तेल कीमतों पर जारी तनातनी
साउदी अरब द्वारा तेल के दामों में 30 फीसदी से भी ज़्यादा की कमी के साथ ही तेल उत्पादकों के बीच खींचतान का दौर शुरु हो गया है। 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद से तेल की कीमतों में इतनी बड़ी गिरावट पहली बार देखी जा रही है। यह स्थिति साउदी अरब और रूस के बीच तेल उत्पादन में कटौती को लेकर उपजी असहमति से उत्पन्न हुई है।
साउदी अरब के नेतृत्व वाला तेल उत्पादक देशों का संगठन ‘ओपेक’ कोरोना वायरस से उपजी वैश्विक मन्दी को ध्यान में रखते हुए तेल उत्पादन में प्रतिदिन 1.5 मिलियन बैरल की कटौती करना चाहता था, जबकि रूस अपने स्तर पर उत्पादन घटाने पर सहमत नहीं था। इस तकरार के बीच साउदी तेल कम्पनी ब्रैण्ट ने अपनी तरफ से दामों में ऐतिहासिक कमी की घोषणा कर दी। कोरोना वायरस से उत्पन्न संकट के चलते दुनियाभर के वित्तीय संस्थानों, विनिर्माण और ऊर्जाक्षेत्र में निवेश पर मन्दी की छाया मँडरा रही है। ऐसे में साउदी अरब ने तेल के दामों में कटौती करके फिॅस्कल-ब्रेक-इवन के हालात पैदा कर दिए हैं। यह शब्दावली ऐसे हालातों के लिए इस्तेमाल की जाती है, जबकि तेल उत्पादक अपने स्तर पर उत्पादन में कटौती करते हैं और तेल निर्यातकों को बजट सन्तुलन का मौका मिल जाता है। रूस द्वारा निर्धारित फिॅस्कल-ब्रेक-इवन मूल्य 42 डॉलर प्रति बैरल है जबकि साउदी कम्पनी अरामको का फिॅस्कल-ब्रेक-इवन मूल्य 83 डॉलर है। यही कारण है कि रियाद की ब्रैण्ट तेल कम्पनी द्वारा घोषित 31 डॉलर प्रति बैरल का मूल्य दुनिया में कीमत-युद्ध का सबब बन गया है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ब्रैण्ट द्वारा घोषित न्यूनतम तेल मूल्य वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्याप्त मन्दी से उबरने में मददगार हो सकेगा? इसका जवाब तभी दिया जा सकता है जब मूल्य में कमी का फायदा निवेशकों और उपभोक्ताओं तक पहुँचाने की व्यवस्था लागू की जाए। विश्लेषकों की राय में इस रुझान का ऊर्जाक्षेत्र में निवेश पर नकारात्मक असर होगा। लेकिन अगर कर का बोझ बढ़ाए बिना उपभोक्ताओं तक मूल्य कटौती का लाभ पहुँचाया जाए; तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है।
हालात का दूसरा पहलू यह है कि कोरोना संकट से तेल के उत्पादन में कटौती के साथ ही माँग में भी कमी आ सकती है। इसका असर अमरीकी तेल उद्योग पर भी होगा जो पहले ही कर्ज़ के बोझ तले दबा हुआ है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि तेल उत्पादकों की स्थितियों में भिन्नता के कारण मूल्यों में कमी का असर सब पर एक समान नहीं होगा। तेल के मूल्य और निवेशकों की बैलेंसशीट एक दूसरे पर निर्भर हैं। ऐसे में कच्चेतेल के शेयरधारक फिलहाल बाज़ार से दूरी बनाए हुए हैं।
विश्लेषकों का अनुमान है कि तेल के दामों में 10 डॉलर की कमी से वैश्विक जी.डी.पी. में 0.3 फीसदी बदलाव होता है जिसका रुझान तेल उत्पादकों से तेल उपभोक्ता देशों की तरफ होता है। इसका सीधा असर ब्याजदरों पर देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए रूस में 10 वर्षीय बॉण्ड पर ब्याजदर महज 2.56 फीसदी रह गई है। इसी तरह, साउदी सरकार के अपै्रल 2030 में परिपक्व होने वाले बॉण्डस् की हालिया ब्याजदर 2.38 प्रतिशत है। उधर, अमेरिका में भी यही रुझान है, जहाँ ऊर्जाक्षेत्र में निवेश की ब्याजदर 2.95 प्रतिशत रह गई है। इस तरह तेलमूल्यों में कटौती का असर मुद्रा और उपभोक्ता बाज़ार; दोनों पर देखा जा सकता है।
भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। तेल के मूल्यों में कटौती पर रियाद, रूस और अमरीका के बीच छिड़ी तनातनी का उसकी वित्तीय स्थिति पर सकारात्मक असर होगा। तेल के दामों में प्रतिबैरल 20 डॉलर की कमी से उसका चालूखाता घाटा 30 बिलियन डॉलर तक कम हो जाएगा। माना जा रहा है कि तेल के दामों को लेकर जारी तनातनी ज़्यादा लम्बे वक्त तक नहीं चलेगी। ऐसे में भारत को भी मूल्य कटौती का अधिकतम लाभ उठाने की नीति अपनानी चाहिए।
ज्ञातव्य है कि रूस और साउदी अरब पिछले तकरीबन तीन सालों से तेल उत्पादन घटाकर मूल्य बढ़ाने की नीति पर चल रहे थे। इस बीच, अमरीकी शैल कम्पनियों ने तेल के दाम स्थिर रखते हुए अपना बाज़ार बढ़ाने और लाभ कमाने में सफलता हासिल की। वैश्विक भू-राजनीतिक हालातों के चलते अमरीका ने रूस के ऊर्जाक्षेत्र पर प्रतिबन्ध लगा दिए। तेल कीमतों पर छिडे़ संघर्ष के बीच रूस ने उत्पादन बढ़ाकर कीमत घटाने की नीति अपनाई है। उसके इस कदम का साउदी अरब के नेतृत्व वाले ओपेक पर नकारात्मक असर होगा।
आलेख - डॉ. लेखा एस. चक्रवर्ती, प्रॉफेसर, एन.आई.एफ.पी. और रिसर्च एसोसिएट, द लेवी इकोनॉमिक्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ बार्ड कॉलेज, न्यूयॉर्क।
अनुवाद और वाचन - डॉ. श्रुतिकान्त पाण्डेय।
साउदी अरब के नेतृत्व वाला तेल उत्पादक देशों का संगठन ‘ओपेक’ कोरोना वायरस से उपजी वैश्विक मन्दी को ध्यान में रखते हुए तेल उत्पादन में प्रतिदिन 1.5 मिलियन बैरल की कटौती करना चाहता था, जबकि रूस अपने स्तर पर उत्पादन घटाने पर सहमत नहीं था। इस तकरार के बीच साउदी तेल कम्पनी ब्रैण्ट ने अपनी तरफ से दामों में ऐतिहासिक कमी की घोषणा कर दी। कोरोना वायरस से उत्पन्न संकट के चलते दुनियाभर के वित्तीय संस्थानों, विनिर्माण और ऊर्जाक्षेत्र में निवेश पर मन्दी की छाया मँडरा रही है। ऐसे में साउदी अरब ने तेल के दामों में कटौती करके फिॅस्कल-ब्रेक-इवन के हालात पैदा कर दिए हैं। यह शब्दावली ऐसे हालातों के लिए इस्तेमाल की जाती है, जबकि तेल उत्पादक अपने स्तर पर उत्पादन में कटौती करते हैं और तेल निर्यातकों को बजट सन्तुलन का मौका मिल जाता है। रूस द्वारा निर्धारित फिॅस्कल-ब्रेक-इवन मूल्य 42 डॉलर प्रति बैरल है जबकि साउदी कम्पनी अरामको का फिॅस्कल-ब्रेक-इवन मूल्य 83 डॉलर है। यही कारण है कि रियाद की ब्रैण्ट तेल कम्पनी द्वारा घोषित 31 डॉलर प्रति बैरल का मूल्य दुनिया में कीमत-युद्ध का सबब बन गया है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ब्रैण्ट द्वारा घोषित न्यूनतम तेल मूल्य वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्याप्त मन्दी से उबरने में मददगार हो सकेगा? इसका जवाब तभी दिया जा सकता है जब मूल्य में कमी का फायदा निवेशकों और उपभोक्ताओं तक पहुँचाने की व्यवस्था लागू की जाए। विश्लेषकों की राय में इस रुझान का ऊर्जाक्षेत्र में निवेश पर नकारात्मक असर होगा। लेकिन अगर कर का बोझ बढ़ाए बिना उपभोक्ताओं तक मूल्य कटौती का लाभ पहुँचाया जाए; तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है।
हालात का दूसरा पहलू यह है कि कोरोना संकट से तेल के उत्पादन में कटौती के साथ ही माँग में भी कमी आ सकती है। इसका असर अमरीकी तेल उद्योग पर भी होगा जो पहले ही कर्ज़ के बोझ तले दबा हुआ है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि तेल उत्पादकों की स्थितियों में भिन्नता के कारण मूल्यों में कमी का असर सब पर एक समान नहीं होगा। तेल के मूल्य और निवेशकों की बैलेंसशीट एक दूसरे पर निर्भर हैं। ऐसे में कच्चेतेल के शेयरधारक फिलहाल बाज़ार से दूरी बनाए हुए हैं।
विश्लेषकों का अनुमान है कि तेल के दामों में 10 डॉलर की कमी से वैश्विक जी.डी.पी. में 0.3 फीसदी बदलाव होता है जिसका रुझान तेल उत्पादकों से तेल उपभोक्ता देशों की तरफ होता है। इसका सीधा असर ब्याजदरों पर देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए रूस में 10 वर्षीय बॉण्ड पर ब्याजदर महज 2.56 फीसदी रह गई है। इसी तरह, साउदी सरकार के अपै्रल 2030 में परिपक्व होने वाले बॉण्डस् की हालिया ब्याजदर 2.38 प्रतिशत है। उधर, अमेरिका में भी यही रुझान है, जहाँ ऊर्जाक्षेत्र में निवेश की ब्याजदर 2.95 प्रतिशत रह गई है। इस तरह तेलमूल्यों में कटौती का असर मुद्रा और उपभोक्ता बाज़ार; दोनों पर देखा जा सकता है।
भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। तेल के मूल्यों में कटौती पर रियाद, रूस और अमरीका के बीच छिड़ी तनातनी का उसकी वित्तीय स्थिति पर सकारात्मक असर होगा। तेल के दामों में प्रतिबैरल 20 डॉलर की कमी से उसका चालूखाता घाटा 30 बिलियन डॉलर तक कम हो जाएगा। माना जा रहा है कि तेल के दामों को लेकर जारी तनातनी ज़्यादा लम्बे वक्त तक नहीं चलेगी। ऐसे में भारत को भी मूल्य कटौती का अधिकतम लाभ उठाने की नीति अपनानी चाहिए।
ज्ञातव्य है कि रूस और साउदी अरब पिछले तकरीबन तीन सालों से तेल उत्पादन घटाकर मूल्य बढ़ाने की नीति पर चल रहे थे। इस बीच, अमरीकी शैल कम्पनियों ने तेल के दाम स्थिर रखते हुए अपना बाज़ार बढ़ाने और लाभ कमाने में सफलता हासिल की। वैश्विक भू-राजनीतिक हालातों के चलते अमरीका ने रूस के ऊर्जाक्षेत्र पर प्रतिबन्ध लगा दिए। तेल कीमतों पर छिडे़ संघर्ष के बीच रूस ने उत्पादन बढ़ाकर कीमत घटाने की नीति अपनाई है। उसके इस कदम का साउदी अरब के नेतृत्व वाले ओपेक पर नकारात्मक असर होगा।
आलेख - डॉ. लेखा एस. चक्रवर्ती, प्रॉफेसर, एन.आई.एफ.पी. और रिसर्च एसोसिएट, द लेवी इकोनॉमिक्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ बार्ड कॉलेज, न्यूयॉर्क।
अनुवाद और वाचन - डॉ. श्रुतिकान्त पाण्डेय।
Comments
Post a Comment