अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया एक क्षेत्रीय शक्ति का खेल ना बने
अफ़ग़ान तालिबान तथा अमरीकी सरकार के बीच शांति वार्ता की शुरुआत होने की आशाएँ अब उज्ज्वल दिख रही हैं| 7 अगस्त से 9 अगस्त तक काबुल में तीन दिवसीय ग्रैंड एसेम्बली (लोया जिरगा) की हुई बैठक में बचे हुए 400 तालिबान क़ैदियों को हिरासत से रिहा करने के निर्णय लिए जाने के साथ यह स्पष्ट हुआ| ग्रैंड एसेम्बली ने तालिबन को इस आशा में रियायत दी है कि इससे वार्ता का मार्ग प्रशस्त होगा तथा आशा है यहाँ शांति बहाल होगी|
गत फ़रवरी में दोहा में तालिबान तथा अमरीका के बीच हस्ताक्षरित इस पहल को शांति समझौते के रूप में देखा जाना चाहिए| शांति वार्ता शुरू करने की एक पूर्व शर्त के रूप में इस समझौते के अंतर्गत तालिबान क़ैदियों को रिहा किया गया है| इसके अनुसार, गत छह महीनों के दौरान अफ़ग़ान सरकार ने पाँच हज़ार तालिबानी क़ैदियों को रिहा किया है| इसके बाद सिर्फ़ चार सौ क़ैदी बच गए थे| ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि, इन क़ैदियों द्वारा गंभीर प्रकृति के अपराध किए जाने की कारण राष्ट्रपति, अशरफ़ ग़नी इनके मुक़दमे पर बल दे रहे थे| लेकिन यहाँ भी तालिबान का अपना उपाय था|
इस प्रकार, शांति वार्ता करवाने का रास्ता साफ़ होने के बाद भी, अफ़ग़ानिस्तान में स्थायी शांति अभी भी एक दूर की आशा हो सकती है| इसके कई कारणों में विभिन्न धाराओं के आतंकी समूहों की निरंतर भूमिका एक मुख्य कारण है और इनमें से अधिकतर पाकिस्तान के बाहर से अपने मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं|
पाकिस्तान-आधारित अधिकतर आतंकी समूह इस्लामाबाद की गंदी चालवाले विभाग के छद्म के रूप में भी काम कर रहे हैं तथा ये समूह पड़ोसी देशों में प्रायः आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं| भारत को भी इन समूहों के कारण होनेवाले विध्वंस का प्रत्यक्ष अनुभव है| अफ़ग़ानिस्तान में अभी भी ये समूह चल रही वास्तविकता का एक हिस्सा बने हुए हैं|
इस क्षेत्र के देश विशेषकर, अफ़ग़ानिस्तान में इन आतंकी समूहों की अस्थिर करने की क्षमता जीवन की एक सच्चाई है, जिसकी यह अनदेखी नहीं कर सकता है| अफ़ग़ान विदेश मंत्री, मोहम्मद हनीफ़ अटमर जब एक तरफ़ पाकिस्तान आधारित आतंकी समूहों तथा दूसरी तरफ़ अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट के बीच के “सहजीवी” सम्बन्धों को लेकर बोल रहे थे, तो वे बहुत अधिक मुखर नहीं हो सके|
श्री अटमर ने कहा कि “अफ़ग़ानिस्तान में हम केवल तालिबान से नहीं लड़ रहे हैं| यहाँ चार अंतर्राष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क सक्रिय हैं|” उनके अनुसार, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ उज़्बेकिस्तान तथा ईस्ट तुर्कमेनिस्तान इस्लामिक मूवमेंट जैसे क्षेत्रीय आतंकी नेटवर्कों के बाद यहाँ स्थानीय आतंकी समूह हैं| आतंकियों की तीसरी श्रेणी लश्कर-ए-तैयबा तथा जैश-ए-मोहम्मद जैसे पाकिस्तानी आतंकी समूहों की है| और अंत में, अल-क़ायदा तथा दायेश जैसे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी समूह आते हैं| इस प्रकार, अफ़ग़ानिस्तान में शांति स्थापित करने की चुनौतियाँ भयावह दिखती हैं| अफ़ग़ान विदेश मंत्री बहुत अधिक विस्तार से नहीं बता पाये|
इस क्षेत्र से अमरीकी प्रस्थान से उत्पन्न हुई शून्यता को भरने के लिए पाकिस्तान-चीन की धुरी का बढ़ता प्रयास अत्यधिक सुस्पष्ट हो रहा है| चीनी आगे बढ़ते हुए अफ़ग़ानिस्तान और इसके परे तक भी जा रहे हैं| पेईचिंग की नज़र पड़ोसी ईरान के खनिज तथा तेल संसाधनों पर भी रही है| चीन ने ईरान में इसकी बी॰आर॰आई॰ तथा अन्य परियोजनाओं में 400 बिलियन अमरीकी डॉलर के निवेश करने की इच्छा दिखाई है| अफ़ग़ानिस्तान को चेकर्स के इस खेल में सिर्फ़ एक ब्लॉक के रूप में देखा जा सकता है|
हाल ही में पाकिस्तान तथा चीन के बीच हुए खुफ़िया सूचनाओं को साझा करने के समझौते को भविष्य में घटनेवाली एक अन्य घटना के संकेत के रूप में देखा जा सकता है| यह कुछ इस तरह का है, जिसे क्षेत्र के अन्य देशों से साझा नहीं किया जाना चाहिए|
भारत अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में जुड़ा रहा है| भारत ने इस देश में अस्पताल, स्कूल, संसद परिसर तथा सलमा डैम बनाने में सहायता की है| इस संकटग्रस्त देश में बुनियादी मूलभूत संरचना प्रदान करते हुए, भारत इन कार्यों से कई वर्षों से जुड़ा हुआ है| नई दिल्ली ने अफ़ग़ानिस्तान में 2 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया है, इससे विश्व समुदाय का ध्यान इस ओर अवश्य गया होगा|
वर्तमान में, अफ़ग़ान जनसंख्या का लगभग एक-तिहाई हिस्सा कोरोनवायरस से संक्रमित है| लेकिन, इससे बाहरी दुनिया बहुत अधिक चिंतित नहीं लग रही है, विशेषकर, क्षेत्रीय पड़ोसी जो इस देश में अपने पैर जमाने की फ़िराक़ में लगे प्रतीत हो रहे हैं| अब समय आ गया है, जब लंबे समय से कष्ट झेल रहे अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की व्यथा को सुना जाना चाहिए| वे इसके हक़दार हैं|
आलेख – एम॰के॰ टिक्कु, राजनीतिक टिप्पणीकार
अनुवाद – मनोज कुमार चौधरी
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