भारत ने अफ्रीका को दी जाने वाली सहायता में बढोत्तरी की।
महत्वपूर्ण मानवीय पहलू के साथ, आवश्यकता पड़ने पर अफ्रीकी लोगों तक पहुंचने की भारत की परंपरा को ध्यान में रखते हुए; भारत, सूडान, दक्षिण सूडान, जिबूती और इरिट्रिया को 270 टन खाद्यान्न की सहायता प्रदान करेगा ताकि प्राकृतिक आपदाओं और कोविड-19 महामारी से प्रभावित लोगों की पीड़ा को कम करने के लिए राहत पहुंचाई जा सके ।
अफ्रीकी महाद्वीप में हॉर्न ऑफ अफ्रीका के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र, दशकों से विभिन्न आदिवासी लड़ाकों के बीच परस्पर विनाश कारी युद्ध के कारण अशांत स्थिती का सामना कर रहा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के वजह से यह क्षेत्र शांति की राह पर अग्रसर हुआ है, लेकिन अभी भी इस क्षेत्र में स्थानीय लोगों को सरकारों और संस्थाओं के सहयोग की आवश्यकता है ताकि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया जा सके। भारत इस क्षेत्र में हजारों शांति सैनिक भेजने के साथ-साथ विभिन्न क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से गरीब लोगों के उत्थान में अहम भूमिका निभा रहा है।
155 टन गेहूं का आटा, 65 टन चावल और 50 टन चीनी खाद्यान्न सहायता के रूप में भारतीय नौसेना के जहाज ऐरावत से वहां पहुंचाई जा रही है। पिछले सप्ताह मुंबई से इस क्षेत्र की यात्रा पर रवाना हुआ ऐरावत रसद पहुंचाने के लिए इस दौरान जिबूती, मसावा, सूडान और मोम्बासा के बंदरगाहों पर लंगर डालेगा।
भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत और अफ्रीकी देशों के बीच मित्रता और भाईचारे के सम्बंध बनने और प्रगाढ़ होने में कई सदियों का समय लगा हैं । भारत हमेशा अफ्रीकी देशों और वहां लोगों के साथ एकजुटता से खड़ा रहा है और विकास, क्षमता निर्माण और मानवीय सहायता कार्यक्रमों को शुरू करने में भागीदारी निभायी है । कोरोना महामारी आने साथ ही भारत ने इससे पहले अफ्रीकी देशों को कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में प्रशिक्षित करने के लिए विभिन्न चिकित्सा सहायता और विशेषज्ञों के दल को वहां भेजा था। भारत ने अपने नौसैनिक युद्धपोतों के जरिए विभिन्न अफ्रीकी देशों जैसे कोमोरोस, मॉरीशस और मेडागास्कर में मेडिकल टीमें भेजी थीं। भारत ने इन देशों के चिकित्सा कर्मियों को कोविड-19 रोगियों के उपचार के उचित प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित भी किया है ।
जब से कोविड-19 महामारी फैली है उसके बाद से भारत ने अफ्रीकी देशों की सरकारों के साथ चिकित्सा सहायता की आपूर्ति और एक-दूसरे के नागरिकों की स्वदेश वापसी के लिए विशेष उड़ानों के माध्यम से मिलकर काम किया है । भारत ने इससे पहले इस क्षेत्र को कोविड से सम्बंधित सहायता प्रदान की थी। दशकों से विकास सहायता के बल पर अधिग्रहीत सद्भावना को मज़बूती से पनपाने के बाद भारत अब अफ्रीकी संघ के सदस्य देशों के साथ नई साझेदारियां गढ़ रहा है। इस संदर्भ में, भारतीय विदेश मंत्री ने पहले इस बात पर जोर दिया था कि अफ्रीका भारत की प्राथमिकता है और भारत के लिए वैश्विक प्रणाली के ध्रुवों में से एक के रूप में अफ्रीका का उभरना सिर्फ वांछनीय नहीं है, बल्कि नितांत आवश्यक है ।
इस पृष्ठभूमि में, भारत संसाधनों के समृद्ध क्षेत्र को हर तरह की सहायता प्रदान करता रहा है, ताकि उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सके। इसी उद्देश्य की पूर्ती के लिए भारत ने इस क्षेत्र में छोटी अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपने सम्बंधों को और गहरा किया है। भारत ने जब से दो दशक पहले अपना "फोकस अफ्रीका" कार्यक्रम शुरू किया है; भारत-अफ्रीकी सम्बंधों में लगातार वृद्धि देखने को मिली है। अन्य वैश्विक शक्तियों जिनका इस क्षेत्र के साथ जुड़ाव यहां के स्थानीय संसाधनों और बाजारों के दोहन पर केंद्रित है उनसे विपरीत, भारत अपनी तकनीकी आर्थिक सहायता के माध्यम से यहां क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को लागू कर रहा है जिसे भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (आईटीईसी) कार्यक्रम के रूप में जाना जाता है।
अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए, भारत उन्हें अपने बाजार तक बेहतर पहुंच प्रदान कर रहा है जिसके परिणामस्वरूप भारत, अफ्रीका के लिए तीसरे सबसे बड़े निर्यात गंतव्य के रूप में उभर रहा है। भारत ने अपने व्यापारिक घरानों को भी इस क्षेत्र में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया है और ये निवेश 54 अरब अमरिकी डॉलर से अधिक के आंकड़े तक पहुंच गया है। इससे भारत अफ्रीकी महाद्वीप के सबसे बड़े निवेशकों में से एक हो गया है। एक आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, भारत ने 37 देशों में 11.6 अरब अमेरिकी डॉलर की लागत वाली 197 विकास परियोजनाओं को लागू किया है। इसके अलावा, भारत वर्तमान में 29 देशों में 77 अतिरिक्त परियोजनाओं पर काम कर रहा है।
ये परियोजनाएं बुनियादी ढांचे, आईसीटी, बिजली उत्पादन, कृषि, तेल और गैस से सम्बंधित हैं। भारत ने मोजांबिक, दक्षिण सूडान और उत्तर पश्चिम अफ्रीका के अन्य पिछड़े क्षेत्रों में भी सात अरब अमरिकी डॉलर से अधिक की राशि का निवेश किया है। इस साल की शुरुआत में फरवरी महीनें में अफ्रीकी देशों को सुरक्षा प्रबंधन में मदद करने के लिए भारत और अफ्रीका के रक्षा मंत्रियों के सम्मेलन का आयोजन किया गया था । इस प्रकार भारत अपने विभिन्न विकासात्मक सहायता और सहयोग कार्यक्रमों के साथ महाद्वीप में भारी निवेश कर रहा है ।
आलेख:- रंजीत कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
अनुवाद एवं स्वर- वीरेन्द्र कौशिक
अफ्रीकी महाद्वीप में हॉर्न ऑफ अफ्रीका के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र, दशकों से विभिन्न आदिवासी लड़ाकों के बीच परस्पर विनाश कारी युद्ध के कारण अशांत स्थिती का सामना कर रहा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के वजह से यह क्षेत्र शांति की राह पर अग्रसर हुआ है, लेकिन अभी भी इस क्षेत्र में स्थानीय लोगों को सरकारों और संस्थाओं के सहयोग की आवश्यकता है ताकि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया जा सके। भारत इस क्षेत्र में हजारों शांति सैनिक भेजने के साथ-साथ विभिन्न क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से गरीब लोगों के उत्थान में अहम भूमिका निभा रहा है।
155 टन गेहूं का आटा, 65 टन चावल और 50 टन चीनी खाद्यान्न सहायता के रूप में भारतीय नौसेना के जहाज ऐरावत से वहां पहुंचाई जा रही है। पिछले सप्ताह मुंबई से इस क्षेत्र की यात्रा पर रवाना हुआ ऐरावत रसद पहुंचाने के लिए इस दौरान जिबूती, मसावा, सूडान और मोम्बासा के बंदरगाहों पर लंगर डालेगा।
भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत और अफ्रीकी देशों के बीच मित्रता और भाईचारे के सम्बंध बनने और प्रगाढ़ होने में कई सदियों का समय लगा हैं । भारत हमेशा अफ्रीकी देशों और वहां लोगों के साथ एकजुटता से खड़ा रहा है और विकास, क्षमता निर्माण और मानवीय सहायता कार्यक्रमों को शुरू करने में भागीदारी निभायी है । कोरोना महामारी आने साथ ही भारत ने इससे पहले अफ्रीकी देशों को कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में प्रशिक्षित करने के लिए विभिन्न चिकित्सा सहायता और विशेषज्ञों के दल को वहां भेजा था। भारत ने अपने नौसैनिक युद्धपोतों के जरिए विभिन्न अफ्रीकी देशों जैसे कोमोरोस, मॉरीशस और मेडागास्कर में मेडिकल टीमें भेजी थीं। भारत ने इन देशों के चिकित्सा कर्मियों को कोविड-19 रोगियों के उपचार के उचित प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित भी किया है ।
जब से कोविड-19 महामारी फैली है उसके बाद से भारत ने अफ्रीकी देशों की सरकारों के साथ चिकित्सा सहायता की आपूर्ति और एक-दूसरे के नागरिकों की स्वदेश वापसी के लिए विशेष उड़ानों के माध्यम से मिलकर काम किया है । भारत ने इससे पहले इस क्षेत्र को कोविड से सम्बंधित सहायता प्रदान की थी। दशकों से विकास सहायता के बल पर अधिग्रहीत सद्भावना को मज़बूती से पनपाने के बाद भारत अब अफ्रीकी संघ के सदस्य देशों के साथ नई साझेदारियां गढ़ रहा है। इस संदर्भ में, भारतीय विदेश मंत्री ने पहले इस बात पर जोर दिया था कि अफ्रीका भारत की प्राथमिकता है और भारत के लिए वैश्विक प्रणाली के ध्रुवों में से एक के रूप में अफ्रीका का उभरना सिर्फ वांछनीय नहीं है, बल्कि नितांत आवश्यक है ।
इस पृष्ठभूमि में, भारत संसाधनों के समृद्ध क्षेत्र को हर तरह की सहायता प्रदान करता रहा है, ताकि उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सके। इसी उद्देश्य की पूर्ती के लिए भारत ने इस क्षेत्र में छोटी अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपने सम्बंधों को और गहरा किया है। भारत ने जब से दो दशक पहले अपना "फोकस अफ्रीका" कार्यक्रम शुरू किया है; भारत-अफ्रीकी सम्बंधों में लगातार वृद्धि देखने को मिली है। अन्य वैश्विक शक्तियों जिनका इस क्षेत्र के साथ जुड़ाव यहां के स्थानीय संसाधनों और बाजारों के दोहन पर केंद्रित है उनसे विपरीत, भारत अपनी तकनीकी आर्थिक सहायता के माध्यम से यहां क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को लागू कर रहा है जिसे भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (आईटीईसी) कार्यक्रम के रूप में जाना जाता है।
अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं को सशक्त बनाने के लिए, भारत उन्हें अपने बाजार तक बेहतर पहुंच प्रदान कर रहा है जिसके परिणामस्वरूप भारत, अफ्रीका के लिए तीसरे सबसे बड़े निर्यात गंतव्य के रूप में उभर रहा है। भारत ने अपने व्यापारिक घरानों को भी इस क्षेत्र में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया है और ये निवेश 54 अरब अमरिकी डॉलर से अधिक के आंकड़े तक पहुंच गया है। इससे भारत अफ्रीकी महाद्वीप के सबसे बड़े निवेशकों में से एक हो गया है। एक आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, भारत ने 37 देशों में 11.6 अरब अमेरिकी डॉलर की लागत वाली 197 विकास परियोजनाओं को लागू किया है। इसके अलावा, भारत वर्तमान में 29 देशों में 77 अतिरिक्त परियोजनाओं पर काम कर रहा है।
ये परियोजनाएं बुनियादी ढांचे, आईसीटी, बिजली उत्पादन, कृषि, तेल और गैस से सम्बंधित हैं। भारत ने मोजांबिक, दक्षिण सूडान और उत्तर पश्चिम अफ्रीका के अन्य पिछड़े क्षेत्रों में भी सात अरब अमरिकी डॉलर से अधिक की राशि का निवेश किया है। इस साल की शुरुआत में फरवरी महीनें में अफ्रीकी देशों को सुरक्षा प्रबंधन में मदद करने के लिए भारत और अफ्रीका के रक्षा मंत्रियों के सम्मेलन का आयोजन किया गया था । इस प्रकार भारत अपने विभिन्न विकासात्मक सहायता और सहयोग कार्यक्रमों के साथ महाद्वीप में भारी निवेश कर रहा है ।
अनुवाद एवं स्वर- वीरेन्द्र कौशिक
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