गाँधीजी: अहिंसा के देवदूत

वर्ष 2007 में जब संयुक्त राष्ट्र ने 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी के जन्म दिन को, 'अहिंसा के अंतर्राष्ट्रीय दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया; तभी से यह दिन शांति और अहिंसा में महात्मा के स्थायी योगदान की स्मृति में दुनिया भर में मनाया जाता है। यह दिवस अहिंसा की अनिवार्यता के विषय में जागरूकता पैदा करने का अवसर भी है। इस दिन के महत्व पर जोर देते हुए, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतेरस ने कहा, “गांधीजी ने हम क्या करते हैं और हम जो करने में सक्षम हैं, उसके बीच की खाई को सतत रूप से रेखांकित किया। अहिंसा के इस अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर, मैं प्रत्येक और हर एक से आग्रह करता हूं कि हम इस विभाजन को पाटने के लिए अपनी सामर्थ्य अनुसार सब कुछ करें क्योंकि हम सभी के लिए एक बेहतर भविष्य बनाने का प्रयास करते हैं। ” संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस शिक्षा और सार्वजनिक जागरूकता के माध्यम से "अहिंसा के संदेश का प्रसार" करने का एक अवसर है। इस दिन का यह संकल्प "अहिंसा के सिद्धांत की सार्वभौमिक प्रासंगिकता" तथा "शांति, सहिष्णुता, सद्भाव और अहिंसा की संस्कृति की तलाश करने की इच्छा" को बल प्रदान करता है।
गांधीजी के विचार और आदर्श आजादी और मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे नेताओं की कल्पना को आगे बढ़ाते हैं। पिछले साल इसी दिन न्यूयॉर्क टाइम्स में अपने एक लेख में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेल्सन मंडेला को उद्धृत किया जिन्होंने गांधी को "पवित्र योद्धा" कहा था। प्रधानमंत्री ने लिखा है कि "गांधी के पास मानव समाज में कुछ सबसे मजबूत विरोधाभासों के बीच एक सेतु बनने की अद्वितीय क्षमता थी।" अपने लेख में, प्रधानमंत्री मोदी ने अल्बर्ट आइंस्टीन के विचारों के साथ भी सहमति व्यक्त की, जिन्होंने कहा था, "आने वाली पीढ़ियां इस बात पर मुश्किल से विश्वास करेंगी कि इस तरह का एक व्यक्ति, मांस और रक्त वाला, कभी इस धरती पर रहता था।"
ऐसे समय में जब दुनिया विवादों और हिंसा से त्रस्त है, गांधी के विचार और आदर्श आज भी पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। गांधीजी के विचार केवल राजनीतिक संघर्ष के साधन नहीं थे; उनका उद्देश्य मानव जाति को अनियंत्रित भौतिकवाद और उपभोक्तावाद से उबारना भी था, जो कि उस समय समाज की देन रहे हैं। उन्होंने व्यक्तिगत और पेशेवर आचरण में चरित्र और नैतिकता पर बल दिया। वह केवल सत्य और अहिंसा के प्रचारक नहीं थे; बल्कि उन्होंने व्यवहारिक जीवन में भी उनका अनुसरण किया। गांधी महान थे क्योंकि उन्होंने जीवन में अपनी हर विचारधारा का अभ्यास किया और उन्होंने उनको अपनी आत्मकथा "सत्य के साथ मेरे प्रयोग" में लिखा भी है।
गांधीजी के अहिंसा के विचारों को उनके सत्याग्रह की अवधारणा में स्पष्ट रूप से दिखाई देते थे जिसका अर्थ है 'सत्य के मार्ग पर दृढ़ता से चलना'। इस आंदोलन की शुरुआत 1907 में दक्षिण अफ्रीका में हुई, जहां उन्होंने रंगभेद अर्थात नस्लीय भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी। बाद में उन्होंने भारत को ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्त करने के लिए भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम में इसे एक अस्त्र के रूप में प्रयोग किया। उन्होंने दुनिया को दिखाया कि सत्य, अहिंसा और प्रेम, बल और हिंसा से अधिक शक्ति उत्पन्न कर सकता है।

यह सेनाओं और हिंसक क्रांतियों द्वारा प्रदर्शित शक्ति की तुलना में एक अलग प्रकार की शक्ति थी। गांधीजी दुनिया के वास्तव में एकमात्र नेता ऐसे हैं जो अहिंसा की शक्ति को राजनीतिक क्रिया में बदलने में सक्षम थे। दक्षिण अफ्रीका न केवल सत्याग्रह का जन्म स्थान था, बल्कि इसका मुख्य परीक्षण स्थल और प्रयोगशाला भी था। उन्होंने अपने निजी जीवन से लेकर दक्षिण अफ्रीका में अपने राजनीतिक जीवन तक कई प्रयोग किए, जिसने उन्हें कई नए आयाम प्रदान किए।
गांधी ने 1909 में प्रिटोरिया जेल में तीन महीने बिताए, जहां उन्होंने ज्ञान, उपनिषद, बाइबिल और जॉन रस्किन, लियो टॉल्स्टॉय, आर.डब्ल्यू. इमर्सन और हेनरी डेविड थोरो की रचनाओं के महान ग्रंथ पढ़े। वह उनके लेखन और दर्शन से बहुत प्रभावित हुए।
गांधीजी ने सार्वभौमिक प्रेम की भावना को अहिंसा का महत्वपूर्ण स्रोत माना। जैसा कि प्रेम और अहिंसा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है, यह सभी जीवित प्राणियों का सामान्य व्यवहार भी है। गांधीजी ने दुनिया को दिखाया कि यदि जनमानस की सामूहिक अहिंसक कार्रवाई को हृदय की शुद्धता के साथ किया जाए तो ऐसा वातावरण बनेगा कि हिंसक विचार हवा में उड़ जाएंगे। गांधीजी ने यह भी कहा कि अहिंसा का मतलब यह नहीं है कि यह कमजोर व्यक्ति का एक हथियार है। गांधीजी के शांति और अहिंसा के विचारों में आशा और आशावाद का पुंज है। कोई आश्चर्य नहीं कि उनके विचार और आदर्श दुनिया भर में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जिसमें पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना जैसे देश भी शामिल हैं, जो सशस्त्र संघर्ष से पैदा हुए थे।

आलेख - रूप नारायण दास, सामरिक विश्लेषक
अनुवादक एवं वाचक - हर्ष वर्धन

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