पाकिस्तान रहेगा ‘ग्रे लिस्ट’ में
पाकिस्तान को पूरा विश्वास है कि वो पेरिस स्थित वित्तीय कार्रवाई कार्यदल की इसी सप्ताह होने वाली पूर्ण बैठक में ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर आ जाएगा । आतंक फैलाने के लिए धन का अवैध लेन-देन करने वाले देशों पर निगाह रखने वाले वित्तीय कार्रवाई कार्यदल FATF ने उसे इस सूची में डाल रखा है । कुछ समय से पाकिस्तान के वित्त मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी सारी दुनिया को ऐसा दिखाने की कोशिश में है कि उनका देश इस सूची से निकल आएगा । हाल में मुल्तान में एक जनसभा में उन्होंने कहा कि आतंकवाद को वित्तीय मदद देने के बारे में FATF के निर्देशों का उन्होंने पालन किया है अतः पाकिस्तान जल्द ही इस सूची से बाहर आ जाएगा । इस संबंध में उन्होंने तुर्की, मलेशिया और सऊदी अरब जैसे अपने सहयोगियों को जानकारी देकर उनका विश्वास पाने का प्रयास किया है । पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस दिशा में काफ़ी प्रगति होने का दावा भी किया है ।
लेकिन ऐसी बातों से सच्चाई छिप नहीं सकती । क्या पाकिस्तान ने जो कदम उठाए वो FATF को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त है ? स्वतंत्र वैश्विक समीक्षा दर्शाती है कि काफ़ी कुछ किया जाना बाक़ी है । पाकिस्तान ने बेशक लश्कर-ए- तैय्यबा के सरगना हाफ़िज़ सईद को गिरफ़्तार करके 11 साल के लिए क़ैद में डाला है लेकिन उसका ये भी कहना है कि ज़की-उर-रहमान लखवी का उसे कोई सुराग़ नहीं मिला और जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर का भी उसे कुछ नहीं पता । कोई ये यक़ीन नहीं कर सकता कि इतने कुख्यात आतंकी पाकिस्तान में गायब हो जाएंगे । साफ तौर पर ये उन्हें बचाने का प्रयास है । इसके अलावा अल क़ायदा और हक्कानी गुटों से जुड़े आतंकियों को भी दंडित नहीं किया गया है जबकि ये गुट संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘आतंकी गुटों’ की श्रेणी में डाले गए हैं । कोई नहीं जानता कि 6,500 आतंकियों का क्या हुआ जिन्हें इसी साल मई में संयुक्त राष्ट्र के एक पर्यवेक्षक दल ने सूचीबद्ध किया था । पाकिस्तान ने अपने आतंक निरोधक क़ानून के तहत इनमें से 4,000 को तो बाहर ही कर दिया । जिन्हें दंडित किया उन पर हल्के आरोप लगाए गए और कुछ दिन के जेल के बाद छोड़ दिया गया । भारत में आतंकी गतिविधियों में शामिल हाफ़िज़ सईद के रिश्तेदार अब्दुल रहमान मक्की को 2010 में अमरीका ने आतंकी घोषित करते हुए उसके सर पर 20 लाख का इनाम रखा था । उस पर 20,000 रुपये का जुर्माना लगाकर एक आतंक निरोधी अदालत ने 18 माह जेल की सज़ा सुनाई जिसे बाद में लाहौर की एक अदालत ने रद्द कर दिया । आतंकियों के विरुद्ध मामले इतने हल्के दायर किए जाते हैं कि 196 तो पिछले साल अदालत के आदेश से ही बरी हो चुके हैं ।
संसद के संयुक्त सत्र में पिछले माह पाकिस्तान सरकार ने 3 आतंक निरोधक क़ानून पारित किए । देखना ये है कि ये कितने प्रभावी रहते हैं । पाकिस्तान में आतंक विरोधी क़ानूनों की कमी नहीं है, मसला है उन्हें लागू करने का ।
हाल में FATF के एशिया प्रशांत ग्रुप में एक समीक्षा रिपोर्ट जारी की जिसमें कहा गया कि जिन 40 बातों पर कार्रवाई की ज़रूरत थी, उन पर पाकिस्तान की हालत वही रही जो पिछले साल थी । इसमें कहा गया कि पाकिस्तान की ओर से आतंकियों को धन संबंधी मदद देने के मामले में जो कार्रवाई होनी चाहिए थी वह उसने कर के दिखाई नहीं है इसलिए उससे कहा जाएगा कि वो फिर से ऐसे प्रमाण दें जिससे लगे कि उसकी मंशा साफ है । अब पाकिस्तान को FATF के 39 में से कम से 39 में से कम से कम 3 सदस्य देशों का समर्थन चाहिए वरना वो ‘काली सूची’ या कहें ‘ब्लैक लिस्ट’ में डाल दिया जाएगा और प्रधानमंत्री इमरान खान के मुताबिक ऐसा होते ही पाकिस्तान बर्बाद हो जाएगा । ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर आने के लिए उसे कम से कम 12 सदस्य देशों का समर्थन चाहिए । चीन, तुर्की और मलेशिया पाकिस्तान के साथ है इसलिए वो ‘ग्रे लिस्ट’ में ही रहेगा । अन्य देशों का समर्थन जुटाना उसके लिए मुमकिन नहीं लगता । इसका मतलब है कि उसे विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियाई विकास बैंक और यूरोपीय संघ से वित्तीय सहयोग नहीं मिलेगा और उसकी आर्थिक सेहत लचर होती जाएगी । पाकिस्तान के लिए दीवार पर लिखी इबारत स्पष्ट है । यदि वो ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर आना चाहता है तो उसे आतंकियों के विरुद्ध गंभीरतापूर्वक कार्रवाई करनी होगी । अंतरराष्ट्रीय समुदाय को खुश करने के लिए धोखा देने से बात नहीं बनेगी ।
आलेख - अशोक हान्डू
अनुवाद - मुनीश शर्मा
लेकिन ऐसी बातों से सच्चाई छिप नहीं सकती । क्या पाकिस्तान ने जो कदम उठाए वो FATF को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त है ? स्वतंत्र वैश्विक समीक्षा दर्शाती है कि काफ़ी कुछ किया जाना बाक़ी है । पाकिस्तान ने बेशक लश्कर-ए- तैय्यबा के सरगना हाफ़िज़ सईद को गिरफ़्तार करके 11 साल के लिए क़ैद में डाला है लेकिन उसका ये भी कहना है कि ज़की-उर-रहमान लखवी का उसे कोई सुराग़ नहीं मिला और जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर का भी उसे कुछ नहीं पता । कोई ये यक़ीन नहीं कर सकता कि इतने कुख्यात आतंकी पाकिस्तान में गायब हो जाएंगे । साफ तौर पर ये उन्हें बचाने का प्रयास है । इसके अलावा अल क़ायदा और हक्कानी गुटों से जुड़े आतंकियों को भी दंडित नहीं किया गया है जबकि ये गुट संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘आतंकी गुटों’ की श्रेणी में डाले गए हैं । कोई नहीं जानता कि 6,500 आतंकियों का क्या हुआ जिन्हें इसी साल मई में संयुक्त राष्ट्र के एक पर्यवेक्षक दल ने सूचीबद्ध किया था । पाकिस्तान ने अपने आतंक निरोधक क़ानून के तहत इनमें से 4,000 को तो बाहर ही कर दिया । जिन्हें दंडित किया उन पर हल्के आरोप लगाए गए और कुछ दिन के जेल के बाद छोड़ दिया गया । भारत में आतंकी गतिविधियों में शामिल हाफ़िज़ सईद के रिश्तेदार अब्दुल रहमान मक्की को 2010 में अमरीका ने आतंकी घोषित करते हुए उसके सर पर 20 लाख का इनाम रखा था । उस पर 20,000 रुपये का जुर्माना लगाकर एक आतंक निरोधी अदालत ने 18 माह जेल की सज़ा सुनाई जिसे बाद में लाहौर की एक अदालत ने रद्द कर दिया । आतंकियों के विरुद्ध मामले इतने हल्के दायर किए जाते हैं कि 196 तो पिछले साल अदालत के आदेश से ही बरी हो चुके हैं ।
संसद के संयुक्त सत्र में पिछले माह पाकिस्तान सरकार ने 3 आतंक निरोधक क़ानून पारित किए । देखना ये है कि ये कितने प्रभावी रहते हैं । पाकिस्तान में आतंक विरोधी क़ानूनों की कमी नहीं है, मसला है उन्हें लागू करने का ।
हाल में FATF के एशिया प्रशांत ग्रुप में एक समीक्षा रिपोर्ट जारी की जिसमें कहा गया कि जिन 40 बातों पर कार्रवाई की ज़रूरत थी, उन पर पाकिस्तान की हालत वही रही जो पिछले साल थी । इसमें कहा गया कि पाकिस्तान की ओर से आतंकियों को धन संबंधी मदद देने के मामले में जो कार्रवाई होनी चाहिए थी वह उसने कर के दिखाई नहीं है इसलिए उससे कहा जाएगा कि वो फिर से ऐसे प्रमाण दें जिससे लगे कि उसकी मंशा साफ है । अब पाकिस्तान को FATF के 39 में से कम से 39 में से कम से कम 3 सदस्य देशों का समर्थन चाहिए वरना वो ‘काली सूची’ या कहें ‘ब्लैक लिस्ट’ में डाल दिया जाएगा और प्रधानमंत्री इमरान खान के मुताबिक ऐसा होते ही पाकिस्तान बर्बाद हो जाएगा । ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर आने के लिए उसे कम से कम 12 सदस्य देशों का समर्थन चाहिए । चीन, तुर्की और मलेशिया पाकिस्तान के साथ है इसलिए वो ‘ग्रे लिस्ट’ में ही रहेगा । अन्य देशों का समर्थन जुटाना उसके लिए मुमकिन नहीं लगता । इसका मतलब है कि उसे विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियाई विकास बैंक और यूरोपीय संघ से वित्तीय सहयोग नहीं मिलेगा और उसकी आर्थिक सेहत लचर होती जाएगी । पाकिस्तान के लिए दीवार पर लिखी इबारत स्पष्ट है । यदि वो ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर आना चाहता है तो उसे आतंकियों के विरुद्ध गंभीरतापूर्वक कार्रवाई करनी होगी । अंतरराष्ट्रीय समुदाय को खुश करने के लिए धोखा देने से बात नहीं बनेगी ।
आलेख - अशोक हान्डू
अनुवाद - मुनीश शर्मा
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