एससीओ में भारत एक महत्वपूर्ण पक्ष

भारत शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में इस वर्ष के अंत तक एससीओ प्रमुखों की सरकार की परिषद की अध्यक्षता सँभालने के साथ अपनी छवि को विस्तृत और संवर्धन कर रहा है। इस जिम्मेदारी और पिछले तीन वर्षों के दौरान एससीओ में भारत की यात्रा, इस जीवंत संगठन के प्रति स्पष्ट आशा और एक विशाल और आत्मनिर्भर भारत के लिए इस संगठन द्वारा संभावित विशाल अवसरों के लिए एक सुखद कल्पना है।
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) अपने अस्तित्व में आने के बाद पिछले दो दशकों में यूरेशियाई क्षेत्र में एक प्रमुख क्षेत्रीय संगठन के रूप में उभरा है। यूरेशिया क्षेत्र के 60 प्रतिशत से अधिक और दुनिया की आबादी के 40 प्रतिशत से अधिक के लिए, एससीओ के सदस्य देश दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग एक चौथाई हिस्सा रखते हैं। नए देशों को शामिल करने से, दोनों स्थायी और पर्यवेक्षक सदस्यों के रूप में, न केवल संगठन की सीमाओं का विस्तार किया गया है, बल्कि इसके दायरे और प्रभावशीलता को व्यापक बनाने में भी मदद की है। क्षेत्रीय तालमेल में वृद्धि नए सिरे से आम सुरक्षा चुनौतियों को कम करने और दीर्घकालिक आर्थिक और ऊर्जा संबंध बनाने में परिलक्षित होती है। COVID- 19 महामारी के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को कम करने के लिए सहयोग की भावना हाल ही में स्पष्ट हुई थी।

भारत ने 2005 में संगठन का पर्यवेक्षक दर्जा प्राप्त किया और 2017 में उसे पूर्ण सदस्य का दर्जा दिया गया। संगठन के साथ एक दशक से भी अधिक का समय, इस क्षेत्रीय समूह में और अधिक सार्थक भूमिका निभाने की भारत की इच्छा को स्पष्ट करता है। यह आशावाद भारत की यूरेशियाई साझेदारी को और घना करने की इच्छा से उपजा है। इस संदर्भ में, एससीओ भारत के लिए अपने विशाल पड़ोस को फिर से जोड़ने के लिए एक मंच प्रदान करता है, जिसके साथ हम साझा इतिहास के दीर्घकालिक स्थायी बंधन से बंधे हैं। भारत की सांस्कृतिक विरासत यूरेशिया के देशों से घनिष्ठता से जुड़ी है। भारतीय व्यापारियों और यात्रियों ने हजारों वर्षों तक समुद्री मार्गों के साथ व्यापार किया था और बौद्ध धर्म विशाल यूरेशियाई पटल पर फला-फूला था। यह इतिहास भारत और मध्य एशिया के बीच घनिष्ठ संबंधों से भरा हुआ है। जिसमें लोगों, वस्तुओं और विचारों के आदान प्रदान के माध्यम से, आध्यात्मिकता ने दोनों पक्षों को समृद्ध किया है। मध्य एशिया में भारतीय सिनेमा, संगीत और कला के प्रति गहरी रुचि भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षण को दर्शाती है।
इन घनिष्ठ संबंधो की शक्ति को स्वीकार करते हुए, भारत की बढ़ती आर्थिक क्षमता और संस्थागत क्षमताओं के निर्माण में विशाल अनुभव और विशेषज्ञता, एससीओ की चल रही परियोजनाओं के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं और नए क्षेत्रों में सर्वोत्तम साधन हो सकता है ताकि इस क्षेत्र के लिए एक विस्तृत विचारधारा बन सके। 30 नवंबर 2020 को भारत में शिखर सम्मेलन के समापन के दौरान एससीओ परिषद में विभिन्न राष्ट्रों के प्रमुखों की भारत की द्वारा अध्यक्षता, हमें एक अवसर प्रदान करती है। साथ ही एससीओ के व्यापार और आर्थिक एजेंडे में एक महत्वपूर्ण तरीके से योगदान दिया जा सकेगा जो नवंबर में शिखर सम्मेलन का मुख्य लक्ष्य होगा।
भारत ने तीन नए क्षेत्रों स्टार्ट-अप और इनोवेशन, पारंपरिक चिकित्सा और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में सहयोग करने का प्रस्ताव किया है। भारत ने सतत विकास लक्ष्यों 3 (एसडीजी 3) की प्राप्ति के लिए पारंपरिक चिकित्सा में सहयोग पर एक नए सब समूह के गठन, स्टार्ट-अप्स एंड इनोवेशन पर एक नए एससीओ विशेष कार्यदल की मेजबानी करने और युवा वैज्ञानिकों के लिए पहले एससीओ सम्मेलन की मेजबानी का प्रस्ताव दिया है।
नई दिल्ली एससीओ के भीतर व्यापार और निवेश में संभावित और पारस्परिक रूप से लाभप्रद सहयोग के क्षेत्रों की पहचान करने पर एक अधिक सक्रिय और केंद्रित बौद्धिक प्रवचन बनाने का प्रयास कर रहा है। भारत को बैठक में सभी सदस्य राज्यों से पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ और नवंबर में भारत में एससीओ प्रमुखों की बैठक में नेताओं के समक्ष रखे जाने वाली एक कार्ययोजना को अंतिम रूप देने के लिए नई दिल्ली प्रयासरत है।
भारत अधिक से अधिक जनमानस के संपर्क को बढ़ावा देकर एक-दूसरे की सांस्कृतिक विरासत को समझने में योगदान देना चाहता है। यही सांस्कृतिक विरासत और बंधन हमारे क्षेत्र को एकजुट बनाते हैं।
भारत पूरी तरह से आम सहमति और आपसी समझ की भावना का समर्थन करता है जो कि संगठन की पहचान रही है। नई दिल्ली हमेशा अपने विचार और कार्यों को केंद्र में रखकर इस क्षेत्र की समृद्धि और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए एससीओ के एजेंडे को समृद्ध करने में रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा।

आलेख - पदम सिंह, समाचार विश्लेषक ऑल इंडिया रेडियो
अनुवादक एवं वाचक - हर्ष वर्धन

Comments

Popular posts from this blog

भारत ने फिजी को पहुंचाई मानवीय सहायता

आत्मनिर्भर भारत में प्रवासियों की भूमिका

अरब-भारत सहयोग फोरम की बैठक