भारत और तुर्कमेनिस्तान के संबंध और मज़बूत
तुर्कमेनिस्तान के विदेश मंत्री एवम मंत्रिमंडल के उपाध्यक्ष राशिद मेरेदोफ़ हाल ही में भारत के संक्षिप्त दौरे पर थे। उन्होंने भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर से मुलाक़ात की। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय तथा क्षेत्रीय मसलों पर चर्चा की। भारत के विदेश मंत्री ने कहा कि चर्चा के दौरान क्षेत्रीय मसलों पर सुदृढ़ सहमति बनी।
90 के दशक के आरंभ में पूर्ववर्ती सोवियत संघ से आज़ाद हुए पाँच मध्य एशियाई गणराज्यों में से तुर्कमेनिस्तान एक है। भारत मध्य एशिया को अपने वृहत्तर पड़ोस के तौर पर देखता है। तुर्कमेनिस्तान की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति उसे अंत: क्षेत्रीय संबंधों में महत्वपूर्ण बना देती है। तुर्कमेनिस्तान दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया को जोड़ता है। दक्षिण एशिया में इसका पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान है और पश्चिम में ईरान। इसके मध्य एशियाई पड़ोसी कज़ाकिस्तान और उज़्बेकिस्तान हैं। तुर्कमेनिस्तान कैस्पियन सागर के तट पर स्थित है और यूरेशिया तथा यूरोप का द्वार कहलाता है। मार्ग सम्पर्क में सुधार को तुर्कमेनिस्तान वरीयता देता आया है। 2016 में, उसने 2.3 अरब अमरीकी डॉलर की लागत से इस क्षेत्र के सबसे बड़े हवाई अड्डे का निर्माण किया।
तुर्कमेनिस्तान की कुल आबादी क़रीब 60 लाख है और कम आबादी के बावजूद इसकी आर्थिक महत्ता महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक गैस का चौथा सबसे बड़ा भंडार वहीं है। तेल, सल्फ़र और अन्य खनिज भी यहाँ प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं। विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार, इसका सकल घरेलू उत्पाद क़रीब सालीस चार अरब डॉलर हो सकता है। राष्ट्रपति गुरबांगुलि बर्दीमोहाम्मदोफ़ की सरकार अर्थव्यवस्था को बहुमुखी बनाने का प्रयास कर रही है। तेल, गैस, कृषि, निर्माण और संचार जैसे पारम्परिक क्षेत्रों के अतिरिक्त रसायन, दूरसंचार और अन्य उच्च प्रौद्योगिकी वाले क्षेत्रों को भी पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है। तुर्कमेनिस्तान वर्ष 2019 से 2025 तक चरणबद्ध रूप से डिजिटल आर्थिक कार्यक्रम भी लागू कर रहा है।
विश्व के साथ अपने संबंधों में तुर्कमेनिस्तान स्थायी तटस्थता की नीति का पालन करता है। इस नीति को 1995 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी अपना समर्थन दिया था। भारत इससे संबंधित प्रस्ताव का सह-प्रायोजक था और अब एश्गाबात अपनी 25वीं सालगिरह मना रहा है। अपनी विशिष्ट भौगेलिक स्थिति और आर्थिक संभावनाओं की वजह से तुर्कमेनिस्तान मध्य एशिया के साथ भारत के संबंधों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। दोनों देशों के बीच पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। मशहूर सिल्क रूट या रेशम मार्ग दोनों सभ्यताओं को जोड़ता था। मध्य काल में भी यह सम्पर्क मज़बूत बना रहा और उस क्षेत्र से संत और विद्वान भारत आते रहे। शाहतुर्कमान बायाबानी ऐसे ही एक प्रसिद्ध सूफ़ी संत थे, जो 13वीं सदी में भारत में रहे। उनके सम्मान में दिल्ली में 17वीं सदी में तुर्कमान दरवाज़ा बनवाया गया। बादशाह अकबर का संरक्षक बैरम ख़ान भी तुर्कमानी मूल का था। भारत और तुर्कमेनिस्तान के बीच सुदृढ़ राजनैतिक एवम सांस्कृतिक संबंध हैं। दोनों देशों के बीच वरीष्ठतम राजनेताओं का आना-जाना रहा है। राष्ट्रपति गुरबांगुलि बर्दीमोहाम्मदोफ़ मई 2010 में भारत आए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जुलाई 2015 में तुर्कमेनिस्तान गए और आपसी सहमति के कई मसौदों तथा समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। 2015 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहाँ एक पारम्परिक औषधि एवम योग केंद्र का भी उद्घाटन किया था।
दोनों देशों के सौहार्दपूर्ण संबंधों और सुदृढ़ जन-सम्पर्क के बावजूद दोनों की सम्मिलित आर्थिक संभावनाओं का पूर लाभ नहीं उठाया जा सका है। सन् 2018-19 में आपसी व्यापार क़रीब 66 मिलियन अमरीकी डॉलर का था। दोनों देशों के बीच अवसरों को लेकर अपर्याप्त जानकारी और भारत तथा मध्य एशिया के बीच सीधे सड़क सम्पर्क का अभाव आपसी व्यापार में बाधक हैं। अफ़ग़ानिस्तान की अस्थिरता भी दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के रिश्तों में बाधक रही है। दोनों ही देश अफ़ग़ानिस्तान में शांति और स्थिरता चाहते हैं।
हाल का घटनाक्रम दोनों देशों के बीच संबंधों को और सुदृढ़ बनाने में सहायक होगा। भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारी निवेश किया है। तुर्कमेनिस्तान और कज़ाकिस्तान दोनों रेल सम्पर्क से ईरान से जुड़े हैं। चाबहार बंदरगाह को ईरान के रेल नेटवर्क से जोड़ने पर तुर्कमेनिस्तान और मध्य एशिया के साथ भारत का सम्पर्क और बेहतर हो जाएगा। सन् 2018 में, भारत एश्गाबात समझौते में शामिल हुआ जो पश्चिम एशिया के ईरान और ओमान को मध्य एशिया के तुर्कमेनिस्तान तथा उज़्बेकिस्तान के बीच अंतर्राष्ट्रीय परिवहन कॉरिडोर बनाने से संबंधित है। हाल ही में बहुप्रतीक्षित तुर्कमेनिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के बीच प्राकृतिक गैस पाइपलाइन को लेकर भी प्रगति हुई है। सन् 2012 में, विक्रय एवम क्रय समझौते पर हस्ताक्षर भी हुए थे। तुर्कमेनिस्तान ने सूचित किया कि उसके इलाक़े में इस गैस पाइपलाइन का निर्माण तय कार्यक्रम के अनुसार हो रहा है और 2018 में अफ़ग़ानिस्तान में भी यह शुरू हो चुका है। निकट भविष्य में भारत और तुर्कमेनिस्तान के बीच रिश्ते और बढ़ेंगे।
आलेख- डॉ अतहर ज़फ़र, सीआईएस मामलों के रणनीतिक विश्लेषक
अनुवाद- मुनीश शर्मा
90 के दशक के आरंभ में पूर्ववर्ती सोवियत संघ से आज़ाद हुए पाँच मध्य एशियाई गणराज्यों में से तुर्कमेनिस्तान एक है। भारत मध्य एशिया को अपने वृहत्तर पड़ोस के तौर पर देखता है। तुर्कमेनिस्तान की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति उसे अंत: क्षेत्रीय संबंधों में महत्वपूर्ण बना देती है। तुर्कमेनिस्तान दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया को जोड़ता है। दक्षिण एशिया में इसका पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान है और पश्चिम में ईरान। इसके मध्य एशियाई पड़ोसी कज़ाकिस्तान और उज़्बेकिस्तान हैं। तुर्कमेनिस्तान कैस्पियन सागर के तट पर स्थित है और यूरेशिया तथा यूरोप का द्वार कहलाता है। मार्ग सम्पर्क में सुधार को तुर्कमेनिस्तान वरीयता देता आया है। 2016 में, उसने 2.3 अरब अमरीकी डॉलर की लागत से इस क्षेत्र के सबसे बड़े हवाई अड्डे का निर्माण किया।
तुर्कमेनिस्तान की कुल आबादी क़रीब 60 लाख है और कम आबादी के बावजूद इसकी आर्थिक महत्ता महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक गैस का चौथा सबसे बड़ा भंडार वहीं है। तेल, सल्फ़र और अन्य खनिज भी यहाँ प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं। विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार, इसका सकल घरेलू उत्पाद क़रीब सालीस चार अरब डॉलर हो सकता है। राष्ट्रपति गुरबांगुलि बर्दीमोहाम्मदोफ़ की सरकार अर्थव्यवस्था को बहुमुखी बनाने का प्रयास कर रही है। तेल, गैस, कृषि, निर्माण और संचार जैसे पारम्परिक क्षेत्रों के अतिरिक्त रसायन, दूरसंचार और अन्य उच्च प्रौद्योगिकी वाले क्षेत्रों को भी पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है। तुर्कमेनिस्तान वर्ष 2019 से 2025 तक चरणबद्ध रूप से डिजिटल आर्थिक कार्यक्रम भी लागू कर रहा है।
विश्व के साथ अपने संबंधों में तुर्कमेनिस्तान स्थायी तटस्थता की नीति का पालन करता है। इस नीति को 1995 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी अपना समर्थन दिया था। भारत इससे संबंधित प्रस्ताव का सह-प्रायोजक था और अब एश्गाबात अपनी 25वीं सालगिरह मना रहा है। अपनी विशिष्ट भौगेलिक स्थिति और आर्थिक संभावनाओं की वजह से तुर्कमेनिस्तान मध्य एशिया के साथ भारत के संबंधों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। दोनों देशों के बीच पुराने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। मशहूर सिल्क रूट या रेशम मार्ग दोनों सभ्यताओं को जोड़ता था। मध्य काल में भी यह सम्पर्क मज़बूत बना रहा और उस क्षेत्र से संत और विद्वान भारत आते रहे। शाहतुर्कमान बायाबानी ऐसे ही एक प्रसिद्ध सूफ़ी संत थे, जो 13वीं सदी में भारत में रहे। उनके सम्मान में दिल्ली में 17वीं सदी में तुर्कमान दरवाज़ा बनवाया गया। बादशाह अकबर का संरक्षक बैरम ख़ान भी तुर्कमानी मूल का था। भारत और तुर्कमेनिस्तान के बीच सुदृढ़ राजनैतिक एवम सांस्कृतिक संबंध हैं। दोनों देशों के बीच वरीष्ठतम राजनेताओं का आना-जाना रहा है। राष्ट्रपति गुरबांगुलि बर्दीमोहाम्मदोफ़ मई 2010 में भारत आए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जुलाई 2015 में तुर्कमेनिस्तान गए और आपसी सहमति के कई मसौदों तथा समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। 2015 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहाँ एक पारम्परिक औषधि एवम योग केंद्र का भी उद्घाटन किया था।
दोनों देशों के सौहार्दपूर्ण संबंधों और सुदृढ़ जन-सम्पर्क के बावजूद दोनों की सम्मिलित आर्थिक संभावनाओं का पूर लाभ नहीं उठाया जा सका है। सन् 2018-19 में आपसी व्यापार क़रीब 66 मिलियन अमरीकी डॉलर का था। दोनों देशों के बीच अवसरों को लेकर अपर्याप्त जानकारी और भारत तथा मध्य एशिया के बीच सीधे सड़क सम्पर्क का अभाव आपसी व्यापार में बाधक हैं। अफ़ग़ानिस्तान की अस्थिरता भी दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के रिश्तों में बाधक रही है। दोनों ही देश अफ़ग़ानिस्तान में शांति और स्थिरता चाहते हैं।
हाल का घटनाक्रम दोनों देशों के बीच संबंधों को और सुदृढ़ बनाने में सहायक होगा। भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारी निवेश किया है। तुर्कमेनिस्तान और कज़ाकिस्तान दोनों रेल सम्पर्क से ईरान से जुड़े हैं। चाबहार बंदरगाह को ईरान के रेल नेटवर्क से जोड़ने पर तुर्कमेनिस्तान और मध्य एशिया के साथ भारत का सम्पर्क और बेहतर हो जाएगा। सन् 2018 में, भारत एश्गाबात समझौते में शामिल हुआ जो पश्चिम एशिया के ईरान और ओमान को मध्य एशिया के तुर्कमेनिस्तान तथा उज़्बेकिस्तान के बीच अंतर्राष्ट्रीय परिवहन कॉरिडोर बनाने से संबंधित है। हाल ही में बहुप्रतीक्षित तुर्कमेनिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के बीच प्राकृतिक गैस पाइपलाइन को लेकर भी प्रगति हुई है। सन् 2012 में, विक्रय एवम क्रय समझौते पर हस्ताक्षर भी हुए थे। तुर्कमेनिस्तान ने सूचित किया कि उसके इलाक़े में इस गैस पाइपलाइन का निर्माण तय कार्यक्रम के अनुसार हो रहा है और 2018 में अफ़ग़ानिस्तान में भी यह शुरू हो चुका है। निकट भविष्य में भारत और तुर्कमेनिस्तान के बीच रिश्ते और बढ़ेंगे।
आलेख- डॉ अतहर ज़फ़र, सीआईएस मामलों के रणनीतिक विश्लेषक
अनुवाद- मुनीश शर्मा
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