अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों की बढ़ती सरगर्मी।

अमरीका में नवम्बर 2020 में देश के 46वें राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया शुरु हो गई है। रिपब्लिकन पार्टी जिसे ग्रैण्ड ओल्ड पार्टी या जी.ओ.पी. के नाम से भी जाना जाता है; की तरफ से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मुख्तलिफ राज्यों के 1099 प्रमुखों का समर्थन हासिल कर लिया है। पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी प्राप्त करने के लिए उन्हें 1276 प्रतिनिधियों के अनुमोदन की ज़रूरत है। डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से फिलहाल पूर्व उपराष्ट्रपति जो बिडन और वरमाउण्ट के सीनेटर बर्नी सैण्डर्स के बीच काँटे का मुकाबला चल रहा है। सुपर ट्यूज़डे अधिवेशनों में जो बिडन को भारी समर्थन हासिल हुआ, जिससे वे अपने प्रतिद्वन्द्वी से काफी आगे निकल गए हैं। नियमों के मुताबिक, राज्यों के प्रतिनिधियों का अनुमोदन जीतने वाले प्रत्याशी को डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाएगा।

अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया के तहत, इच्छुक प्रत्याशियों को राज्यों के प्रतिनिधियों का समर्थन हासिल करना होता है। इसके लिए बाकायदा पार्टी अधिवेशनों का आयोजन होता है जिनमें राज्यों के प्रतिनिधि भाग लेते हैं। ये प्रतिनिधि वरिष्ठ सदस्य होते हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की नुमाइंदिगी करते हैं। जो प्रत्याशी अधिकांश प्रतिनिधियों का समर्थन हासिल कर लेता है, उसे पार्टी के अधिवेशन में राष्ट्रपति पद के लिए नामांकित कर दिया जाता है।

इसके बाद राष्ट्रपति चुनावों का प्रचार अभियान शुरु होगा। सभी प्रत्याशियों को देश के कोने-कोने में जाकर मतदाताओं को प्रभावित करना होता है। इसके लिए रैलियों, बहसों और भाषणों का आयोजन किया जाता है। अमरीका दुनिया का सबसे पुराना लोकतन्त्र है। यहाँ राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं; बल्कि निर्वाचक मण्डल द्वारा किया जाता है। मतदान के बाद वोटों की राज्यवार गिनती की जाती है। वाॅशिंगटन डी.सी. सहित 48 राज्यों में ‘विनर्स टेक्स आॅल’ प्रणाली अपनाई जाती है, जिसका मतलब है कि विजेता को उस राज्य की ओर से सभी मत प्राप्त होते हैं। इस मामले में माइन और नेब्रास्का अपवाद हैं क्योंकि वहाँ आनुपातिक व्यवस्था लागू है। राष्ट्रपति बनने के लिए किसी प्रत्याशी को कम से कम 270 निर्वाचकों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए।

सुपर ट्यूज़डे के बाद अधिकांश प्रत्याशियों ने नामांकन वापस ले लिया है और अब डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से सीनेटर बर्नी सैण्डर्स और पूर्व उपराष्ट्रपति जो बिडन मैदान में रह गए हैं। इनमें से जो बिडन को राष्ट्रपति पद का मज़बूत दावेदार माना जा रहा है। उन्होंने मिसोरी, मिशिगन, मिसिसिपी और इडाहो सहित सभी अहम राज्यों में हुए मतसंग्रह में बढ़त हासिल की है। फिलहाल उनके खाते में 820 प्रतिनिधियों का समर्थन है जो उनके प्रतिद्वन्द्वी बर्नी सैण्डर्स के 670 मतों के मुकाबले काफी ज़्यादा है।

चुनावपूर्व मुकाबलों के तहत फ्लोरिडा, एरिज़ोना, इलिनाय और ओहियो में मतदान हो चुका है। बर्नी सैण्डर्स के प्रभाव वाले केलिफोर्निया और नवादा में भी यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। अब जिन राज्यों में चुनावपूर्व मतदान होना है, उनमें से ज़्यादातर या तो जो बिडन के समर्थक हैं; या उनके मतों की संख्या इतनी सीमित है कि बर्नी सैण्डर्स के लिए फासले को पाटना मुश्किल होगा। विश्लेषकों का मानना है कि बर्नी के समर्थक युवा प्रगतिवादी और हिस्पैनिक प्रतिनिधियों की संख्या ज़्यादातर राज्यों में सीमित है। दूसरी तरफ, जो बिडन को व्यापक समर्थन हासिल है और वे अफ्रीकी अमरीकी समुदाय में भी खासे लोकप्रिय हैं।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दमदार प्रचार का मुकाबला करने के लिए जो बिडन पूरा ज़ोर लगा रहे हैं। पिछले दिनों, फिलाडेल्फिया में आयोजित एक रैली को सम्बोधित करते हुए उन्होंने पार्टी की एकजुटता का आह्वान किया। जो बिडन ने उम्मीद जताई कि आने वाले वक्त में बर्नी सैण्डर्स भी उनके समर्थन में आगे आएँगे। डेमोक्रेट्स की कोशिश पार्टी प्रत्याशी के चुनाव में देरी से बचना भी है। 2016 में वे इसका खामियाजा भुगत चुके हैं। अगर इस बार ऐसा हुआ तो डोनाल्ड ट्रम्प का मुकाबला कर पाना मुश्किल हो जाएगा। नवम्बर में होने वाले चुनाव अनेक मामलों में निर्णायक होंगे। इनसे एक ओर तो यह तय होगा कि डेमोक्रेट्स में प्रतिनिधिसभा में बहुमत हासिल करने का कितना सामथ्र्य है और दूसरी तरफ, इनसे राष्ट्रपति ट्रम्प की नीतियों की सार्वजनिक परीक्षा भी हो जाएगी।

अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र भारत की भी पैनी नज़र है। हालांकि दोनों मुल्कों की लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में काफी अन्तर है, लेकिन उनके बीच लोकतन्त्र, स्वतन्त्रता, समानता, न्याय और कानूनव्यवस्था के स्तरों पर अनेक समानताएँ भी हैं।

आलेख - डॉ. स्तुति बनर्जी, अमरीकी मामलों की कूटनीतिक विश्लेषक।

अनुवाद और वाचन - डॉ. श्रुतिकान्त पाण्डेय।

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