आईबीएसए विदेशमंत्रियों की वर्चुअल बैठक

भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका (आईबीएसए) संवाद मंच कई मायनों में अनोखा है। यह एक औपचारिक संगठन नहीं है। इसका कोई मुख्यालय या सचिवालय भी नहीं है। यह कोई इकाई नहीं है, न ही गठबंधन है। यह एक वैचारिक गुट भी नहीं है। आईबीएसए के मुख्य मिशन और एजेंडे में वैश्विक निर्णय लेने वाले निकायों के लोकतंत्रीकरण, वैश्वीकरण के समकालीन आदर्शों के विकल्पों को विकसित करने और दक्षिण के आर्थिक तथा सामाजिक हितों को बढ़ावा देने के आदर्श को मूर्त रूप देने की पद्धति द्वारा विकसित और विकासशील देशों के बीच शक्ति के संतुलन को बदलना है।
प्रारंभ में ब्रिक्स के आगमन ने आईबीएसए को प्रभावित नहीं किया। हितों का टकराव नहीं था। आईबीएसए ने तीनों देशों में लोकतांत्रिक मूल्यों और अन्य साझा गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि अर्थव्यवस्था ब्रिक्स की सर्वोपरि चिंता बनी रही। चीन ने आईबीएसए के विघटन का समर्थन किया लेकिन भारत ने असहमति जताई और इसके पीछे चीनी षड़यंत्र को भाँप लिया। चीन ने बाद में ब्रिक्स प्लस का मुद्दा उठाया। धीरे-धीरे, आईबीएसए को ब्रिक्स से खतरा बढ़ने लगा। आईबीएसए संवाद मंच तब संकट में आ गया जब इसकी शिखर बैठक भी आयोजित नहीं की जा सकी।
भारत के प्रयासों के फलस्वरूप, इस वैश्विक संवाद मंच में एक नई गति के संचार का अनुभव किया जा रहा है, हालांकि वर्ष 2011 के बाद से इसके स्वतंत्र शिखर सम्मेलन की बैठक नहीं हुई है। वरिष्ठ अधिकारी 'शेरपा' और आईबीएसए के विदेशमंत्री इन वर्षों के दौरान मिलते रहे हैं।
डॉ. एस. जयशंकर की अध्यक्षता में भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के विदेशमंत्रियों के बीच, इस सप्ताह एक वीडियो सम्मेलन आयोजित किया गया। उन्होंने अधिक समावेशी, उत्तरदायी और सहयोगपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय प्रशासनिक ढाँचे का समर्थन करने के अपने संकल्प को दोहराया। तीन आईबीएसए विदेशमंत्रियों ने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय शासन व्यवस्था को "अप्रासंगिक" बताया और वर्तमान शांति और सुरक्षा चुनौतियों को प्रभावी ढंग से समाप्त करने के लिए अयोग्य भी बताया। उन्होंने आगे कहा कि संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार नहीं किये जाने से अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। तीनों विदेशमंत्रियों ने स्थायी और गैर-स्थायी दोनों श्रेणियों में सुरक्षा परिषद के विस्तार का आह्वान किया। त्रिपक्षीय मंत्री आयोग की अंतिम बैठक सितंबर 2018 में न्यूयॉर्क में हुई थी।
आज, चीन के आक्रामक व्यवहार और उसके आर्थिक दबदबे ने ब्रिक्स को कमजोर बनाना शुरू कर दिया है। बीजिंग अपने लाभ के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और वैश्विक तंत्र का उपयोग कर रहा है। अफ्रीका और कुछ हद तक लैटिन अमरीका चीन के शिकारी व्यवहार का शिकार हो गया है। कुछ साल पहले, तत्कालीन अमरीकी विदेशमंत्री, हिलेरी क्लिंटन ने अफ्रीकी देशों को चेतावनी दी थी कि चीन "नए उपनिवेशवाद" को बढ़ावा दे रहा है। एक अन्य टिप्पणीकार ने कहा कि चीनी ड्रैगन अफ्रीका में 'चील के दोपहर के भोजन' को निगल रहा था। चीन बहुपक्षवाद की बात करता है लेकिन अक्सर एकपक्षीय एजेंडे का अनुसरण करता है। चीनी नेता कभी भी अन्य विकासशील देशों के साथ अपने व्यवहार में सर्वहितकारी स्थिति की बात नहीं करते। अनुभव बताता है कि कोई भी दाता नहीं है जो प्राप्त नहीं कर रहा है और कोई भी प्राप्तकर्ता नहीं है जो नहीं दे रहा है।
उभरते चीन द्वारा नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था पर आघात किया जा रहा है। इस नाजुक अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में, भारत को ब्रिक्स से आगे देखने की जरूरत है। उसे दक्षिण और उत्तर दोनों में समान विचारधारा वाले वैश्विक साझेदारों तक पहुंचने की जरूरत है जो एक मुक्त, खुले और उदार अंतरराष्ट्रीय वातावरण में अधिक निवेश करने में सक्षम हों।
भारत को सतर्क रहने और उचित कार्रवाई करने की आवश्यकता है; नई दिल्ली के पास पर्याप्त आर्थिक, सैन्य, तकनीकी और जनसांख्यिकीय शक्ति है जिससे वैश्विक समुदाय में एक उचित स्थान प्राप्त हो सके।
बदलते माहौल को ध्यान में रखते हुए, भारत को वैश्विक सहयोग प्राप्त करने के लिए स्वयं के खाके बनाने होंगे। दक्षिण-दक्षिण सहयोग ऐसा ही एक खाका है। एक अन्य ढाँचे में दक्षिण और उत्तर दोनों देशों के त्रिपक्षीय और चतुष्पक्षीय मंच शामिल हैं।
बदलती परिस्थितियों में, एक आम एजेंडा जो इन देशों को एक साथ बांधते हैं और इनके समक्ष आम चुनौतियों से निपटने में सहायक हो सकता है, सभी हितधारकों के बीच एक अधिक गंभीर और एकसमान भागीदारी की आवश्यकता उत्पन्न करता है। यहाँ भारत के लिए एक बड़ा अवसर उपलब्ध है। दाता-प्राप्तकर्ता संबंध की धारणा से आगे बढ़ते हुए, वैश्विक और क्षेत्रीय साझेदारी के नए और स्थायी रूपों की आवश्यकता है, जो सामान्य रूप से लाभप्रद हों, ताकि आवश्यक मुद्दों और अतिमहत्वपूर्ण चुनौतियों से निपटा जा सके।

आलेख - डॉ. ऐश नारायण रॉय, निदेशक, समाज विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली
अनुवादक एवं वाचक - हर्ष वर्धन

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