कौशल पुन कौशल और कौशल विकास का प्रधानमंत्री का आह्वाहन

यह समय परिवर्तन और अवसर का समय है लेकिन कोविड-19 महामारी ने इस कठिन बना दिया है। सारी दुनिया की अर्थव्यस्था कोविड-19 महामारी से प्रभावित हुई है। वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की अर्थव्यस्था पर भी बुरा असर पड़ा लेकिन अभी विश्व अर्थव्यस्था जहाँ फिसलन भरे रस्ते पर है वहीं भारत की अर्थव्यस्था अब दोबारा उन्नति के मार्ग पर आ चुकी है।

ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री ने ये एकदम सटीक और आवश्यक बात कही है की भारत जैसी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यस्था में कौशल पुन कौशल और कौशल विकास सर्वाधिक आवश्यक है। एक वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए मैसूर विश्विद्यालय के शताब्दी समारोह 2020 को संबोधित करते हुए श्री मोदी ने कहा कि मैसूर विश्विद्यालय प्राचीन भारत की महान शिक्षा पद्धति का केंद्र रहा है। ये विश्विद्यालय भारत के भविष्य की आकांक्षाओं और सामध्य का भी केंद्र है और इसने राजश्री नलवाडी कृष्णाराजा वाडियार और डॉ. एम विइवैइवरैय्या के सपनों को पूरा किया है। उन्होंने भारत रत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भी याद किया जो इस विश्विद्यालय में पढ़ा चुके हैं।

प्रधानमंत्री ने छात्रों से कहा कि उन्होंने जो ज्ञान प्राप्त किया है, उसका प्रयोग उन्हें वास्तविक जीवन के विभिन्न चरणों में करना चाहिए। उन्होंने वास्तविक जीवन को एक महान विश्विद्यालय कहा, जहाँ ज्ञान को प्रयोग में लाने के विभिन्न तरीके सिखाए जाते हैं। प्रधानमंत्री के कहे का आशय यही है कि परिवर्तन ही एक स्थाई सत्य है और भारत को विकास मार्ग पर चलते हुए निरंतर चुनौतियों के हिसाब से खुद को ढालना होगा। ये बात बिलकुल सही भी है।

मैकिंस्की ग्लोबल इंस्टिट्यूट के एक ताज़ा अध्ययन में ये बात सामने आ चुकी है की 2030 तक दुनिया भर में 400 से 800 मिलियन नौकरियां पूरी तरह मशीनी हो जाएंगी। ऐसे में व्यापार और उद्योग तभी विकसित हो पाएगा जब श्रम शक्ति लगातार कौशल प्रवीण होती रहे।

सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में नैसकॉम का एक ताजा सर्वेक्षण बताता है कि भारत के अकेले आईटी क्षेत्र में आने वाले समय में अनुमानित 40 लाख कर्मियों में 40% को क्लाउड-कन्ट्यूटिंग, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और बिग डाटा ऐनालिसिस जैसी नई प्रौद्योगिकी को आत्मसात करना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत को अपने युवाओं को बेहतर कौशल प्रदान करना होगा। फिलहाल अधिकांश ऐसे शिक्षित युवा संस्थानो से निकल रहे हैं, जिन्हे वैश्वीकरण के इस दौर में रोज़गार मिलना कठिन होता है। कौशल विकास की राष्ट्रीय परिषद के सलाहकार ने प्रधानमंत्री को दी रिपोर्ट में बताया है कि 15 से 29 वर्ष के युवाओं में से मात्र 2% को ही औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण मिला है और 8% ने अनौपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण पाया है।

दुनिया भर में लाखों लोग कौशल रहित होने के कारण बेरोज़गार हैं। युवा बेरोज़गारी का एक कारण है, ढांचागत बेरोज़गारी यानी जिस तरह का काम रोज़गार प्रदाता को चाहिए उसके अनुरूप कौशल कर्मचारियों में नहीं है। कौशल की कमी के कारण युवा लोग वयस्कों की तुलना में बेरोज़गारी के अधिक शिकार हैं और 3 गुणा अधिक संख्या में हैं। उन्हें असमानता भरी परिस्थितियों में अपनी योग्यता से कम हैसियत का काम करना पढ़ रहा है। महिलाओं की तादाद इस मामले में अधिक है और उन्हें अपनी शिक्षा के अनुरूप काम नहीं मिलता या कम वेतन का मिलता है, या पार्ट टाइम और अस्थाई काम मिलता है। ढांचागत बेरोज़गारी का असर पूरी दुनिया में है और इसी की वजह से समतामूलक समाज नहीं बन पाता और सतत विकास के लिए ऐजेंडा 2030 भी पूरा होता दिखाई नहीं पड़ता।

विशेषज्ञों के अनुसार कौशल के विकास की आवश्यकता का पता तो इसी से लग जाता है कि दुनिया में 5 में से 1 व्यक्ति को रोज़गार, शिक्षा और प्रशिक्षण का अवसर ही प्राप्त नहीं है। 1997 से 2017 के बीच मुख्य आबादी 139 मिलियन बढ़ी, लेकिन समस्या ये है कि युवा श्रम शक्ति 58.7 मिलियन कम हो गई। 5 युवा कर्मियों में से 2 उभरती या विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में रहते हैं। जहाँ उन्हें भारतीय मुद्रा के अनुसार मात्र 250 रुपए के करीब दैनिक कमाई होती है।

प्रधानमंत्री मोदी का ये कहना सर्वथा उचित है कि नवोन्मेष कौशल विकास की चाबी है। उन्होंने दीक्षांत समारोह में दिए भाषण में 'नए विचारों के विकास कक्षों', प्रौद्योगिकी विकास केन्द्रों, उद्योगों और शिक्षा जगत को जोड़ने और अध्ययन के विविध क्षेत्रों के संगम पर भी बल दिया।

ये काफी उत्साहवर्धक बात है कि मोदी सरकार के शिक्षा क्षेत्र में सुधारों के इस दौर में बुनियादी निर्माण और ढांचागत सुधार पर विशेष बल दिया गया है।

आलेख- सुनील गताड़े

अनुवाद- मुनीश शर्मा

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