भारत में विदेशी विश्वविद्यालय परिषद: एक स्वागत योग्य क़दम 

 ये सभी जानते हैं कि सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विज्ञान की शिक्षा का मक़सद है योग्यता के साथ रचनात्मकता का विकास। प्रारंभ से ही विज्ञान पढ़ाने का उद्देश्य प्राकृतिक जिज्ञास को बढ़ावा देते हुए वैज्ञीनिक विधि से सीखने की क्रिया को प्रोत्साहित करना है। इसमें शामिल है ग़ौर से देखना, विश्लेषण करना और फिर एक ऐसे निष्कर्ष पर आना जिसकी पुष्टि की जा सके। संक्षेप में इसे कहते हैं वैज्ञानिक तरीका जिसे स्कूल स्तर पर समुचित प्रशिक्षण के माध्यम से बच्चों में विकसित किया जा सके। 

आज की दुनिया में, ज्ञान के प्रसार की गति तेज़ी से बढ़ रही है और एक विकासशील देश के लिए ये बहुत आवश्यक है कि मानव संसाधन के विकास में इस ज्ञान का उपयोग हो। सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बढ़ते महत्व को देखते हुए ये आवश्यक है कि भारत में विज्ञान पढ़ाने और सीखने का तरीक़ा अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हो।

पिछले महीनें IIT गुवाहाटी में दीक्षान्त भाषण के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा था कि भविष्य की आवश्यकताएँ देखते हुए देश के शिक्षा क्षेत्रों को खोला जाएगा। उन्होंने कहा था कि नई शिक्षा नीति 2020 के तहत विदेश के प्रतिष्ठित विश्विद्यालयों को भारत में परिसर खोलने की अनुमति दी जाएगी। इससे भारत के छात्रों को वैश्विक शिक्षा देश में ही मिलेगी। अभी हज़ारों छात्र हर साल शिक्षा पाने के लिए विदेश जाते हैं। इस तरह भारत वैश्विक शिक्षा का महत्वपूर्ण केन्द्र बन कर उभरेगा। उन्होंने कहा कि देश में अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने के लिए प्रतिष्ठित विदेशी संस्थानों के साथ आदान-प्रदान कार्यक्रमों और अनुसंधान सहयोग पर बल दिया जाएगा। 1947 में आज़ादी मिलने के बाद से भारत की लोकतांत्रिक सरकारों का ज़िम्मा रहा है कि देश में शिक्षा नीति बनाकर उसका प्रसार और विकास करें। इस क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों के दौरान काफ़ी विकास और विस्तार हुआ है। औषधि विज्ञान, अभियांत्रिक, प्रबंध और कलाओं की शिक्षा के लिए देश में शिक्षा का बढ़ा ढांचा खड़ा किया गया है। 

भारत में सकल घरेलू उत्पाद का 6% शिक्षा पर ख़र्च किया जा रहा है। ज्ञान के बढ़ते अवसरों और अनुसंधान व विकास में नवोन्मेष की ज़रुरतों को देखते हुए ये बात समझ ली गई कि भारत केवल IIT और IIM के सहारे संतोष किए बैठा नहीं रह सकता। अनेक मौजूदा शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता में फ़ौरन सुधान की ज़रूरत थी लेकिन इसके लिए काफी खर्चे की आवश्यकता होती और ये एक बड़ी बाधा थी।

देश में शिक्षा के स्तर को उठाने के लिए सरकारों ने कई क़दम उठाए जैसे विद्यालयों और महाविद्यालयों को स्वायत्तता प्रदान करना, अध्यापकों को प्रशिक्षित करना और विकास तथा अनुसंधान के लिए वित्तीय मदद देना। लेकिन ये क़दम पर्याप्त नहीं थे। इसलिए 1990 के बाद अमरीका और युनाइटेड किंग्डम का उदाहरण देखते हुए निजी विश्विद्यालयों पर बल दिया जाने लगा। महसूस किया गया कि वे देश में तकनीकी शिक्षा की बढ़ती माँग पूरी करेंगे और भारत को भविष्य में आत्म-निर्भर बना देंगे। 

   कई उद्यमी इसके लिए आगे आए और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् की स्वीकृति के बाद उन्होंने अपने तकनीकी शिक्षा संस्थान देश में शुरू कर दिए। लेकिन धीरे-धीरे ये महसूस किया गया कि इन प्रौद्योगिकी संस्थानों से निकल रहे छात्रों का स्तर अपेक्षित नहीं है।

सरकार को तब राष्ट्रीय इलैक्ट्रॉनिक एवम् सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के माध्यम से ऐसे छात्रों को रोज़गार सक्षम बनाने के कार्यक्रम शुरू करने पड़े। अंतर्राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन सरकार ने देश के शिक्षा क्षेत्र के सुधार पर सही बल दिया है। इसी साल भारत की सरकार शिक्षा क्षेत्र के लिए करीब 1 लाख करोड़ रुपये आवंटित कर चुकी है। 

प्रतिष्ठित विदेशी विश्विद्यालयों के लिए देश के शिक्षा क्षेत्र के खुलने के साथ ही भारत में तकनीकी शिक्षा का स्तर काफ़ी सुधरेगा। देश में छात्रों की रोज़गार परक योग्यता व क्षमता बढ़ेगी और अपने समृद्ध मानव संसाधन के बल पर देश खुशहाली के मार्ग पर बढ़ सकेगा।

आलेख – डॉ. अमलेन्दु शेखर

अनुवादक – मुनीश शर्मा

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