कोविड-19 वैक्सीन की दौड़ में: भारतीय वृत्तान्त

चीनी शहर वुहान से अचानक कोरोनावायरस के उभार के कारण विश्व इससे उबरने की कठिन स्थिति में घिर गया| पहले तो विश्व इसके फैलाव, इसके लक्षण से निपटने में परेशान रहा, कि क्या यह वायरस संक्रामक है या ग़ैर-संक्रामक? दूसरे और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इसके लिए कोई तात्कालिक एंटीजेन है?

भारत एकाग्रचित्त होकर लगभग मध्य-जनवरी में अपने नागरिकों को संक्रमण से बचाने के लिए चीन के लिए एक यात्रा परामर्श जारी किया| विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू॰एच॰ओ॰) ने व्यापक तकनीकी दिशा-निर्देश जारी किए तथा उस समय वायरस पर मिली जानकारी के अनुसार, सभी देशों को संभावित मामलों का पता लगाने,परीक्षण करने तथा इसका प्रबंधन करने की सलाह दी| इस सलाह के बाद, चीन तथा हाँग काँग से आनेवाले यात्रियों की थर्मल स्क्रीनिंग की शुरुआत हुई|

इस वायरस का और अधिक देशों में फैलने के साथ, डब्ल्यू॰एच॰ओ॰ ने इसे एक वैश्विक महामारी घोषित कर दिया और कहा कि इससे बचाव के अलावा फिलहाल इसका कोई उपचार उपलब्ध नहीं है| भारतीय प्रयोगशालाएं कोविड-19 के लिए एक प्रभावशाली वैक्सीन तलाशने संबंधी वैश्विक प्रयास में शामिल हुईं|

कोविड-19 का बोझ घुमावदार होने के साथ, भारत ने देश तथा विदेश और औषधि ट्रायल में वैक्सीन के विकास के क्षेत्र में हुई प्रगति की निगरानी करने संबंधी आदेश के साथ सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार, प्रोफ़ेसर के॰ विजय राघवन तथा नीति आयोग के स्वास्थ्य सदस्य, डॉ॰ विनोद के॰ पॉल के नेतृत्व में एक अंतर-अनुशासनात्मक कार्य बल का गठन किया|

इस कार्य बल में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आई॰सी॰एम॰आर॰), विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी विभाग, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सी॰एस॰आई॰आर॰), जैव प्रौद्योगिकी विभाग, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन, स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक तथा भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल के विशेषज्ञ भी शामिल हैं|

एक प्रभावशाली औषधि के विकास में भारत का दृष्टिकोण तीन चरणों पर आधारित है| सबसे पहले, मौजूदा दवाओं की रिपोज़िशनिंग करना, नए प्रत्याशी दवाओं तथा अणुओं का विकास करना और तीसरे चरण में सामान्य वायरस-रोधी लक्षणों के लिए पौधों के अर्क तथा उत्पाद का प्रयोग करना शामिल है|

कोविड-19 के लिए एक प्रभावशाली वैक्सीन की खोज एक स्तर पर अभूतपूर्व रही, जिसका उदाहरण मानवजाति के इतिहास में पहले कभी नहीं मिलता है| डब्ल्यू॰एच॰ओ॰ के अनुसार, लगभग 160 वैक्सीन विकास के विभिन्न चरणों में हैं|

भारत में इस लड़ाई में सबसे पहले छलांग लगाई थी, फ़ार्मा की मुख्य कंपनी, ज़ाइडस कैडिला ने, जिसने पुनःसंयोजक डी॰एन॰ए॰ तकनीक तथा विपरीत अनुवांशिक तकनीक का प्रयोग करके मार्च महीने में प्री-क्लीनिकल पशु ट्रायल की शुरुआत की थी| अब ज़ाइडस समेत सात भारतीय फ़ार्मा कंपनियाँ वैक्सीन विकास के विभिन्न चरणों में काम कर रहीं हैं|

दूसरे प्रत्याशी के रूप में, “कोवैक्सीन” का मानव पर ट्रायल के लिए भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने अनुमोदित किया है, जिसे आई॰सी॰एम॰आर॰ तथा हैदराबाद आधारित भारत बायोटेक के अंतर्गत साझा रूप से विकसित किया गया है| कोवैक्सीन के लिए ट्रायल की शुरुआत अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली तथा स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, रोहतक समेत 12 स्वास्थ्य सुविधाओं में हो चुकी है|

इसी दौरान, विश्व के सबसे बड़े वैक्सीन विनिर्माता, पुणे के सीरम संस्थान ने ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय तथा एस्ट्राज़ेनेका द्वारा विकसित “कोविशील्ड” नामक एक वैक्सीन के उत्पादन के लिए ब्रिटिश-स्वीडिश फ़ार्मा कंपनी एस्ट्राज़ेनेका के साथ हाथ मिलाया है| वर्तमान में ब्राज़ील में यह वैक्सीन तीसरे चरण के मानव ट्रायल से गुज़र रही है|

कंपनी का कहना है कि एक बार नियामक अनुमोदन प्राप्त हो जाने से, सीरम संस्थान 3 से 4 करोड़ खुराक का उत्पादन करेगा| अपनी विनिर्माण क्षमता में हर महीने उत्पादन को 100 करोड़ तक बढ़ाने की इसकी दावेदारी है|

कोविशील्ड के विकास में सम्मिलित ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस वैक्सीन के आशाजनक परिणाम सामने आए हैं और यह सुरक्षित जान पड़ती है तथा शरीर के साथ एक सशक्त प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को प्रेरित कर रही है|

कोविड-19 के विरुद्ध एक प्रभावशाली वैक्सीन विकसित करने के लिए विश्वभर में अभूतपूर्व दौड़ चल रही है| पर विश्व भर में इस बीमारी ने 1॰5 करोड़ लोगों को पहले ही संक्रमित कर दिया है तथा इस कारण 6॰32 लाख रोगियों की जान जा चुकी है|

दो प्रमुख ड्रग प्रत्याशियों के अलावा, सी॰एस॰आई॰आर॰ समेत कोविड-19 के विरुद्ध एक प्रभावशाली ड्रग विकसित करने के लिए कई अन्य प्रयोगशालाएँ भी प्रयासरत हैं|औषधि की भारतीय परंपरागत प्रणाली के अंतर्गत इसमें कुछ प्रयोगशालाएँ भी शामिल हैं|

अंतर-अनुशासनत्मक अनुसंधान तथा विकास कार्य बल के प्रमुख, डॉ॰ भूषण पटवर्धन ने कहा कि आयुष मंत्रालय के अंतर्गत कुछ प्रयोगशालाएँ मानक देख-रेख के लिए एक सहायक उपचार के रूप में रोगनिरोधी ट्रायल तथा बेतरतीब नियंत्रण ट्रायल की शुरुआत करेगी| उन्होंने कहा कि दिल्ली के 80,000 पुलिस कर्मियों को भी रोगनिरोधी ट्रायल में शामिल किया गया है|

इसके अलावा, प्रक्रियात्मक विलंब पर क़ाबू पाने के लिए प्रत्येक चरण पर विभिन्न कार्यबल के साथ प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी स्वयं कोविड-19 के प्रभावशाली उपचार के विकास की निगरानी कर रहे हैं| अगर वर्तमान के मानव ट्रायल में सफलता मिलती है, तो इस वर्ष के अंत तक भारत इस अभूतपूर्व वैश्विक महामारी से जीवन की रक्षा करनेवाली एक वैक्सीन के आने की आशा कर सकता है|





आलेख – एन॰ भद्रन नायर, कार्यकारी संपादक, भारतीय विज्ञान जर्नल 

अनुवाद – मनोज कुमार चौधरी

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