राष्ट्र हित को रखें सर्वोच्च: प्रधानमंत्री का आह्वान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बृहस्पतिवार को नए संसद भवन की नीव रखी। नई इमारत ‘आत्म निर्भर भारत’ की दूरदर्शिता का एक अभिन्न अंग है और स्वतंत्रता के बाद जनता की संसद के निर्माण का ये पहला ऐतिहासिक अवसर है। 2022 में भारत की स्वाधीनता की 75वीं वर्षगांठ है और ऐसे में ये इमारत नए भारत की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को पूरा करेगी। भूमि पूजन के अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, कई वरिष्ठ मंत्री, सांसद और आमंत्रित मेहमान उपस्थित थे। इस अवसर पर एक सर्व धर्म प्रार्थना सभा का आयोजन भी किया गया।
इस अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि ये भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक मील का पत्थर है और ये विचार 'भारतीयता' से ओत-प्रोत है। उन्होंने कहा कि इस निर्माण का आरम्भ हमारी लोकतांत्रिक परंपराओं के सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक है। उन्होंने नए संसद भवन के निर्माण में भारत की जनता से सहयोग का आह्वाहन किया। उन्होंने कहा कि भारतीय स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने पर इससे अधिक सुन्दर और पवित्र भला क्या हो सकता है कि हमारी संसद की नई इमारत बनने जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने उस पल को याद किया जब 2014 में बतौर सांसद वो पहली बार संसद भवन में प्रविष्ट हुए थे। उन्होंने कहा कि संसद में प्रवेश से पहले उन्होंने लोकतंत्र के मंदिर की चौखट पर अपना सर झुकाया था और प्रणाम किया था। उन्होंने कहा कि नए संसद भवन में ऐसी कई नई चीज़ें होंगी जिनसे सांसदों की कार्य कुशलता बढ़ेगी और उनकी कार्य संस्कृति में आधुनिकता आएगी। उन्होंने ये भी कहा कि यदि पुराने संसद भवन ने स्वतंत्रता के बाद भारत को नई दिशा दी, तो संसद की नई ईमारत एक आत्मनिर्भर भारत की गवाह बनेगी। यदि पुराने संसद भवन में देश की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए काम हुआ तो नए भवन में 21वीं सदी के भारत की आकांक्षाएं पूरी होंगी।
श्री मोदी ने कहा कि दुनिया के अन्य स्थानों पर लोकतंत्र का तात्पर्य चुनाव प्रक्रिया, शासन और प्रशासन से है, लेकिन भारत में ये जीवन मूल्यों, जीवन पद्धति और देश की आत्मा से जुड़ा है। भारत में लोकतंत्र सदियों के अनुभव से विकसित हुआ है। भारत के लोकतंत्र में जीवन मंत्र, जीवन तत्व और एक प्रकार की व्यवस्था का भाव निहित है। उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक शक्ति देश के विकास को नई ऊर्जा दे रही है और देशवासियों में एक नया विश्वास भर रही है।
भारत में लोकतंत्र हर आने वाले वर्ष के साथ नई ऊर्जा से भर रहा है और प्रत्येक चुनाव में मतदाताओं की भागीदारी भी बढ़ रही है। भारत में लोकतंत्र शासन के साथ ही मतभेद सुलझाने का भी माध्यम रहा है। विभिन्न प्रकार का नज़रिया एक जीवंत लोकतंत्र को और शक्तिमय बनाता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र इस लक्ष्य के साथ आगे बढ़ा है कि मतभेद की गुंजाइश तो रहती ही है। नीतियां और राजनीति अलग हो सकती हैं लेकिन राजनेता जान सेवा के लिए हैं, इस लक्ष्य के मध्यनज़र कोई मतभेद नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा की बहस और मतभेद चाहे बाहर हो या संसद के भीतर उसमे राष्ट्र सेवा के लिए प्रतिबद्धता हमेशा झलकनी चाहिए।
प्रधानमंत्री ने जनता से आग्रह किया कि वो लोकतंत्र के प्रति सदैव आशा जगाएं चूँकि यही संसद भवन के अस्तित्व का आधार है। उन्होंने याद दिलाया कि हर वो सदस्य जो संसद में प्रवेश करता है, वह जनता और संविधान के प्रति जवाबदेह है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के मंदिर में कोई रूढ़ियां नहीं चलतीं और ये जनप्रतिनिधियों के आचरण से ही पवित्र होता है। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों का समर्पण, सेवा, आचरण और व्यवहार इस मंदिर के लिए प्राण की भांति है।
उन्होंने जनता का आह्वाहन किया कि भारत को सर्वप्रथम रखते हुए भारत की प्रगति और विकास की पूजा करें और उनके प्रत्येक निर्णय से भारत और मज़बूत होना चाहिए। उन्होंने देश हित को सर्वोच्च बताते हुए सभी से ये संकल्प लेने को कहा कि उनके लिए देश हित से बड़ा कुछ नही होना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के लिए सरोकार व्यक्तिगत सरोकारों से ऊपर होना चाहिए। देश की एकता और अखंडता से ऊपर कुछ नहीं होता। देश के संविधान की गरिमा की रक्षा जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य होना चाहिए।
आलेख- पदम सिंह
अनुवाद- मुनीश शर्मा
Comments
Post a Comment