अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव 2020
कोरोना महामारी ने जीवन, सामाजिक संबंध और विश्व भर में 200 से ज़्यादा देशों में रहने वाले करोड़ो लोगों की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव डाला है। इतना ही नहीं, इसकी वजह से लोकतांत्रिक देशों में राजनीति और राजनीतिक प्रक्रियाओं पर भी असर पड़ा है। ग़ौरतलब है कि इन देशों में समय-समय पर होने वाले चुनाव शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ये उल्लेखनीय है कि दुनिया का सर्वाधिक शक्तिशाली लचीला और धनी लोकतंत्र, अमरीका भी राजनीतिक प्रक्रिया समेत कई तरह से इस महामारी से प्रभावित हुआ है।
हर चौथे साल अमरीकी नागरिक नए राष्ट्रपति के लिए मतदान करते हैं। कभी-कभी वे सत्तासीन राष्ट्रपति को ही अन्य चार वर्षों के लिए फिर चुन लेते हैं। वर्तमान समय में बड़ा सवाल ये है कि क्या अमरीका का राष्ट्रपति चुनाव शांति से हो पाएगा या नहीं और क्या पदधारी राष्ट्रपति डोनल्ड फिर से चुने जा सकेंगे अथवा नहीं।
तीन नवंबर 2020 को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की राजनीतिक प्रक्रिया सहज नहीं है। कोविड-19 से जुड़ा लॉकडाउन; उसके बाद होने वाले अनलॉकडाउन, जनता में संक्रमण फैलने का डर, जन सभाएँ करवाने में होने वाली परेशानियाँ आदि से प्राथमिक चुनाव और अमरीकी राजनीतिक दलों के सदस्यों की बैठकें प्रभावित हुई हैं जो कि राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारों के नामांकन का ज़रूरी हिस्सा है।
उम्मीदवार चुनने के लिए डेमोक्रेटिक दल और रिपब्लिकन दल के राष्ट्रीय सम्मेलन बहुत ही धूमधामपूर्ण और आडंबरपूर्ण होते हैं। रिपब्लिकन दल के पास खोने को ज़्यादा कुछ नहीं है क्योंकि स्वाभाविक रूप से राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ही उम्मीदवार होंगे लेकिन फिर भी इस अवसर पर प्रचार भाषण का मौक़ा मिलता है जिसे लाखों अमरीकी मतदाता तो देखते ही हैं साथ ही विश्व में अन्य लोग भी देखते हैं।
डेमोक्रेटिक राष्ट्रीय सम्मेलन हाल ही में इंटरनेट माध्यम से सम्पन्न हुआ है जिसमें जो बाइडन को राष्ट्रपति पद के लिए नामांकित करने की औपचारिकताएँ की गईं।
मिलवौकी, विस्कॉन्सिन में हज़ारों विशिष्ट जन एकत्रित होते लेकिन चार वर्षों में एक बार होने वाले आयोजन में इस बार ऐसा नहीं हो पाया। सीनेटर जो बाइडन को दल की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए और सीनेटर कमला हैरिस को उप राष्ट्रपति पद के लिए नामांकित किया गया।
अमरीका कोविड-19 से विश्व में सबसे अधिक प्रभावित होने वाला देश है। सरकार द्वारा इस महामारी से निपटने के तरीक़ों और उन के बाद अमरीकी समाज के ध्रुवीकरण से बहुत से अमरीकी नागरिक आहत हुए। ये अहम बात है कि अमरीका की बेरोज़गारी दर काफ़ी अधिक है और आर्थिक वृद्धि दर नकारात्मक हो गई है। कोरोना विषाणु संकट के दौरान देश की स्वास्थ्य सेवाएँ भी अपर्याप्त रहीं। जब विषाणु का सामना करने में विशेषज्ञों ने परामर्श दिए उस समय प्रशासन भी कमज़ोर स्थिति में नज़र आया क्योंकि बहुत से परामर्श बड़े सरकारी पदाधिकारियों द्वारा ख़ारिज कर दिए गए। देश में हर जगह जातिवाद फैल चुका है। इस से मौजूदा अमरीकी प्रशासन की चिंताएँ और बढ़ गई हैं।
पर्यावरण मुद्दे, अर्थव्यवस्था आप्रवासन नीति और महामारी, इन सभी विषयों को अमरीकी विपक्ष ने अपने मुद्दे बनाया। सांसद जो बाइडन इस समय चार प्रतिशत अंकों से जनमत सर्वेक्षण में आगे चल रहे हैं। अमरीका के राष्ट्रपति चुनावों के समय हर चौथे वर्ष भारतीय इस सन्दर्भ में बहस करते हैं कि भारत के लिए कौन से राष्ट्रपति अच्छे रहेंगे। ऐसा होना स्वाभाविक है लेकिन डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन प्रशासन के साथ भारत के संबंधों की समीक्षा से पता चलता है कि अमरीका के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों में भारत को लेकर वैचारिक कठोरता नहीं है।
सांसद कमला हैरिस राष्ट्रपति पद की दौड़ में उम्मीदवारी के लिए नामांकित होने वाली भारतीय मूल की पहली व्यक्ति बन गई हैं। इस वजह से आगामी अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों में भारत की रुचि बढ़ना स्वाभाविक है।
भारत के साथ मज़बूत सामाजिक साझेदारी बनाए रखने के लिए अमरीकी नीतियों के प्रति दोनों दलों के समर्थन में वृद्धि हुई है। अगर जनवरी 2021 में व्हाईट हाउस में नेतृत्व बदलता है तब भी भारत अमरीका के संबंधों की मूल रूपरेखा में कोई वास्तविक बदलाव नहीं आएगा।
चुनावी बहसों से इस समय जो बाइडन और डोनल्ड ट्रम्प दोनों ही चीन के प्रति ख़ुद को अधिक सख़्त दिखाने में लगे हैं। दोनों उम्मीदवारों ने बार-बार ये बताया है कि वे किस प्रकार हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए मज़बूत भारत के साथ अमरीका का सहयोग बढ़ाएँगे।
आलेख – प्रो. चिंतामणि महापात्रा (जेएनयू से वीसी)
अनुवादक – नीलम मलकानिया
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