर्याप्त समझ नहीं होने के लिए पाकिस्तान को लताड़ लगाई गई और कहा था कि उसने ने 27 में से मात्र पांच कार्रवाई बिंदुओं का पालन किया था। उसने फरवरी 2020 तक पूरी कार्ययोजना को तेजी से पूरा करने का आदेश दिया था। इसमें विफल रहने पर अधिकांश सदस्य देशों से पाकिस्तान के साथ व्यापार संबंधों और लेनदेन पर विशेष सावधानी बरतने का आग्रह भी किया गया।
यदि पाकिस्तान ग्रे सूची से बाहर निकलना चाहता है तो उसे अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाने में कोई लापरवाही न बरते। यदि उसने अपने मित्र चीन पर भरोसा किया था, तो उसने भी पाकिस्तान को काली सूची में डाले जाने से बचाए रखा और वह ग्रे सूची में ही बना रहा। सच्चाई यह है कि एफएटीएफ में नियमों और प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा है, इस तरह के निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाएंगे। इस तथ्य को देखते हुए कि भारत भी एक सदस्य है, यह आतंकवाद वित्तपोषण में खराब रिकॉर्ड के कारण पाकिस्तान को राहत दिये जाने की संभावना नहीं थी।
यह भी स्वाभाविक था कि तुर्की, जो हाल के महीनों में सभी मुद्दों पर पाकिस्तान का आँख बंद करके समर्थन कर रहा है, और शायद एक या दो और देशों के अलावा आतंकवाद वित्तपोषण के मोर्चे पर पाकिस्तान के निराशाजनक प्रदर्शन के चलते उसे ग्रे सूची से बाहर निकालने के लिए अधिकांश देशों से समर्थन प्राप्त नहीं होगा। इस्लामाबाद को सभी आतंकवादी संगठनों के शीर्ष नेताओं को दोषी ठहराने और उनके विरुद्ध मुकदमा चलाने के लिए कहा गया है ताकि आतंक के खिलाफ कार्रवाई करने की उसके द्वारा प्रतिबद्धता का प्रदर्शन किया जा सके।
पाकिस्तानी नेतृत्व, काली सूची में डाले जाने के से बचने पर खुद को पीठ थपथपा रहे हैं; लेकिन वे मन ही मन, यह विलाप भी कर रहे होंगे कि उन्होंने खुद को एक दलदल में धकेल दिया है। आतंक के साथ पाकिस्तान के वर्षों के साथ ने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी प्रणालियों में बड़े स्तर पर प्रदूषण को जन्म दिया है, जिससे उत्पन्न खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त उपाय करना लगभग असंभव हो गया है। दुनिया की आँखों में धूल झोंकने की कोशिश करने के बजाय, पाकिस्तान को इस मौके को खुद को बचाने के एक अवसर के रूप में देखना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो इसके सबसे अच्छे मित्र को भी इसे काली सूची में डालने से रोकना मुश्किल हो सकता है।
आलेख - डॉ. अशोक बेहुरिया
अनुवादक एवं वाचक - हर्ष वर्धन
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