अफगानिस्तान की पुननिर्माण प्रक्रिया में भारत की केंद्रीय भूमिका
पाकिस्तानी नेतृत्व के साथ अफ्गान शांति प्रक्रिया में आगे बढ़ने के तरीको पर विचार-विमर्श करने के लिए एक उच्च स्तरीय शिष्ट मंडल इस सप्ताह पाकिस्तान पहुंचा। इस शिष्ट मंडल में दोहा में अफ्गान तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख मुल्ला अब्दुल गनी बरदार भी शामिल हैं। पिछले दस महीनों में ये मुल्ला अब्दुल गली बरदार की पाकिस्तान की दूसरी यात्रा थी। पहली यात्रा उस समय अक्टूबर 2019 में की गई थी जब राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ अचानक ही शांति वार्ता रोक दी थी। राष्ट्रपति ट्रंप का कहना था कि ये उग्रवादी गुट अफगानिस्तान में अमेरिका के नेतृत्व वाले विदेशी बलों पर हमले करता है।
इस्लामाबाद में हुई वार्ता में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल फैज अहमद भी शामिल हुआ था।
आईएसआई को 1980 के दशक में अफगानिस्तान में पूर्व सोवियत संघ के कब्जे के समय से ही अफगानिस्तान के सशस्त्र बलों और विशेषरुप से तालिबान के साथ नजदीकी संबंध और मदद करने के लिए जाना जाता है। माना जाता है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी अपने प्रभाव का प्रयोग करके तालिबान को वार्ता मेज तक लेकर आई और अमेरिका के साथ फरवरी समझौता किया।
अतः अफगान वार्ता से ठीक पहले तालिबान ने कहा था कि यह अशरफ गनी सरकार की वैधता को मान्यता नहीं देता या इसे वैध सरकार नहीं मानता। तालिबान ने कहा कि यह अफगान सरकार को पश्चिम द्वारा थोपी गई एक ऐसी संरचना के रूप में देखता है जो अमेरिकी आधिपत्य को बनाए रखने के लिए काम कर रही है।
अहम बात ये है कि तालिबान और पाकिस्तान के बीच वार्ता से ठीक पहले इस्लामाबाद ने अफगान आतंकी गुट को इस सूची में शामिल किया है जिसमें आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने, आर्थिक मदद देने, उकसाने और साथ देने वाले 88 व्यक्तियों और समूहों को रखा गया है। ये सभी जानते हैं कि पाकिस्तान तालिबान को अपने इशारों पर चलाता है। ये देखना रुचिकर होगा कि पाकिस्तान किस तरह तालिबान के साथ अपने संबंध बनाए रखता है जबकि इस्लामाबाद ने खुद ही इसे गैरकानूनी करार दिया है।
भारत और अफगानिस्तान के मजबूत सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध हैं। भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नई दिल्ली का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अफगानिस्तान में लोकतंत्र और विकास का होना जरूरी है। अक्टूबर 2011 में अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति हामिद कर्जई की भारत यात्रा के दौरान भारत और अफगानिस्तान के बीच हुए सामरिक साझेदारी समझौते से भी यही भावना पता चलती है। इस समझौते से दोनों देशों के बहु आयामी और जीवन संबंध अधिक मजबूत हुए और साथ ही राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग, व्यापक और आर्थिक सहयोग, क्षमता वर्धन और शिक्षा तथा सामाजिक सांस्कृतिक, नागरिक सहयोग तथा जन से जन का संपर्क भी बेहतर हुआ।
ये समझौता सुरक्षा और प्रशासन बदलाव के इस महत्वपूर्ण समय में अफगानिस्तान की शांति स्थिरता और सम्पनता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दर्शाता है।
भारत 2003 से अफगानिस्तान पुर्नबहाली प्रक्रिया में शामिल है। अभी तक भारत ने सड़क, विद्यालय, अस्पताल आदि के निर्माण के लिए करीब 2 अरब अमरीकी डालर का निवेश किया है। नई दिल्ली ने अफगानिस्तान में हरी नदी पर सबसे बड़ा बांध भारत अफगानिस्तान मैत्री बांध या सलमा बांध भी बनवाया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ गनी ने संयुक्त राष्ट्र से इसका उद्घाटन किया था। इस बांध की मदद से 75000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई के साथ पनबिजली संयंत्र से 42 मेगावाट बिजली भी तैयार की जाती है। इससे मौजूदा 35,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने और अतिरिक्त 40,000 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई सुविधा विकसित करने में भी मदद मिलती है। भारत अफगान लोगों के शैक्षिक और कौशल विकास गतिविधियों में भी शामिल रहा है।
अफगानिस्तान के घटनाक्रम पर भारत की पैनी नजर है। जल्दबाजी में किए गए किसी भी समझौते के प्रति आशंकित होने के बावजूद नई दिल्ली ने अमेरिका और तालिबान के बीच हुए समझौते का स्वागत किया था। भारत ने गनी सरकार का समर्थन किया और ये चहा कि तालिबान अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक राजनीतिक संरचना को मान्यता दे। अफगानिस्तान नागरिकों की मदद करने की नीति के चलते भारत अफगानिस्तान को कोविड-19 महामारी के दौरान भी चिकित्सा सहायता और भोजन की आपूर्ति करता रहा है।
विश्व इस समय कोविड-19 का सामना कर रहा है। ऐसे समय में अफगानिस्तान दोहरा संघर्ष कर रहा है। एक तो महामारी से और दूसरा बिगड़ती शांति प्रक्रिया से। अफगानिस्तान में बहुत से लोग का यह मानना है कि शांति प्रयास ही तालिबान के साथ दशकों पुराना युद्ध समाप्त करने का तरीका है। लेकिन देखना ये है कि अमरीकी सैनिकों की वापसी के बाद सुलह करने के लिए उग्रवादी गुट खुद कितना प्रतिबद्ध है।
आलेख - डॉ. स्मिता, अफ-पाक सामरिक मामलों की विश्लेषक
अनुवाद - नीलम मलकानिया
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