भारत न्यूज़ीलैण्ड सम्बन्धः भारत-प्रशान्त में सम्बन्धों में निकटता।
भारत न्यूज़ीलैण्ड सम्बन्धों के नज़रिए से वर्ष 2020 की शुरुआत काफी सुकूनमन्द रही है। अभी पिछले महीने ही न्यूज़ीलैण्ड के आप्रवासी मन्त्री इयान लीस मुम्बई आए थे। जबकि फरवरी में वहाँ के उप-प्रधानमन्त्री तथा विदेशमन्त्री विन्सटन पीटर्स और उद्योगमन्त्री डेविड पार्कर एक व्यापारिक शिष्टमण्डल से साथ भारत पधारे हैं। उम्मीद है कि उनकी यात्रा से भारत और न्यूज़ीलैण्ड के आपसी रिश्तों को और गहराने में मदद मिलेगी।
ऐतिहासिक नज़रिए से भारत और न्यूज़ीलैण्ड के बीच अनेक समानताएँ रही हैं। इनमें ब्रिटिश उपनिवेशवाद, संसदीय सरकार और राष्ट्रमण्डल की विरासत शामिल हैं। इनके अलावा दोनों मुल्क आपसी हित के मसलों की खोज पर सूक्ष्म और केन्द्रित रवैया अपनाने और भारत-प्रशान्त क्षेत्र में सीमा सम्बन्धी मुद्दों पर सहमति के लिए प्रयासरत रहे हैं। इन मुद्दों की मद्देनज़र न्यूज़ी उपप्रधानमंत्री ने ‘‘भारत 2025 - सम्बन्धों में निवेश’’ शीर्षक से एक कूटनीतिक दस्तावेज़ तैयार किया है। इसके माध्यम से सभी अहम विषयों सहित सम्बन्ध-सुधार के लिए रास्ता तैयार किया जाएगा।
आपसी व्यापार में बढ़ोतरी दोनों मुल्कों के रिश्तों का अहम बिन्दु है। फिलहाल, भारत और न्यूज़ीलैण्ड का द्विपक्षीय व्यापार तकरीबन 1.5 न्यूज़ीडॉलर है; जो मूल्य के नज़रिए से तो अच्छा है, लेकिन निकटता दृष्टि से से कम महसूस होता है। अगर इसमें सेवाक्षेत्र का मूल्य भी जोड़ दिया जाए, तो आपसी व्यापार की कीमत 2.64 न्यूज़ीडॉलर हो जाती है। इसी बिन्दु को सामने रखकर उद्योगमन्त्री डेविड पार्कर के नेतृत्व में आए व्यापारिक शिष्टमण्डल ने दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ोतरी और भारत-न्यूज़ीलैण्ड द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते यानि एफ.टी.ए. की संभावनाएँ तलाशने पर खासा ध्यान केन्द्रित किया। समग्र क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी यानि आर.सी.ई.पी. से बाहर आने के बाद भारत को न्यूज़ीलैण्ड के साथ क्षेत्रीय और द्विपक्षीय व्यापार सन्धियों की खासी दरकार है।
यह सुखद बात है कि वेलिंगटन, नई दिल्ली के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्तों की ज़रूरत को बाकायदे समझता है और काफी तवज्जो देता है। दोनों पक्ष व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी आपसी निकटता की ज़रूरत पर ज़ोर देते रहे हैं। अभी तक न्यूज़ीलैण्ड क्षेत्रीय आर्थिक मामलों में भारत-प्रशान्त के बदले एशिया-प्रशान्त शब्दावली का प्रयोग करता रहा है। इसका कारण क्षेत्रीय के बदले व्यापक अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य को तवज्जो देना हो सकता है। भौगोलिक तौर पर न्यूज़ीलैण्ड प्रशान्त महासागर के दक्षिणी सिरे पर मौजूद है। यही वजह है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए एशिया-प्रशान्त क्षेत्रीय पहचान का इस्तेमाल करता रहा है।
लेकिन हालिया दौर में भू-राजनीतिक परिदृश्य तेज़ी से बदल रहे हैं। ऐसा केवल न्यूज़ीलैण्ड के साथ ही नहीं हो रहा; बल्कि तमाम क्षेत्रीय ताकतें पारंपरिक पहचान से आगे बढ़कर वैश्विक समीकरणों को स्वीकार कर रही हैं। इसी नज़रिए से न्यूज़ीलैण्ड, भारत-प्रशान्त को अपनी विदेशनीति और आर्थिक साझेदारी का आयाम बनाने का प्रयास कर रहा है। ज्ञातव्य है कि भारत अपनी भूराजनीतिक स्थिति और बढ़ती आर्थिक क्षमताओं के चलते अनेक मुल्कों के लिए आकर्षक व्यापार सहभागी बनकर उभर रहा है। फिलहाल, दोनों मुल्कों के बीच आपसी सहभागिता के मुद्दे काफी स्पष्ट हैं जिनका नियमन संयुक्त राष्ट्र सामुद्रिक कानून सम्मेलन के दिशानिर्देशों के तहत किया जा सकता है। भारत और न्यूज़ीलैण्ड इस नियमावली के मुताबिक अपने वाले समय में आपसी रिश्तों की प्राथमिकताएँ तय कर सकते हैं।
बहुपक्षीय तौर पर भी दोनों देश अनेक अन्तर्राष्ट्रीय गठबन्धनों में सहभागी बने हुए हैं। इनमें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन यानि ई.ए.एस. और आसियान प्रतिरक्षामन्त्री बैठक योग उल्लेखनीय हैं। इन दो सहभागिताओं को आगे बढ़ाते हुए भारत और न्यूज़ीलैण्ड क्षेत्रीय स्तर पर भी साझेदारियों का गठन कर सकते हैं। इससे दोनों देश द्विपक्षीय स्तर पर व्यापार, क्षेत्रीय शान्ति और स्थिरता के लिए मिलकर काम कर पाएँगे। हालिया वर्षों में भारत अन्तर्राष्ट्रीय धरातल पर बड़ी ताकत बनकर उभरा है। इससे ऊर्जा लेकर वह द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों में गहन भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
आलेख – प्रॉफेसर शंकरी सुन्दरारमन, सैंटर फॉर इण्डो पैसिफिक स्टडीज़ एस.आई.एस., जे.एन.यू.।
अनुवाद और वाचन - डॉ. श्रुतिकान्त पाण्डेय।
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