पाकिस्तान ने पुलवामा हमले में अपनी भूमिका स्वीकारी


29 अक्तूबर 2020 को पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली के भूतपूर्व अध्यक्ष अयाज़ सादिक़ ने उजागर किया कि 1 मार्च 2019 में इमरान ख़ान सरकार ने पकड़े हुए भारतीय वायु सेना अधिकारी अभिनंदन को इसलिए छोड़ा क्योंकि भारत की ओर से हमले का डर था।

इससे पहले विपक्षी नेताओं के साथ एक बैठक में माथे पर पसीना और काँपती टाँगों के साथ विपक्ष से अनुरोध किया था कि सरकार के फ़ैसले का विरोध ना करें और अभिनंदन को जाने दें। इस बैठक में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल बाजवा और शाह महमूद क़ुरैशी भी शामिल थे।

अयाज़ एक वरिष्ठ राजनेता हैं और मुखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। हालांकि मुख्य विपक्षी दल के सदस्य होने के नाते सरकार का विरोध करते हुए उनका उद्देश्य सरकार पर हमला बोलना और कहीं ना कहीं सेना की बुराई करना भी था। इससे पाकिस्तान में लगातार गहराते राजनीतिक संकट का पता चलता है। अयाज़ के इस कथन का मतलब भले ही मोदी सरकार की वाह-वाही करना ना हो लेकिन इससे पाकिस्तानी सेना की किरकिरी तो हुई ही। सरकारी धड़े द्वारा किए गए बचाव में बुरे के साथ अच्छे से भी हाथ धोना पड़ा।

पाकिस्तान के संघीय विज्ञान और तकनीक मंत्री फ़वाद चौधरी ने अपनी सरकार की युद्धप्रियता और सफलता का बखान करने के दबाव में ये दावा किया कि दो भारतीय यानों को मार गिराने और एक पायलट को बंदी बनाने के साथ ही पुलवामा हमले की साज़िश रचना इमरान की नीति की बड़ी सफलता है। ये एक मंत्री द्वारा की गई सहज टिप्पणी थी जिसने ये स्वीकारा कि पाकिस्तान आतंकवाद का इस्तेमाल अपनी नीति के तौर पर करता है। भारतीय मीडिया में इन दोनों वक्तव्यों का खूब उल्लेख किया गया और इनसे भारत में मोदी सरकार की रेटिंग बढ़ रही है साथ ही भारत के इस पक्ष को भी मज़बूती मिल रही है कि पाकिस्तान इस क्षेत्र में और विशेष तौर से भारत के ख़िलाफ़ आतंक का ढीठ प्रायोजक बनता आया है।

एक दिन बाद अपने स्पष्टीकरण में अयाज़ ने नागरिक सरकार को अलग करने की कोशिश करते हुए कहा कि विपक्ष को ये पता नहीं चला कि अभिनंदन को छोड़ने का फ़ैसला क्यों लिया गया और इसकी बाध्यताएँ क्या थीं।

फ़वाद ने ये कहते हुए अपने वक्तव्य का असफल बचाव करने की भी कोशिश की कि वे बालाकोट पर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया का उल्लेख कर रहे थे जब दो यानों को मार गिराया गया और एक पायलट को बंधक बनाया गया था। वे भारत में आतंक फैलाने में पाकिस्तान की भूमिका को पूरी तरह नकारने लगे। बाद में फैली अव्यवस्था के बाद पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता का स्पष्टीकरण चलाया गया कि अभिनंदन को छोड़ने का फ़ैसला एक ज़िम्मेदार देश द्वारा लिया गया परिपक्व फ़ैसला था। लेकिन इस स्पष्टीकरण पर मीडिया शो में मुश्किल से ही चर्चा की गई।

पाकिस्तानी मीडिया में इस संदर्भ में बहुत रोचक चर्चा की गई। अयाज़ की इस बात के लिए निंदा की गई कि दुश्मन यानी भारत को अपनी आक्रामक रणनीति की सफलता का जश्न मनाने की एक वजह मिल गई। भारत विरोधी भावनाओं को पाकिस्तानी राष्ट्रवाद के लिए लुभाते हुए बहुत से एंकरों ने अयाज़ की इस बात के लिए खिंचाई की कि उन्होंने पाकिस्तान द्वारा अभिनंदन को छोड़ने के फ़ैसले को ख़राब तरीक़े से पेश किया। हालांकि फ़वाद के वक्तव्य पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया लेकिन फिर भी कुछ चैनलों में समीक्षकों ने इसे ग़ैर ज़िम्मेदार और दुर्भाग्यपूर्ण बताया।

पाकिस्तान गहन राजनीतिक मंथन की प्रकिया से गुज़र रहा है। सरकार अपनी लोकप्रियता खो चुकी है। कई धड़ों में बँटा विपक्ष जो आज तक ताक़तवर नहीं लगता था अब वापसी के नए मौक़े पा रहा है। इमरान सरकार का साथ देने वाली सेना की राजनीति में हस्तक्षेप करने की वजह से मुखर विपक्ष खुली निंदा कर रहा है।

शक्ति संतुलन की सेना द्वारा मध्यस्थता की जाती थी लेकिन अब इस पर खींचा-तानी चल रही है। आर्थिक हालात में बहाली के संकेत नहीं हैं। पाकिस्तान के लोग इमरान में अपना भरोसा खो चुके हैं। अगर मीडिया एंकर्स और समीक्षकों को संकेत माना जाए तो जो लोग पहले उनसे सहानुभूति रखते थे अब उनके सबसे बड़े निंदक हैं। ऐसा माना जा रहा है कि अगर आज पंजाब में चुनाव हो जाएं तो नवाज़ शरीफ़ का दल चुनाव जीत जाएगा।

ऐसी अफ़वाहें भी हैं कि सेना देश में बदलते राजनीतिक मूड से वाकिफ़ है और अपनी हर कोशिश कर रही है। सभी राजनीतिक दलों में अपने समर्थकों को संगठित करके फिर से नए राजनीतिक संतुलन बनाने की इसकी कोशिशें शायद शुरू हो चुकी हैं।

आलेख- अशोक बेहुरिया, वरिष्ठ सदस्य, एमपी-आईडीएसए

अनुवाद- नीलम मलकानिया

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