इज़रायल-यू॰ए॰ई॰ के औपचारिक सम्बन्धों का तात्पर्य

सितंबर 1993 में व्हाइट हाउस के लॉंन में अराफ़ात-क्लिंटन-राबिन की ऐतिहासिक हाथ मिलाने की घटना के बाद इज़रायल के साथ सम्बन्धों को सामान्य बनाने संबंधी संयुक्त अरब अमारात (यू॰ए॰ई॰) का निर्णय अत्यधिक नाटकीय घटना है| हालांकि, दोनों देशों के बीच एक मेल-मिलाप के संकेत दिख रहे थे| मज़ेदार बात यह है कि अमरीकी राष्ट्रपति, डॉनल्ड ट्रम्‍प ने इसकी घोषणा की थी| खाड़ी के अरब देशों के लिए इज़रायल का यह प्रस्ताव एक नए पृष्ठ को खोलता है| आनेवाले कुछ हफ़्तों में, वाशिंगटन में इज़रायल के प्रधानमंत्री, बेंजामिन नेतान्याहू तथा अमारात के क्राउन प्रिंस और अबु धाबी के मोहम्मद बिन ज़ाएद अल-नाहयान के बीच एक औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएँगे|

यह घोषणा एक रोमांचक अंदाज़ में हुई है| सम्बन्धों को सामान्य बनाने के बदले में, राष्ट्रपति ट्रम्प ने घोषणा की कि इस वर्ष जनवरी महीने में घोषित अपनी शांति योजना में रेखांकित वेस्ट बैंक के “क्षेत्रों पर संप्रभुता की घोषणा को इज़रायल बंद करेगा|” बहुत से घरेलू तथा अंतर्राष्ट्रीय कारणों से, नेतान्याहू वेस्ट बैंक के हिस्सों को मिलाने की इच्छा नहीं रखते थे, क्योंकि, उन्होंने मार्च 2020 में हुए केनेसेट के चुनावों के पहले ऐसा नहीं करने का वचन दिया था| हालांकि, संयोजन रोकने के मुद्दे पर नेतान्याहू आलोचना का सामना कर रहे हैं, इसलिए अमाराती स्वीकृति को सुरक्षित करने के लिए उन्होंने अपनी स्थिति का लाभ उठाया| अपनी तरफ़ से फ़लिस्तीनियों के लिए अपने समर्थन को बार-बार दोहराने के प्रति एक ठोस क़दम के रूप में इज़राइली संयोजन के रुकने को यू॰ए॰ई॰ देख और पेश कर रहा है| संक्षिप्त में, इज़रायल, यू॰ए॰ई॰ तथा अमरीका सामान्यीकरण को सभी के लिए विशेषकर, खाड़ी क्षेत्र के लिए एक अच्छी स्थिति के रूप में पेश कर रहे हैं|

अमारात का निर्णय तीन मुख्य मुद्दे उठाता है| क्षेत्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ आशाओं के अनुरूप हैं| बहरीन, मिस्र तथा ओमान ने खुले तौर पर अमारात के निर्णय का स्वागत किया है, जबकि, फ़लिस्तीनी परास्त, धोखा खाया हुआ तथा बिका हुआ महसूस कर रहे हैं| फ़लिस्तीन के विदेश मंत्री, रियाद अल-मलिकी ने अबु-धाबी में फ़लिस्तीनी राजदूत को वापस बुलाने का आदेश दिया| इस यहूदी राज्य के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध रखनेवाले, तुर्की ने आगाह किया है कि इस क्षेत्र के लोग इसे “भूलेंगे नहीं तथा यू॰ए॰ई॰ के इस कपटी व्यवहार को वे कभी क्षमा नहीं करेंगे|” राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन ने एक क़दम आगे बढ़ते हुए, यू॰ए॰ई॰ के साथ सम्बन्धों के संभावित ख़ात्मे के प्रति आगाह किया| अरब के अपने पड़ोसी की ओर से ईरान के राष्ट्रपति, हसन रूहानी ने इसे “बड़ी ग़लती” कहा है|

अमारात का यह क़दम क्षेत्रीय मामलों में फ़लिस्तीनी हितों के महत्व को कम करने का एक अन्य संकेत है| इस क्षेत्र के कम से कम कुछ राज्यों के इज़रायल के साथ संबंध फ़लिस्तीनी प्रश्न या फ़लिस्तीनी राज्यत्व के प्रस्ताव पर अब सशर्त नहीं हैं| राष्ट्रपति के रूप में ट्रम्प ने घोषणा की कि इज़रायल ने संयोजन को स्थगित किया है, रद्द नहीं किया है तथा अपनी फ़लिस्तीन समर्थक विश्वसनीयता को स्थापित करने के लिए और क्षेत्र में किसी प्रकार के बड़े विरोध पर क़ाबू पाने के लिए अमारात इसे पर्याप्त मान रहा है|

इज़रायल के लिए एक बेशक़ीमती कैच सऊदी अरब का तुरंत इसका पालन करने की संभावना नहीं दिखती है, लेकिन अबु-धाबी के लिए इसका मौन समर्थन गंभीर है| राष्ट्रपति ट्रम्प की घोषणा पर रियाद ने किसी प्रकार का सार्वजनिक वक्तव्य जारी नहीं किया है, लेकिन अमारात के क्राउन प्रिंस, अल-नाहयान तथा उनके सऊदी समकक्ष, मोहम्मद बिन-सलमान के बीच के व्यक्तिगत सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए, कार्यवाही एक सुनियोजित क़दम होगी, जो खाड़ी-इज़रायल के सम्बन्धों में एक नए अध्याय का संकेत है| अमारात का यह क़दम खाड़ी सहयोग परिषद विशेषकर, बहरीन तथा ओमान के अन्य सदस्यों को प्रस्ताव का पालन करने के लिए प्रेरित कर सकता है| हाल के वर्षों में, ये देश सामान्यीकरण समर्थक वक्तव्य देते रहे हैं| ओमान के दिवंगत सुल्तान क़बूस ने अक्टूबर 2018 में इज़रायल के प्रधानमंत्री की मेज़बानी की थी| क़तर भी इज़रायल से शत्रुता नहीं रखता है तथा गज़ा पट्टी के लोगों के लिए वित्तीय तथा सामान की सहायता देने के लिए नेतान्याहू सरकार के साथ सहयोग करता रहा है|

इस प्रस्ताव का समय तथा वॉशिंग्टन में इसका औपचारिक अनावरण राष्ट्रपति ट्रम्प के चुनावी परिकलन का संकेत है| कोविड-19 महामारी के साथ वॉशिंग्टन की अलोकप्रिय हैंडलिंग के परिणामस्वरूप आई आर्थिक मंदी के कारण अमरीकी राष्ट्रपति सभी प्रमुख ओपिनियन पोल में पिछड़ रहे हैं| राष्ट्रपति ट्रम्प को आशा है कि यू॰ए॰ई॰ तथा खाड़ी के अन्य देशों के साथ इज़रायल की राजनयिक सफलता कंज़र्वेटिव्स में उनके समर्थन को सशक्त बनाएगी|

कार्यालय संभालने के बाद, प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी भारत की समग्र मध्य पूर्व नीति में इज़रायल को “सामान्य” करने का प्रयास करते रहे हैं| अब भारत के निकट के क्षेत्रीय तथा रणनीतिक साझेदार, प्रिंस अल-नाहयान, प्रधानमंत्री, नेतान्याहू के अधिक निकट आ गए हैं| इसलिए, इज़रायल तथा यू॰ए॰ई॰ के साथ भारत के सम्बन्धों को सशक्त बनाने के लिए सामान्यीकरण एक स्वागत योग्य विकास है|

आलेख – प्रोफ़ेसर पी॰ आर॰ कुमारस्वामी, पश्चिम एशियाई अध्ययन केंद्र, जे॰एन॰यू॰

अनुवाद – मनोज कुमार चौधरी

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