बाजवा का सऊदी दौरा: रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिश

पिछले साल भारतीय संविधान के अनुच्छेद-370 को निरस्त कर दिया गया था, तभी से पाकिस्तान की आंतरिक और विदेश नीति लड़खड़ाई हुई है। कारण ये है कि पाकिस्तान की विदेश नीति का सारा फ़ोकस ही कश्मीर रहा है।

पाकिस्तान की तहरीक़-ए-इन्साफ़ सरकार ने इस मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीयकरण का भरपूर प्रयास किया है। इस्लामिक देशों के संगठन OIC से पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वो कश्मीर मसले पर एक बैठक बुलाएगा। इस्लामिक देशों में सऊदी अरब की मज़बूत केन्द्रीय भूमिका को देखते हुए पाकिस्तान ने सदैव उसे अपने पक्ष में रखने का प्रयास किया है।

पाकिस्तान की उम्मीदों को करारा झटका तब लगा जब एक टी.वी. टॉक शो में उसके विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ये बोल गए कि OIC और सऊदी अरब ने कश्मीर के मामले में पाकिस्तान की उम्मीदों को तोड़ा है। उन्होंने कहा कि अब पाकिस्तान का धीरज जवाब दे रहा है और अब यदि OIC कश्मीर पर ग़ौर नहीं करता तो वो सऊदी अरब के बिना समान सोच वाले मुल्क़ों के साथ गठबंधन कर लेगा। इससे सऊदी अरब बेहद नाराज़ हो गया और इमरान ख़ान को बिगड़ी बनाने के लिए अपने सैन्य व राजनैतिक प्रतिनिधि वहाँ भेजने पड़े। 

फ़ौरन पाकिस्तान सेनाध्यक्ष जनरल क़मर जावेद बाजवा और खुफ़िया इदारे ISI के प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद सऊदी अरब जा पहुँचे। पाकिस्तान के अनुसार उनका ये दौरा सैन्य मामलों से संबंधित था। जनरल बाजवा ने सऊदी अरब के रक्षा उपमंत्री से रक्षा सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा के मसलों में आपसी सहयोग पर बात की। ख़बरों के मुताबिक़ उन्होंने सऊदी अरब के सेनाध्यक्ष और संयुक्त सेनाओं के कमाण्डर से भी प्रशिक्षण सम्बन्धी आदान-प्रदान पर चर्चा की। ख़बरों का ये संस्करण पाकिस्तानी था चूँकि सऊदी अरब ने कहा कि ये दौरे द्विपक्षीय सहयोग के अलावा कुछ साझा सरोकारों को लेकर थे। यहाँ साझा सरोकार का मतलब है बिगड़ चुकी बात को सँभालना। कश्मीर मसले पर क़ुरैशी द्वारा की गई कड़वी बातों से पैदा कड़वाहट को जनरल बाजवा ने दूर करने की कोशिश की। यहाँ तक कि पाकिस्तान के रेल मंत्री शेख रशीद ने मीडिया से कहा कि बाजवा की सऊदी यात्रा कुछ मामूली मतभेदों से दूर करने के लिए है। ग़ौरतलब है कि सऊदी अरब के पाकिस्तान में राजदूत एडमिरल नवाफ़ सईद अल मलीकी से भी जनरल बाजवा ने सऊदी अरब रवाना होने से पहले मुलाक़ात की ताकि क़ुरैशी के बयानों से लगी आग को शान्त किया जाए। इस बैठक से बाजवा की सऊदी अरब यात्रा का रास्ता खुला।

लेकिन ऐसा लगता है कि सऊदी अरब को कोई ज़रूरी नहीं है। कारण, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने जनरल बाजवा को मिलने का समय ही नहीं दिया। इससे यही संदेश गया कि शाह महमूद क़ुरैशी के बयान से सऊदी अरब अभी भी नाराज़ है। विश्लेषकों के अनुसार सऊदी अरब चाहता है कि पाकिस्तान अपना विदेश मंत्री बदले। बहरहाल, शहज़ादे से मुलाक़ात में नाकाम रहने के बाद पाकिस्तानी कमाण्डर जेद्दाह रवाना हो गए ताकि पाकिस्तान लौटने से पहले उमराह कर सकें।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के अनुसार सऊदी अरब के साथ रिश्तों में खटास आने की ख़बरें झूठी हैं। जनरल बाजवा की ये यात्रा ऐसे समय हुई है जब UAE, इस्राइल के साथ महत्वपूर्ण शांति समझौते पर दस्तख़त कर रहा था और तुर्की, ईरान और मलेशिया एक नया गुट बनाने की धमकी दे रहे थे। तुर्की और ईरान की ओर पाकिस्तान का झुकाव और सऊदी अरब को पसंद नहीं आया है। ईरान, सऊदी अरब का प्रतिद्वंद्वी है और तुर्की OIC में अपनी भूमिका नए नेता की तरह पेश कर रहा है। इस्लामिक जगत में सऊदी अरब की स्थिति सभी को पता है।

हाल में इस्लामाबाद और रियाद के बीच रिश्तों में आई खटास बताती है कि दोनों देशों के बीच अब सबकुछ ठीक नहीं है। इस तरह, बाजवा की ये यात्रा बिगड़ते सम्बन्धों को बनाने का एक प्रयास था।









आलेख – डॉ. ज़ैनब अख़्तर

अनुवादक – मुनीश शर्मा

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