एफएटीएफ ने ईरान को काली सूची में डाला जबकि पाकिस्तान ग्रे-लिस्ट में बरकरार

दुनिया भर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से सुरक्षित बनाने की दिशा में कदम उठाते हुए और इसे पनपने ना देने के लिए वित्तीय सहायता पर रोक लगाते हुए वैश्विक अंतर-सरकारी निगरानी वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) ने पिछले शुक्रवार को ईरान को अपनी 'ब्लैक-लिस्ट' में बनाए रखने का निर्णय लिया। इसने पाकिस्तान को अपनी ग्रे लिस्ट में निचले स्तर पर रखा। 40-सदस्यीय संस्था एफएटीएफ, पेरिस में अपने मुख्यालय से धन शोधन यानि मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण की समस्या से निपटने के लिए वैश्विक वित्त पर नज़र रखती है जिसके लिए दो अलग-अलग श्रेणियों में एक सूची तैयार करती है जो ये संबद्ध देशों को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए एक सलाहकार के रूप में सेवा प्रदान करने के लिए देती है। एफएटीएफ द्वारा किसी देश को ब्लैकलिस्ट करने का मतलब है कि उस देश के साथ आर्थिक मामलों में लेन देन करना सबसे जोखिम भरा है। हालांकि 'ग्रे-लिस्ट' काली सूची यानि ब्लैक-लिस्ट से बेहतर है जिससे पता चलता है वो देश धन शोधन और आतंक के वित्तपोषण पर अंकुश लगाने के लिए वांछित कदम उठा रहा है लेकिन अभी भी और बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।

संयोगवश ईरान को ब्लैक लिस्ट करने की घोषणा उस दिन की गई थी जिस दिन ईरान ने अपने संसदीय चुनाव करवाए थे। इन चुनावों में रूढ़िवादियों को अपनी शक्तिशाली संस्था, संरक्षक परिषद द्वारा सुधारवादी उम्मीदवारों के बहुमत की वजह से बड़ी जीत हासिल करने की उम्मीद थी। यह चुनाव ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच परमाणु समझौते रद्द होने और ईरान पर उसे पंगु करने वालें प्रतिबंधों लगाने के कारण ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव की पृष्ठभूमि के तहत लड़ा गया है जिसकी वजह से ईरानी लोगों के बीच व्यापक आर्थिक असंतोष उभर कर आया और जिसके कारण वो सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के लिए प्रेरित हुए और इस चुनाव में लगातार उदासीनता बनी रही।

ऐसे समय जब ईरानी शासन यूरोप के साथ परमाणु समझौते को जारी रखने के लिए एक वैकल्पिक वित्तीय तंत्र मिलने की आशा कर रहा था, एफएटीएफ द्वारा ईरान को ब्लैकलिस्ट करने की घोषणा से उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मामले और जटिल हो जाएंगे। इसके साथ, संसद में एक बड़ी जीत से सत्ता में आने के साथ ही रूढ़िवादियों द्वारा ईरान-अमरीका गतिरोध के और तेज होने की उम्मीद है। वास्तव में ईरान को एफएटीएफ FATF द्वारा काली सूची में डालना भी सुधारवादियों और रूढ़िवादियों के बीच ईरान में गुटीय लड़ाई का एक सीधा परिणाम है क्योंकि वो आवश्यक कानून जो ईरान को एफएटीएफ ब्लैकलिस्ट से बचने की राह निकालता है, राष्ट्रपति हसन रूहानी की देखरेख में सुधारवादी संसद द्वारा पारित किया गया था लेकिन रूढ़िवादियों के प्रभुत्व वाली संरक्षक परिषद ने उसे बेअसर कर दिया था।

पाकिस्तान, जिसका इतिहास है आतंकवाद के वित्तपोषण का और वो भारत और अन्य कई जगहों पर कई आतंकवादी हमलों का जिम्मेदार रहा है। उसे अब FATF ने अपनी ग्रे-लिस्ट में बरकरार रखा है। इसके बावजूद कि उस सूची से अपना नाम हटवाने के लिए अमेरिका को साथ इस्लामाबाद ने लॉबिंग की है। अपने तंत्र से आतंकवाद के वित्तपोषण को जड़ से ख़त्म करने के प्रधानमंत्री इमरान खान के वादे पर भरोसा करते हुए फिलहाल ईरान के विपरीत, एफएटीएफ ने पाकिस्तान को ब्लैक-लिस्ट में डालने से छूट दी है।

पाकिस्तान 2012 से 2015 तक पहले एफएटीएफ ग्रे सूची में था और फिर संयुक्त राज्य अमेरिका के आग्रह पर 2018 में फिर से इस श्रेणी में रखा गया था। एफएटीएफ ने पाकिस्तान के पर्याप्त कदम नहीं उठाने के कारण उसकी आलोचना की थी लेकिन इस्लामाबाद को मलेशिया और तुर्की के साथ चीन से समर्थन प्राप्त हुआ, ताकि उसे काली सूची में शामिल होने से मुक्ति में मदद मिल सके। यह समझा जाता है कि पाकिस्तान को ये छूट संयुक्त राज्य अमेरिका और तालिबान के बीच मौजूदा वार्ताओं में महत्वपूर्ण भूमिका के कारण भी मिली है जो अमेरिका को अफगानिस्तान से हटने और साथ ही ईरान को अलग-थलग करने की अमेरिका की संभावित भूमिका निभाने में सक्षम हो सकता है। ऐसे समय में जब पाकिस्तान आर्थिक तंगी का सामना कर रहा है और इमरान खान इससे उबरने के लिए उपाय की तलाश में प्रयास कर रहे हैं, एफएटीएफ की ब्लैक-लिस्ट में पाकिस्तान का शामिल होना उनके लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।

जबकि ईरान के काली सूची में शामिल होने से उनके देश के लिए और अधिक आर्थिक कठिनाई पैदा होना निश्चित है और निकट भविष्य में इस सूची से उसे हटाए जाने की संभावना नहीं है जब तक कि संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ किसी प्रकार की वार्ता के माध्यम से गतिविज्ञान न बदल जाए। आशा है कि देश को शांतिपूर्ण राह पर लाने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान अपने वादों पर खरा उतरेंगे और आतंकवादी गतिविधियों और आतंकी वित्तपोषण पर रोक लगा पाएंगे।

आलेख:- डॉ. आसिफ शुजा, सीनियर रिसर्च फेलो, मध्य पूर्व संस्थान,

अनुवाद एवं स्वर- वीरेन्द्र कौशिक

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