संयुक्त राष्ट्र की 75 वीं वर्षगॉठ के ऐतिहासिक सम्मलेन में प्रधानमंत्री का संबोधन



न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की 75वीं वर्षगॉठ के उपलक्ष्य में हुए सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विश्व नेताओ के साथ शामिल हुए । कोविड-19 महामारी के मौजूदा संकट के बावजूद विश्व नेता कई चुनौतियों को सामना करते हुए इंटरनेट के माध्यम से एकत्रित हुए जिससे एक अनोखे बहुपक्षीय संस्थान, संयुक्त राष्ट्र के चिरस्थायी होने का पता चलता है ।

संयुक्त राष्ट्र और इसकी विशेष इकाइयों के साथ ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की स्थापना दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति पर विजयी संगठित शक्तियों द्वारा की गई थी । 75 साल पहले भारत ने 25 लाख स्वैच्छिक बलों का योगदान किया था । किसी भी संगठित सेना द्वारा किया गया ये सबसे बड़ा और विशेष योगदान था । जिसने संयुक्त राष्ट्र के निर्माण में भारतीय सहभागिता में बड़ी भूमिका निभाई ।

प्रधानमंत्री ने 1945 में सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में भारत की मौजूदगी को याद किया जब जून 1945 में भारत ने संस्थापक के रूप में संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए थे । उन्होंने कहा कि युद्ध की भयावहता से एक नई आशा निकली थी जिसने पूरी दुनिया के लिए एक संस्थान की नींव रखी । इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने उन सभी के प्रति सम्मान प्रकट किया जिन्होंने शांति और विकास के लिए संयुक्त राष्ट्र ध्वज तले काम किया है ।

प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन में संयुक्त राष्ट्र में भारत की सक्रियता की एक रूपरेखा प्रस्तुत की गई जिसने संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के प्रावधानों का महत्व रेखांकित किया और जिसकी वजह से लोकतांत्रिक अंतरराष्ट्रीय संबंध विकसित हुए ।

औपनिवेशिक राज से भारत की आज़ादी से उपनिवेशवाद के खात्मे में संयुक्त राष्ट्र को प्रबलता मिली और कई पूर्व उपनिवेश रहे तथा नए नए स्वतंत्र हुए देश समान और संप्रभु राष्ट्रों के रूप में संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल हुए । उन्होंने एक देश-एक मत के लोकतांत्रिक सिद्धांतों के आधार पर महासभा के फैसलों में हिस्सा लिया ।

प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा कि भारत ने शांति, सुरक्षा और विकास की समेकित धारणा को आगे बढ़ाया है । भारत संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में सबसे ज़्यादा योगदान करता रहा है लेकिन संयुक्त राष्ट्र का वास्तविक अभियान अभी अधूरा है ।

जीवन के सभी आयामों तथा अहिंसक टकरावों का उचित सम्मान करते हुए संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की भारत की अवधारणा एक समग्र गतिविधि है । सभी पक्षों को एक परिवार के रूप में देखने वाली वसुधैव कुटुंबकम की भारतीय सभ्यता की अवधारणा के चलते भारत ने न्यायसंगत अंतरराष्ट्रीय सहयोग के सिद्धान्त को मजबूत करने की हमेशा कोशिश की है और संयुक्त राष्ट्र का मूल सिद्धान्त भी यही है ।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि आज संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इसके प्रभाव का ईमानदारी से आकलन किया जाए । प्रधानमंत्री ने कहा कि चुनौतियों का प्रभावी तरीक़े से सामना करने के लिए संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधारों की बहुत ज़रूरत है ताक़ि इसकी विश्वसनीयता और प्रासंगिकता बनी रहे ।

विश्व नेताओं द्वारा बैठक में दूरगामी घोषणाओ को स्वीकार किए जाने का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इसे अपनी परिकल्पना को पूरी करने के लिए प्रतिबद्धता की ज़रूरत है । इसमें संयुक्त राष्ट्र सुधारों के लिए प्रतिबद्धता भी शामिल है । संयुक्त राष्ट्र आज भरोसे की कमी का सामना कर रहा है । ये कहते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हम वर्तमान चुनौतियों का सामना पुरानी संरचना से नहीं कर सकते । घोषणा पत्र में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव लाना और आर्थिक तथा सामाजिक परिषद को मजबूत करते हुए महासभा को प्रभावी बनाए रखना शामिल है । प्रधानमंत्री ने कहा कि इन ज़रूरी उपायों के बिना समेकित सतत विकास, जलवायु संबंधी योजनाएँ , टकरावों के शांतिपूर्ण समाधान, असमानता दूर करने और डिजिटल तकनीक को बढ़ावा देने के लक्ष्य सार्थक नहीं हो पाएंगे ।

प्रधानमंत्री ने भारत की भावना को दोहराते हुए कहा कि स्थिर शांति और संपन्नता के लिए बहुपक्षीता बहुत जरूरी है । आपस में जुड़ी मौजूदा दुनिया के लिए हमें बहुपक्षवाद की जरूरत है । उन्होंने कहा कि मानव के कल्याण के लिए साझा चुनौतियों का प्रभावी रूप से सामना करने के लिए, सभी पक्षों को मजबूत करने के लिए और मौजूदा वास्तविकताओं को स्वीकार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सुधार बहुत ज़रूरी है ।

आलेख - संयुक्त राष्ट्र में भारत के भूतपूर्व स्थायी प्रतिनिधि राजदूत असोक कुमार मुकेरजी

अनुवाद - नीलम मलकानिया

Comments

Popular posts from this blog

भारत ने फिजी को पहुंचाई मानवीय सहायता

आत्मनिर्भर भारत में प्रवासियों की भूमिका

अरब-भारत सहयोग फोरम की बैठक