लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था में आए बदलाव

भारत में लगातार दूसरे माह यानी नवंबर में वस्तु एवं सेवा कर संग्रहण एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो जाना, यात्री कारों की पहले से ज्यादा बिक्री, रेलवे माल ढुलाई में वृद्धि, सेवाओं में वृद्धि से क्रय प्रबंधक सूचकांक में बढ़ोतरी, ये सब आर्थिक बदलावों में बहाली का संकेत है। ये देखना भी रुचिकर है कि हालिया तिमाही सकल घरेलू उत्पाद में 7.5 प्रतिशत से दूसरी तिमाही की वृद्धि दर की तुलना पहली तिमाही की लगभग 24 प्रतिशत की कमी से की जा रही है, जब लॉकडाउन का बहुत बुरा प्रभाव था। इस प्रकार बची हुई तिमाहियों में बहाली के तीव्र रुझान की आशा है। वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग ने अर्थव्यवस्था में तीव्र वृद्धि का संकेत दिया है। अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए जारी किए गए उत्प्रेरक पैकेज और अनलॉक प्रक्रिया के तुरंत बाद गतिविधियों में आए बदलाव को इनका श्रेय जाता है।

7.5 प्रतिशत के संकुचन के साथ दूसरी तिमाही में उत्पादन में अच्छी-खासी वृद्धि रही, जिसकी तुलना पिछले साल की समान समयावधि से की गई। निर्माण क्षेत्र में पहली तिमाही में 39 प्रतिशत नकारात्मक वृद्धि के बाद दूसरी तिमाही में सकारात्मक 0.6 प्रतिशत की बहाली दर्ज की गई। इस बहाली से औद्योगिक वस्तुओं की मांग बढ़ना तय है और इस प्रकार निर्माण क्षेत्र भी तीव्र बहाली के संकेत दे रहा है।

हालांकि नवंबर माह में जीएसटी से प्राप्त सकल राजस्व एक लाख करोड़ रुपए से अधिक रहा, जो कि एक साल पहले की तुलना में 1.4 प्रतिशत अधिक था। अक्टूबर और नवंबर माह में जीएसटी राजस्व में इज़ाफ़ा हुआ। कड़े लॉकडाउन की वजह से आरंभिक महीनों में रुझानों के गड़बड़ाने के बाद राज्यों द्वारा जीएसटी संग्रहण में आई कमी की अब भरपाई हो सकती है। नवंबर में 8,242 करोड़ रुपए का कर के रूप में संग्रहण किया गया। इसका इस्तेमाल राज्यों द्वारा जीएसटी लागू करने की प्रक्रिया में क्षतिपूर्ति के लिए किया गया। गौरतलब है कि राज्यों ने स्थानीय स्तर पर कर संग्रहण के लिए प्रक्रिया में सहयोग किया था।

इससे भी उत्साहजनक ये है कि नवंबर माह में जीएसटी क्षेत्र में बढ़त मिलने के साथ ही महालेखा नियंत्रक द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष की पहली छमाही में संकुचन के बाद केंद्र द्वारा किया जाने वाला कर संग्रहण अक्टूबर में काफी बढ़ा है। इसकी वजह से बढ़े हुए अप्रत्यक्ष कर, निजि आय कर तथा विस्तृत पैमाने पर संग्रहण में हुआ विस्तार है। इस साल अक्टूबर में 17 प्रतिशत की बढ़त के साथ सकल संग्रहण में जो वृद्धि हुई है, उसकी वजह त्योहारी खरीद में हुई तेज़ वृद्धि चुंगी और सीमा शुल्क तथा अप्रत्यक्ष करों में हुई वृद्धि भी है।

रेटिंग एजेंसी मूडीस ने अपने हालिया आकलन में कहा कि भारतीय कंपनियों की इस साल स्थिति सुधरेगी, क्योंकि एक तो लॉकडाउन के बाद आर्थिक गतिविधियों में तेज़ी आई है और खरीदारी के चलते बढ़ी हुई आय से आगे भी मांग में तेज़ी आएगी। कम ब्याज दरों तथा ऋणों की पर्यापत उपलब्धता से भी वित्त तथा वृद्धि को लेकर एक संतुलन बनाने में मदद मिलेगी।

अचल सम्पति क्षेत्र में फिर से बढ़त का उल्लेख करते हुए केंद्रीय वाणिज्य तथा उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी अर्थव्यवस्था की मज़बूती की बात की है। हाल ही में व्यापर मंडल के सदस्यों की बैठक में बोलते हुए उन्होंने कहा कि घरेलू उद्योगों में एक सामंजस्य आ गया है और एक पारदर्शी तथा अपेक्षाकृत अधिक खुली अर्थव्यवस्था के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं भारत की और उम्मीद से देख रही हैं।

लेकिन अभी भी कहीं-कहीं कमज़ोर मांग अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव डाल सकती है और अर्थशास्त्री इसके प्रति सचेत भी कर रहे हैं। इसलिए वे पर्यटन, यात्रा, भूमि बाज़ार तथा विकास के अन्य क्षेत्रों में मांग बढ़ाने से जुड़े उपाय करने की ज़रूरत पर बल दे रहे हैं। साथ ही रोज़गार सृजन पर ध्यान देते हुए ये भी याद रखना होगा कि नौकरियां या रोज़गार छिन जाने से मांग कम होगी जिसका अर्थव्यवस्था की गति पर नकरात्मक प्रभाव पड़ सकता है।



आलेख- जी. श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार
अनुवाद- नीलम मलकानिया

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