आतंकवाद पर दोहरे रुख़ के लिए पाकिस्तान फिर हुआ बेनकाब
अपनी ज़मीन से संचालन करने वाले आतंकी गुटों से निपटने में पाकिस्तान सरकार का दोहरा रवैया जग ज़ाहिर है। हालांकि पेरिस में वैश्विक आतंकी मसूद अज़हर के बारे में वित्त कार्य बल या एफ़एटीएफ़ (FATF) के पूर्ण सत्र के सामने सफ़ेद झूठ बोलने की वजह से ये एक बार फिर बेनकाब हो गया है। ये आतंकी आधिकारिक संरक्षण हासिल करके पाकिस्तान में छिपा हुआ है। इस्लामाबाद पूरी दुनिया को ये जताने की कोशिश कर रहा है कि ये आतंकी गुटों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रहा है लेकिन असल में ये दुनिया भर में आतंकी हमलों के ज़िम्मेदार मसूद अज़हर, हाफ़िज़ मोहम्मद सईद, ज़किर उर रहमान लखवी जैसे अन्य आतंकियों को ना तो सज़ा दे रहा है और ना ही उनके ख़िलाफ़ कोई कड़ी कार्रवाई कर रहा है।
मसूद अज़हर उस जैश-ए-मोहम्मद का सरगना है जिसने 14 फ़रवरी 2019 में जम्मू और कश्मीर के पुलवामा आतंकी हमले की ज़िम्मेदारी ली थी। इस हमले में भारत के केन्द्रीय आरक्षित पुलिस बल के चालीस जवान मारे गए थे। भारत ने 26 फ़रवरी 2019 को जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के मुख्यालय और प्रशिक्षण केन्द्र तबाह कर दिए थे।
तब से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पर मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए दबाव बढ़ता जा रहा था। अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस ने एक संयुक्त क़दम उठाया लेकिन पाकिस्तान और चीन ने इस में अड़चन पैदा की। अंत में 1 मई 2019 को मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित किया गया लेकिन पाकिस्तान खुलेआम या चोरी-छिपे उसे बचाता रहा।
एफ़एटीएफ़ के पूर्ण सत्र के कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान ने बताया कि मसूद ग़ायब है और उसका पता नहीं चल पा रहा है। काफी दिन बाद एक और चाल चलते हुए पाकिस्तान ने जमात-उद-दावा के सरगना हाफ़िज़ सईद को आतंकी गतिविधियों के लिए साढ़े पाँच साल के लिए जेल भेज दिया। इन दो फ़ैसलों के समय को लेकर ख़ूब विवाद हुआ। सभी ये जानते हैं कि पाकिस्तान एफ़एटीएफ़ की काली सूची में जाने से बचने की कोशिश कर रहा है।
एफ़एटीएफ़ के पूर्ण सत्र से ठीक पहले मसूद का ग़ायब होना या हाफ़िज़ सईद को जेल भेजे जाने से पाकिस्तान की मंशा के बारे में संदेह पैदा होता है। जून 2018 से इस्लामाबाद को कार्य बल द्वारा आतंक वित्त पोषण को लेकर पहले से ही ग्रे सूची में डाल दिया गया है। आतंकरोधी वित्तीय उपायों और हवाला रोकने के लिए कड़े नियमों के लिए कार्य बल द्वारा 27 बिंदु की कार्य योजना सूची दी गई थी।
एटीएफ़ ने पाया कि पाकिस्तान ने 27 बिंदु कार्य योजना में से केवल 14 बिंदुओं पर ही काम किया। इसने इस्लामाबाद से कहा था कि या तो सभी बिंदुओं पर कार्य किया जाए या फिर काली सूची में शामिल होने के लिए तैयार रहे जिसका अर्थ है कि पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक या यूरोपीय संघ से आर्थिक मदद लेना मुश्किल हो जाएगा और देश की आर्थिक दशा और भी बिगड़ जाएगी।
पाकिस्तान सरकार की ओर से जहाँ लगातार ये कहा जा रहा है कि मसूद अज़हर ग़ायब है और उसे नहीं ढूँढा जा सका वहीं पाकिस्तानी मीडिया में विश्वसनीय ख़ुफिया विभाग के हवाले से ऐसी ख़बरे आती रहीं कि वो बहावलपुर में जैश-ए-मोहम्मद के मुख्यालय के ठीक पीछे एक सुरक्षित घर में पाकिस्तान की आईएसआई की भारी सुरक्षा के बीच छिपा हुआ है। मसूद अज़हर के ठिकाने के बारे में पाकिस्तान में ये विरोधाभास मौजूद है। एक निजी पाकिस्तानी टीवी चैनल ने अमरीका-तालिबान समझौते के बारे में मसूद अज़हर का एक ऑडियो भी जारी किया है। बताया जाता है कि अज़हर अपनी सुरक्षा के लिए रावलपिंडी के नज़दीक सेना के मुख्यालय के पास रह रहा है। इससे पाकिस्तान सरकार के झूठ का पर्दाफाश हो गया है। सच्चाई ये है कि वो पाकिस्तान में ही है और आधिकारिक सुरक्षा का आनंद उठाते हुए एक जगह से दूसरी जगह पर रहने के लिए जा रहा है।
इन चालबाज़ियों से पाकिस्तान कुछ समय के लिए एफ़एटीएफ़ की ख़तरनाक कार्रवाई से तो बच गया है। अब देखना ये है कि ऐसा कब तक चलेगा। आतंकी गुटों का साथ देने पर इस्लामाबाद का दोहरा रवैया सबके सामने आ चुका है। अब समय आ चुका है कि इसे पूरी निष्ठा के साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ अपने संबंध सुधारने चाहिए। पाकिस्तान को भारत के पुलवामा और पठानकोट के हवाई अड्डों पर हुए आतंकी हमलों की साज़िश रचने वालों को सज़ा देनी चाहिए और साथ ही जम्मू और कश्मीर में सीमा पार से होने वाली उग्रवादी गतिविधियों को समाप्त करना चाहिए। इससे इस्लामाबाद की आतंक से लड़ने की इच्छा का पता चलेगा।
आलेख- रतन साल्दी,राजनीतिक समीक्षक
अनुवाद- नीलम मलकानिया
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