अमरीका और इरान के बीच फँसा इराक़
इराक़ लंबे समय से आंतरिक विभाजन और बाहरी हस्तक्षेप का सामना कर रहा है। 2017 में आईएसआईएस की हार से पैदा हुई आशा के बावजूद इराक़ के लोगों की समस्या का अंत नहीं हो रहा। आंतरिक भ्रष्टाचार और पूंजीवाद के घालमेल को लेकर इराक़ी लोगों की आकांक्षाओं को पूरी करने में बग़दाद की सरकार की नाकामी की वजह से ऐसा हो रहा है।
इसके अतिरिक्त राजनीतिक श्रेणी के बीच आपसी सामंजस्य के अभाव में सरकार के गठन में भी रुकावट पैदा हुई बल्कि सरकारी प्रक्रिया भी शक्तिहीन हो गई। राजनीतिक और सैन्य हस्तक्षेप, विशेष रूप से ईरान और अमरीका के द्वारा किए गए हस्तक्षेप ने आंतरिक विभाजन को और बढ़ा दिया। इसका विरोध करते हुए इराक़ी लोगों ने देश भर में प्रदर्शन और विरोध आरम्भ किए और सरकार से ज़िम्मेदार शासन, बेहतर सुविधाएं मुहैया करवाने, पूंजीवाद और भ्रष्टाचार की साठ-गाँठ और बाहरी हस्तक्षेप समाप्त करने की मांग की।
सुरक्षा बलों और कातिब हिज़बुल्लाह जैसे ईरान समर्थन वाले लड़ाकों द्वारा की गई कार्रवाई में कुछ प्रदर्शनकारियों के मारे जाने के बाद ये प्रदर्शन एक बड़े संकट में तबदील हो गए। इराक़ में अमरीकी सेना की उपस्थिति समाप्त करने की मांग करते हुए समूह ने देश के बहुत से हिस्सों में जवाबी प्रदर्शन भी किए।
दिसंबर 2019 में गुट ने अमरीकी बलों द्वारा लगातार इस्तेमाल किए जाने वाले किरकुक स्थित एक इराक़ी सैन्य अड्डे पर रॉकेट से हमले किए। इस हमले में अमरीकी सेना के लिए काम करने वाला एक इराकी अनुबंध कर्मी भी मारा गया। दो दिन बाद अमरीकी सेना की जवाबी कार्रवाई में इराक़ और सीरिया में कातिब हिज़बुल्लाह के बहुत से नेता और लड़ाके मारे गए और इराक़ में इसके कुछ हथियार केन्द्र भी नष्ट हो गए।
इससे स्थिति और ख़राब हो गई। दिसंबर 31 को पोप्युलर मोबिलाज़ेशन फ्रंट ने बगदाद में अमरीकी दूतावास के सामने प्रदर्शन का आयोजन किया जहाँ इसके कुछ सदस्यों ने दूतावास की इमारत में घुसने की कोशिश की। 2 जनवरी को अमरीका ने बग़दाद हवाई अड्डे के बाहर गुट के सदस्यों के एक समूह पर ड्रोन से हमला किया जिसमें ना सिर्फ़ कातिब हिज़बुल्लाह अबु माहदी अल-मुहांदिस मारा गया बल्कि क़ासिम सोलेमानी की भी मृत्यु हो गई जो कि क्रांतिकारी गार्ड्स ईरानी कुद्स बलों के नेता थे। इस स्थिति के बिगड़ने पर अमरीका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ने का ख़तरा पैदा हो गया और इन दोनों के बीच इराक़ भी फँस सकता था।
अमरीकी सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ इराक़ी सैन्य अड्डों पर ईरान द्वारा लगातार जवाबी हमले बढ़ाने के बाद अमरीका और ईरान ने जिस स्थिति को कुछ ठीक करने का निर्णय लिया था वो फिर से बिगड़ गई है। कातिब हिज़बुल्लाह ने अमरीका के नेतृत्व वाले गठबंधन बलों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले उत्तरी बग़दाद के सैन्य शिविर पर रॉकेट हमला किया जिसमें दो अमरीकी और एक ब्रितानी सेवाकर्मी मारे गए और कई अन्य घायल हो गए। अमरीकी सेना ने पाँच ऐसे संदिग्ध ठिकानों पर एक साथ हमला किया जो कातिब हिज़बुल्लाह के हथियार रखने के ठिकाने समझे जा रहे थे। ये हमले ईरान समर्थन वाले कातिब हिज़बुल्लाह की ताक़त कम करने के लिए किए गए ताकि ये अमरीका के नेतृत्व वाले संगठित सैन्य बलों के अड्डों और शिविरों पर और रॉकेट हमले ना कर सके।
विश्लेषकों का मानना है कि ये ईरान और इराक के भीतर मौजूद अमरीका के बीच एक लंबे परोक्ष युद्ध की शुरुआत हो सकती है। इसमें कोई शक नहीं कि अगर अमरीका और इराक़ के बीच ये लड़ाई तेज़ होती है तो इसमें इराक़ और इसके नागरिकों को ही अधिक कष्ट होगा।
भारत कह चुका है कि इराक़ में शामिल सभी पक्षों को टकराव से बचने के लिए हर हाल में शांति बनाए रखनी चाहिए। भारत में शांति, स्थिरता और इराक़ का पुनर्निर्माण सबसे बड़ी प्राथमिकता है। ऐसा ना सिर्फ़ इराक़ के साथ भारत के रिश्तों के चलते ज़रूरी है बल्कि इराक़ के लोगों के भविष्य को देखते हुए भी ये ज़रूरी है।
जनरल सोलेमानी के मारे जाने के समय ही भारत ने अमरीका द्वारा वरिष्ठ ईरानी नेता के मारे जाने पर संज्ञान लेते हुए इससे तनाव बढ़ने और स्थिति बिगड़ने के संदर्भ में चिंता व्यक्त की थी। अमरीका और ईरान के बीच तनाव के बीच इराक़ का भविष्य अनिश्चित है। ये दो विरोधियों की लड़ाई में फँस सकता है। इराक़ी नेतृत्व शांति, स्थिरता और इराक़ तथा खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को देखते हुए स्थानीय लड़ाकों को नियंत्रण में करके आग भड़काने और बाहरी ताक़तों के हाथ का मोहरा बनने से रोक सकता है।
आलेख- डॉ. मो. मुद्दसर क़मर, पश्चिम एशियाई सामरिक मामलों के विश्लेषक
अनुवाद- नीलम मलकानिया
इसके अतिरिक्त राजनीतिक श्रेणी के बीच आपसी सामंजस्य के अभाव में सरकार के गठन में भी रुकावट पैदा हुई बल्कि सरकारी प्रक्रिया भी शक्तिहीन हो गई। राजनीतिक और सैन्य हस्तक्षेप, विशेष रूप से ईरान और अमरीका के द्वारा किए गए हस्तक्षेप ने आंतरिक विभाजन को और बढ़ा दिया। इसका विरोध करते हुए इराक़ी लोगों ने देश भर में प्रदर्शन और विरोध आरम्भ किए और सरकार से ज़िम्मेदार शासन, बेहतर सुविधाएं मुहैया करवाने, पूंजीवाद और भ्रष्टाचार की साठ-गाँठ और बाहरी हस्तक्षेप समाप्त करने की मांग की।
सुरक्षा बलों और कातिब हिज़बुल्लाह जैसे ईरान समर्थन वाले लड़ाकों द्वारा की गई कार्रवाई में कुछ प्रदर्शनकारियों के मारे जाने के बाद ये प्रदर्शन एक बड़े संकट में तबदील हो गए। इराक़ में अमरीकी सेना की उपस्थिति समाप्त करने की मांग करते हुए समूह ने देश के बहुत से हिस्सों में जवाबी प्रदर्शन भी किए।
दिसंबर 2019 में गुट ने अमरीकी बलों द्वारा लगातार इस्तेमाल किए जाने वाले किरकुक स्थित एक इराक़ी सैन्य अड्डे पर रॉकेट से हमले किए। इस हमले में अमरीकी सेना के लिए काम करने वाला एक इराकी अनुबंध कर्मी भी मारा गया। दो दिन बाद अमरीकी सेना की जवाबी कार्रवाई में इराक़ और सीरिया में कातिब हिज़बुल्लाह के बहुत से नेता और लड़ाके मारे गए और इराक़ में इसके कुछ हथियार केन्द्र भी नष्ट हो गए।
इससे स्थिति और ख़राब हो गई। दिसंबर 31 को पोप्युलर मोबिलाज़ेशन फ्रंट ने बगदाद में अमरीकी दूतावास के सामने प्रदर्शन का आयोजन किया जहाँ इसके कुछ सदस्यों ने दूतावास की इमारत में घुसने की कोशिश की। 2 जनवरी को अमरीका ने बग़दाद हवाई अड्डे के बाहर गुट के सदस्यों के एक समूह पर ड्रोन से हमला किया जिसमें ना सिर्फ़ कातिब हिज़बुल्लाह अबु माहदी अल-मुहांदिस मारा गया बल्कि क़ासिम सोलेमानी की भी मृत्यु हो गई जो कि क्रांतिकारी गार्ड्स ईरानी कुद्स बलों के नेता थे। इस स्थिति के बिगड़ने पर अमरीका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ने का ख़तरा पैदा हो गया और इन दोनों के बीच इराक़ भी फँस सकता था।
अमरीकी सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कुछ इराक़ी सैन्य अड्डों पर ईरान द्वारा लगातार जवाबी हमले बढ़ाने के बाद अमरीका और ईरान ने जिस स्थिति को कुछ ठीक करने का निर्णय लिया था वो फिर से बिगड़ गई है। कातिब हिज़बुल्लाह ने अमरीका के नेतृत्व वाले गठबंधन बलों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले उत्तरी बग़दाद के सैन्य शिविर पर रॉकेट हमला किया जिसमें दो अमरीकी और एक ब्रितानी सेवाकर्मी मारे गए और कई अन्य घायल हो गए। अमरीकी सेना ने पाँच ऐसे संदिग्ध ठिकानों पर एक साथ हमला किया जो कातिब हिज़बुल्लाह के हथियार रखने के ठिकाने समझे जा रहे थे। ये हमले ईरान समर्थन वाले कातिब हिज़बुल्लाह की ताक़त कम करने के लिए किए गए ताकि ये अमरीका के नेतृत्व वाले संगठित सैन्य बलों के अड्डों और शिविरों पर और रॉकेट हमले ना कर सके।
विश्लेषकों का मानना है कि ये ईरान और इराक के भीतर मौजूद अमरीका के बीच एक लंबे परोक्ष युद्ध की शुरुआत हो सकती है। इसमें कोई शक नहीं कि अगर अमरीका और इराक़ के बीच ये लड़ाई तेज़ होती है तो इसमें इराक़ और इसके नागरिकों को ही अधिक कष्ट होगा।
भारत कह चुका है कि इराक़ में शामिल सभी पक्षों को टकराव से बचने के लिए हर हाल में शांति बनाए रखनी चाहिए। भारत में शांति, स्थिरता और इराक़ का पुनर्निर्माण सबसे बड़ी प्राथमिकता है। ऐसा ना सिर्फ़ इराक़ के साथ भारत के रिश्तों के चलते ज़रूरी है बल्कि इराक़ के लोगों के भविष्य को देखते हुए भी ये ज़रूरी है।
जनरल सोलेमानी के मारे जाने के समय ही भारत ने अमरीका द्वारा वरिष्ठ ईरानी नेता के मारे जाने पर संज्ञान लेते हुए इससे तनाव बढ़ने और स्थिति बिगड़ने के संदर्भ में चिंता व्यक्त की थी। अमरीका और ईरान के बीच तनाव के बीच इराक़ का भविष्य अनिश्चित है। ये दो विरोधियों की लड़ाई में फँस सकता है। इराक़ी नेतृत्व शांति, स्थिरता और इराक़ तथा खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा को देखते हुए स्थानीय लड़ाकों को नियंत्रण में करके आग भड़काने और बाहरी ताक़तों के हाथ का मोहरा बनने से रोक सकता है।
आलेख- डॉ. मो. मुद्दसर क़मर, पश्चिम एशियाई सामरिक मामलों के विश्लेषक
अनुवाद- नीलम मलकानिया
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