अरब जगत के साथ पाकिस्तान के सम्बन्धों में तनाव
भारत द्वारा अनुच्छेद 370 हटाये जाने की पहली वर्षगांठ पर, फ़रवरी 2020 की शुरुआत में कश्मीर पर इस्लामिक सहयोग संगठन परिषद (ओ॰आई॰सी॰) के विदेश मंत्रियों (सी॰एफ़॰एम॰) की एक बैठक ‘आयोजित’ करने में सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान की मदद नहीं करने संबंधी मुद्दे को पाकिस्तान के विदेश मंत्री, शाह मेहमूद क़ुरेशी ने टी॰वी॰ के एक साक्षात्कार में उठाया|
क़ुरेशी ने टी॰वी॰ चैनल को दिये अपने साक्षात्कार में कहा कि जब ओ॰आई॰सी॰ कश्मीर पर सी॰एफ़॰एम॰ की बैठक आयोजित नहीं करेगी, तो “पाकिस्तान कश्मीर तथा दमित कश्मीरी मुस्लिमों के समर्थन के मुद्दे पर इसके विचारों का समर्थन करनेवाले इस्लामिक देशों के साथ एक बैठक आयोजित करने को बाध्य होगा|”
उन्होंने कहा कि “पाकिस्तानी मक्का और मदीना के लिए अपने जीवन का बलिदान देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, ऐसे में सऊदी अरब को कश्मीर मुद्दे पर एक अग्रणी भूमिका निभाने की आवश्यकता है, यह कहते हुए उन्हें सीमाओं का ख़्याल भी नहीं रहा और वे भावनाओं में बह गए| अगर वह इस भूमिका को निभाने में इच्छुक नहीं है, फिर मैं प्रधानमंत्री, इमरान ख़ान को या तो सऊदी अरब के साथ में या फिर उसके बिना ही आगे बढ़ने को कहूँगा|”
क़ुरेशी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सऊदी अरब ही एकमात्र देश नहीं है| उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन नहीं करने के लिए संयुक्त अरब अमारात (यू॰ए॰ई॰) को लेकर भी व्याकुलता दिखाई|
पाकिस्तान का निराशा का भाव महत्वपूर्ण है| गत वर्ष, इस्लामिक देशों के कुआला लम्पुर शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान ने भागीदारी नहीं की थी| जबकि, इस सम्मेलन में अन्य देशों के साथ क़तर के शासक, तुर्की के राष्ट्रपति, एर्दोआन तथा ईरान के राष्ट्रपति, हसन रूहानी ने भागीदारी की थी|
ऐसा पाकिस्तान ने सऊदी अरब के दबाव में किया था| इस बात पर ध्यान देनेवाला तुर्की पहला देश था| तुर्की की आधिकारिक मीडिया ने कहा कि सऊदी अरब ने 4 मिलियन पाकिस्तान श्रमिकों को वापस भेजने के लिए पाकिस्तान को धमकी दी है तथा बांग्लादेशियों के साथ उन्हें बदलने को कहा है| बहरहाल, आधिकारिक रूप से पाकिस्तान ने कहा है कि “उम्माह में संभावित विभाजन के मामले में बड़े मुस्लिम देशों की चिंताओं” को संबोधित करने में यह समय लेगा और यह “उम्माह की एकता” के लिए काम करना जारी रखेगा|
कभी ख़ुद को “एकता” क़ायम रखनेवाले के रूप में दावेदारी करनेवाले के लिए यह एक विडम्बना है कि पाकिस्तान अब कश्मीर मुद्दे पर उम्माह के विभाजन करने की धमकी दे रहा है! यह इस्लामाबाद की ओर से अपने एजेंडे के लिए महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समर्थन ना जुटा पाने पर आशाहीनता तथा निराशा का भाव दिखा रहा है| मई 2020 के बाद देर से भुगतान करने पर तेल की आपूर्ति को चुपचाप रोक देने संबंधी सऊदी अरब के निर्णय ने शायद पाकिस्तान को और सताया है|
2018 में सऊदी अरब पाकिस्तान के बचाव में आया था, जब यह भुगतान संकट के संतुलन को नियंत्रित करने के लिए पाकिस्तान को मदद देने के प्रति इसके 6॰2 बिलियन डॉलर के हिस्से के रूप में प्रति वर्ष विलंबित भुगतान पर 3॰2 बिलियन डॉलर के मूल्य के तेल देने पर सहमत हुआ था| 3 बिलियन डॉलर की संतुलन धनराशि नक़द-ऋण के रूप में दी गई थी| 01 जुलाई, 2019 को सऊदी ने तीन वर्षों के लिए विलंबित भुगतान सुविधा को सक्रिय किया था तथा मई महीने में हस्ताक्षरित समझौते को इस वर्ष नवीकरण के लिए आगे बढ़ाया गया था| बहरहाल, ऐसा लगता है कि सऊदी पाकिस्तान के व्यवहार से नाराज़ है, संभवतः इसी कारण इस व्यवस्था को रोक दिया हो| तुर्की, मलेशिया तथा ईरान की ओर पाकिस्तान का झुकाव तथा चीन पर इसकी बढ़ती आर्थिक तथा रणनीतिक निर्भरता भी सऊदी को परेशान कर सकती है|
सऊदी के प्रतिशोध के बाद क़ुरेशी की धमकी आई है| ख़बर है कि पाकिस्तान को ऋण चुकाने के लिए कहा गया था तथा ख़बरों के अनुसार, कम ब्याज दर पर चीन से कर्ज़ लेकर पाकिस्तान ने पहले ही 1 बिलियन डॉलर अदा कर दिया है| ख़बरों के अनुसार, पाकिस्तान ऋण पर 3॰2 प्रतिशत ब्याज का भुगतान कर रहा था तथा अब इसने लंदन इंटरबैंक ऑफ़र्ड रेट (एल॰आई॰बी॰ओ॰आर॰) में 1 प्रतिशत से कुछ अधिक यानि लगभग 1॰18 प्रतिशत के वर्तमान दर पर चीन राज्य प्रशासन विदेशी विनिमय (एस॰ए॰एफ़॰ई॰) से 1 बिलियन डॉलर के ऋण की व्यवस्था की है| पाकिस्तान को सऊदी अरब के शेष 2 बिलियन डॉलर के ऋण का भुगतान करने के लिए इसी प्रकार के आसान ऋण की व्यवस्था करनी पड़ सकती है|
पाकिस्तान के अन्य दानकर्ता, यू॰ए॰ई॰ भी पाकिस्तान को वित्तीय रूप से मदद करने के अपने वादे से मुकर चुका है| दिसंबर 2018 में, सऊदी अरब से इशारा लेकर, इसने पाकिस्तान के लिए 6॰2 बिलियन डॉलर के एक पैकेज की घोषणा की थी, जिसमें 3॰2 बिलियन डॉलर की तेल की सुविधा शामिल है| बहरहाल, बाद में इसने अपनी वित्तीय सहायता को 2 बिलियन डॉलर तक कम कर दिया तथा विलंबित भुगतान योजना को छोड़ दिया|
अरब देशों के साथ पाकिस्तान का मोहभंग हो चुका है, क्योंकि पाकिस्तानी मीडिया के टीकाकार पाकिस्तान को समर्थन देने के लिए इस्लामिक देशों के नेताओं को प्रेरित कर रहे हैं| इसे देखा जाना है कि क्या अरब जगत से पाकिस्तान को मिलनेवाला समर्थन कम हो चुका है| इसके बावजूद, आनेवाले दिनों में सऊदी के सहारे का समाप्त होना पाकिस्तान की राजकोषीय चिंताओं में निश्चित रूप से बढ़ोतरी कर सकता है|
आलेख – डॉ॰ अशोक बेहूरिया, वरिष्ठ फैलो और समन्वयक, दक्षिण एशिया केंद्र एम॰पी॰-आई॰डी॰एस॰ए॰
अनुवाद – मनोज कुमार चौधरी
क़ुरेशी ने टी॰वी॰ चैनल को दिये अपने साक्षात्कार में कहा कि जब ओ॰आई॰सी॰ कश्मीर पर सी॰एफ़॰एम॰ की बैठक आयोजित नहीं करेगी, तो “पाकिस्तान कश्मीर तथा दमित कश्मीरी मुस्लिमों के समर्थन के मुद्दे पर इसके विचारों का समर्थन करनेवाले इस्लामिक देशों के साथ एक बैठक आयोजित करने को बाध्य होगा|”
उन्होंने कहा कि “पाकिस्तानी मक्का और मदीना के लिए अपने जीवन का बलिदान देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, ऐसे में सऊदी अरब को कश्मीर मुद्दे पर एक अग्रणी भूमिका निभाने की आवश्यकता है, यह कहते हुए उन्हें सीमाओं का ख़्याल भी नहीं रहा और वे भावनाओं में बह गए| अगर वह इस भूमिका को निभाने में इच्छुक नहीं है, फिर मैं प्रधानमंत्री, इमरान ख़ान को या तो सऊदी अरब के साथ में या फिर उसके बिना ही आगे बढ़ने को कहूँगा|”
क़ुरेशी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सऊदी अरब ही एकमात्र देश नहीं है| उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन नहीं करने के लिए संयुक्त अरब अमारात (यू॰ए॰ई॰) को लेकर भी व्याकुलता दिखाई|
पाकिस्तान का निराशा का भाव महत्वपूर्ण है| गत वर्ष, इस्लामिक देशों के कुआला लम्पुर शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान ने भागीदारी नहीं की थी| जबकि, इस सम्मेलन में अन्य देशों के साथ क़तर के शासक, तुर्की के राष्ट्रपति, एर्दोआन तथा ईरान के राष्ट्रपति, हसन रूहानी ने भागीदारी की थी|
ऐसा पाकिस्तान ने सऊदी अरब के दबाव में किया था| इस बात पर ध्यान देनेवाला तुर्की पहला देश था| तुर्की की आधिकारिक मीडिया ने कहा कि सऊदी अरब ने 4 मिलियन पाकिस्तान श्रमिकों को वापस भेजने के लिए पाकिस्तान को धमकी दी है तथा बांग्लादेशियों के साथ उन्हें बदलने को कहा है| बहरहाल, आधिकारिक रूप से पाकिस्तान ने कहा है कि “उम्माह में संभावित विभाजन के मामले में बड़े मुस्लिम देशों की चिंताओं” को संबोधित करने में यह समय लेगा और यह “उम्माह की एकता” के लिए काम करना जारी रखेगा|
कभी ख़ुद को “एकता” क़ायम रखनेवाले के रूप में दावेदारी करनेवाले के लिए यह एक विडम्बना है कि पाकिस्तान अब कश्मीर मुद्दे पर उम्माह के विभाजन करने की धमकी दे रहा है! यह इस्लामाबाद की ओर से अपने एजेंडे के लिए महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समर्थन ना जुटा पाने पर आशाहीनता तथा निराशा का भाव दिखा रहा है| मई 2020 के बाद देर से भुगतान करने पर तेल की आपूर्ति को चुपचाप रोक देने संबंधी सऊदी अरब के निर्णय ने शायद पाकिस्तान को और सताया है|
2018 में सऊदी अरब पाकिस्तान के बचाव में आया था, जब यह भुगतान संकट के संतुलन को नियंत्रित करने के लिए पाकिस्तान को मदद देने के प्रति इसके 6॰2 बिलियन डॉलर के हिस्से के रूप में प्रति वर्ष विलंबित भुगतान पर 3॰2 बिलियन डॉलर के मूल्य के तेल देने पर सहमत हुआ था| 3 बिलियन डॉलर की संतुलन धनराशि नक़द-ऋण के रूप में दी गई थी| 01 जुलाई, 2019 को सऊदी ने तीन वर्षों के लिए विलंबित भुगतान सुविधा को सक्रिय किया था तथा मई महीने में हस्ताक्षरित समझौते को इस वर्ष नवीकरण के लिए आगे बढ़ाया गया था| बहरहाल, ऐसा लगता है कि सऊदी पाकिस्तान के व्यवहार से नाराज़ है, संभवतः इसी कारण इस व्यवस्था को रोक दिया हो| तुर्की, मलेशिया तथा ईरान की ओर पाकिस्तान का झुकाव तथा चीन पर इसकी बढ़ती आर्थिक तथा रणनीतिक निर्भरता भी सऊदी को परेशान कर सकती है|
सऊदी के प्रतिशोध के बाद क़ुरेशी की धमकी आई है| ख़बर है कि पाकिस्तान को ऋण चुकाने के लिए कहा गया था तथा ख़बरों के अनुसार, कम ब्याज दर पर चीन से कर्ज़ लेकर पाकिस्तान ने पहले ही 1 बिलियन डॉलर अदा कर दिया है| ख़बरों के अनुसार, पाकिस्तान ऋण पर 3॰2 प्रतिशत ब्याज का भुगतान कर रहा था तथा अब इसने लंदन इंटरबैंक ऑफ़र्ड रेट (एल॰आई॰बी॰ओ॰आर॰) में 1 प्रतिशत से कुछ अधिक यानि लगभग 1॰18 प्रतिशत के वर्तमान दर पर चीन राज्य प्रशासन विदेशी विनिमय (एस॰ए॰एफ़॰ई॰) से 1 बिलियन डॉलर के ऋण की व्यवस्था की है| पाकिस्तान को सऊदी अरब के शेष 2 बिलियन डॉलर के ऋण का भुगतान करने के लिए इसी प्रकार के आसान ऋण की व्यवस्था करनी पड़ सकती है|
पाकिस्तान के अन्य दानकर्ता, यू॰ए॰ई॰ भी पाकिस्तान को वित्तीय रूप से मदद करने के अपने वादे से मुकर चुका है| दिसंबर 2018 में, सऊदी अरब से इशारा लेकर, इसने पाकिस्तान के लिए 6॰2 बिलियन डॉलर के एक पैकेज की घोषणा की थी, जिसमें 3॰2 बिलियन डॉलर की तेल की सुविधा शामिल है| बहरहाल, बाद में इसने अपनी वित्तीय सहायता को 2 बिलियन डॉलर तक कम कर दिया तथा विलंबित भुगतान योजना को छोड़ दिया|
अरब देशों के साथ पाकिस्तान का मोहभंग हो चुका है, क्योंकि पाकिस्तानी मीडिया के टीकाकार पाकिस्तान को समर्थन देने के लिए इस्लामिक देशों के नेताओं को प्रेरित कर रहे हैं| इसे देखा जाना है कि क्या अरब जगत से पाकिस्तान को मिलनेवाला समर्थन कम हो चुका है| इसके बावजूद, आनेवाले दिनों में सऊदी के सहारे का समाप्त होना पाकिस्तान की राजकोषीय चिंताओं में निश्चित रूप से बढ़ोतरी कर सकता है|
आलेख – डॉ॰ अशोक बेहूरिया, वरिष्ठ फैलो और समन्वयक, दक्षिण एशिया केंद्र एम॰पी॰-आई॰डी॰एस॰ए॰
अनुवाद – मनोज कुमार चौधरी
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