आतंकवादियों पर पाकिस्तान का ताज़ा प्रतिबंध – वास्तविक या काल्पनिक?

गत सप्ताह, 88 आतंकियों पर पाकिस्तान सरकार ने और भी वित्तीय प्रतिबंध लगाने संबंधी दो अधिसूचना जारी की| इन अधिसूचनाओं ने आतंकी गुटों और ऐसी संस्थाओं के बहुत से मुख्य नेताओं पर एक प्रतिबंध की पुष्टि की| इनमें 2008 के मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड तथा जमात-उद-दावा प्रमुख, हाफ़िज़ सईद, भारतीय संसद पर हुए हमले के मुख्य साज़िशकर्ता, जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख, मसूद अज़हर तथा 200 से अधिक लोगों के मारे जाने की 1993 के मुंबई बम धमाकों की घटना के मुख्य साज़िशकर्ता, तस्करी और अन्य ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियां चलाने के ज़िम्मेदार भारत के अति-वांछित आतंकवादी, अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहिम, तालिबान के नेता जलालुद्दीन हक़्क़ानी तथा ख़लील हक़्क़ानी शामिल हैं| अन्य प्रतिबंधित समूहों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, लश्कर-ए-झांगवी, हरकत-उल-अंसार तथा अन्य बहुत से कुख्यात संगठन शामिल हैं| इन अधिसूचनाओं में इन संगठनों और आतंकियों की चल और अचल संपत्ति को ज़ब्त करने तथा इनके बैंक खातों को फ़्रीज़ करने का प्रावधान किया गया है|

इस सूची में दाऊद इब्राहिम का नाम उसके कराची पते के साथ शामिल करके, पाकिस्तान ने पहली बार पाकिस्तान में उसकी उपस्थिती को स्वीकार किया है| भारत द्वारा उस देश में उसके आवास होने के ठोस प्रमाण देने के बावजूद, गत वर्ष तक इस्लामाबाद पाकिस्तान में दाऊद की उपस्थिती से इंकार करता रहा है|

इस परिदृस्य में, आतंकवाद के ख़तरे से निपटने में पाकिस्तान की कार्रवाई एक सकारात्मक क़दम लगती है| लेकिन वास्तव में, मामला यह नहीं हो सकता है|

यह सुपरिचित बात है कि पेरिस आधारित अंतर्राष्ट्रीय आतंक-वित्त पोषण की निगरानी एजेंसी, वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफ़॰ए॰टी॰एफ़॰) के कारण पाकिस्तान अत्यधिक दबाव में है| ध्यातव्य है कि इस एजेंसी ने 2008 से इस देश को “ग्रे” सूची में डाल रखा है| अगर इस्लामाबाद ग्रे सूची से बाहर आना चाहता है, तो पाकिस्तान को आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई करना होगा, इसके लिए एफ़॰ए॰टी॰एफ़॰ समय-सीमा का विस्तार करता रहा है| अगर पाकिस्तान ऐसा करने में असफल रहता है, तो इसे उत्तर कोरिया तथा ईरान की तरह “काली सूची” में डाला जा सकता है, जो विश्व बैंक, आई॰एम॰एफ़॰, एशियाई विकास बैंक तथा यूरोपीय बैंक आदि जैसे वैश्विक संस्थानों से ऋण लेने की इस देश की योग्यता को और जटिल बनाएगा| पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही लड़खड़ा रही है, जिससे इस देश को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है|

पाकिस्तान में आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई कोई नई बात नहीं है| यह कार्रवाई हतोत्साह में की गई है, विश्व को सिर्फ़ यह दिखाने के लिए कि पाकिस्तान आतंकियों के विरुद्ध ईमानदारी से कार्रवाई कर रहा है| यह बात सभी को पता है कि हाफ़िज़ सईद को गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन, पिछले दशक के दौरान, उसे बार-बार किसी बहाने से रिहा कर दिया गया| कट्टरपंथी आतंकी संगठन दिखावे के प्रतिबंधों के लिए जिस तरह से अपने नाम बदलते रहे हैं, वह इनके विरुद्ध पाकिस्तान सरकार की निष्ठाहीनता का एक स्पष्ट उदाहरण है| हाफ़िज़ सईद की शुरुआत एल॰ई॰टी॰ से हुई, जो फिर जमात-उद-दावा बना तथा बाद में फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन में परिवर्तित हुआ, इसके साथ आज तक वह अपनी कुटिल गतिविधियां चला रहा है| अगर पाकिस्तान आतंकवाद से निपटने में ईमानदार होता, तो यह पाँच वर्षों तक ओसामा बिन लादेन को छुपाया नहीं होता|अमरीकी विशेष बलों को ओसामा को पकड़ने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले, डॉ॰ अफ़रीदी अभी भी पाकिस्तान की हिरासत में हैं| 2008 के मुंबई हमलों के दोषियों को न्याय के कटघरे में लाने में पाकिस्तान के अधिकारियों को इतना अधिक समय लगा, क्या किसी को अनुमान है|

प्रतिबंध के मौजूदा आदेश में, ज़की-उर-रहमान लखवी तथा दाऊद इब्राहिम को पाकिस्तान के आतंक-रोधी क़ानून के तहत पंजीकृत नहीं किया गया है| उन पर केवल एक वैधानिक नियामक आदेश लागू है| बहरहाल, इस प्रसार के कुछ घंटों के बाद पाकिस्तान ने इस सूची से दाऊद का नाम हटा दिया| यह आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में पाकिस्तान की ईमानदारी का वास्तव में एक प्रमाण है|

इस परिदृश्य में, पाकिस्तान की ताज़ा कार्रवाई थोड़े नयेपन के साथ की गई है| इसे ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि एफ़॰ए॰टी॰एफ़॰ की ग्रे सूची से बचकर निकलना पाकिस्तान की मजबूरी है| लेकिन, इस्लामाबाद के गेम प्लान को समझते हुए, एफ़॰ए॰टी॰एफ़॰ ने इसे अंतिम नोटिस देते हुए, इसे इस वर्ष अक्तूबर तक 27 में से शेष 23 बिन्दुओं पर कार्रवाई करने को कहा है| वैश्विक शांति के हित में आतंकवाद के ख़तरे को जड़ से समाप्त करने की तत्काल आवश्यकता है| दुर्भाग्यवश, यह बुद्धिमानी अभी भी पाकिस्तान में नहीं दिख रही है| यह अभी भी अपनी राज्य की नीति के एक औज़ार के रूप में आतंकवाद का प्रयोग कर रहा है| 



आलेख – अशोक हांडू, राजनीतिक टिप्पणीकार 

अनुवाद – मनोज कुमार चौधरी

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